‘आप’ का ‘पाप’ ढो रही है ‘दिल्ली’

नई दिल्ली। दिल्ली में मुफ्त बिजली-पानी व बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने के नाम पर दोबारा सत्ता में आई केजरीवाल सरकार की असलीयत अब धीरे-धीरे जनता के सामने आ रही है। जहां दिल्ली की विभिन्न कालोनियों में लोग पीने के पानी को तरस रहे हैं वहीं घंटों बिजली की अघोषित कटौती आम बात हो गई है। रही बात बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की तो उसकी भी पोल कोरोना महामारी ने खोल कर रख दी है। दिल्ली में सरकारी चिकित्सा सुविधाएं इस कदर बदहाली के कगार पर पहुंच चुकी हैं कि केजरीवाल सरकार ने कोरोना से पीडि़त मरीजों को घर पर ही इलाज करने का फरमान जारी कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में एक ही दिन में (29 मई, शुक्रवार) कोरोना के रिकॉर्ड 1106 नये मामले दर्ज हो चुके हैं। जिसके चलते दिल्ली में कोरोना मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ कर 17000 को पार कर गई है। दिल्ली में कोरोना का प्रकोप शुरु होते ही दिल्ली सरकार द्वारा लगातार यह दावा किया जाता रहा कि उनके पास कोरोना पीडि़तों के इलाज के लिए करीब 30 हजार बैड तैयार हैं। लेकिन दिल्ली सरकार के इस दावे की पोल एक पीआईएल ने खोल दी। जिसके जवाब में दिल्ली सरकार ने माननीय उच्च न्यायालय के सामने यह स्वीकार किया कि उसके पास करीब 3100 बैड की ही व्यवस्था है।
इसके अलावा आये दिन सोशल मीडिया पर कोरोना पीडि़तों को लेकर वायरल हो रहे अनेकों वीडियो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कोरोना से संक्रमित मरीजों को दिल्ली के अधिकांश अस्पतालों में इलाज के लिए कोई सुविधा नहीं मिल पा रही है। कोरोना मामले में चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करवाने में नाकाम होती सरकार ने विभिन्न समाचार पत्रों, टीवी चैनलों व अन्य प्रचार माध्यमों पर कोरोड़ों रुपया फूंक कर दिल्ली में कोरोना से संक्रमित मरीजों को घर पर रह कर ही इलाज करने की सलाह दे डाली। केजरीवाल सरकार द्वारा जारी किये गए यह विज्ञापन सरकार द्वारा दिल्ली में विश्व स्तरीय चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने के दावों की पोल खोल रहे हैं।
गत फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान केजरीवाल ने चुनावी मंचों पर सार्वजनिक रूप से दिल्ली में चौबीसों घंटे बिजली व पानी उपलब्ध होने का दावा किया था लेकिन आज हालत यह है कि रोहिणी जैसे पॉश इलाके के कई सैक्टरों में भी चौबीस घंटे तो क्या चौबीस मिनट भी जल बोर्ड का पानी मुहैया नहीं हो पा रहा है। जिसके चलते स्थानीय निवासी आम आदमी पार्टी के क्षेत्रीय विधायकों के खिलाफ धरना प्रदर्शन करने पर मजबूर हो रहे हैं।
केजरीवाल सरकार ने विज्ञापनों में अरबों रुपये फूंक कर दिल्ली में चौबीसों घंटे और देश में सबसे सस्ती बिजली मुहैया कराने का दावा किया था। लेकिन दिल्ली के विभिन्न इलाकों में आज भी घंटों-घंटों बिजली की अघोषित कटौती जारी है। रही सस्ती बिजली की बात तो गत वर्षों में बिजली कंपनियों द्वारा फिक्स चार्ज व अन्य टैक्सों के नाम पर कई गुना तक बढ़ोत्तरी कर दी गई है। जिसके चलते एक साधारण दुकानदार को भी 20 से 25 रुपये यूनिट तक बिजली का भुगतान करना पड़ रहा है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गत 2 अप्रैल को मीडिया के माध्यम से घोषणा की थी कि दिल्ली के ऑटो रिक्शा, ई-रिक्शा व ग्रामिण सेवा चालकों को सहायता पैकेज के तौर पर पांच-पांच हजार रुपये दिये जाएंगे, लेकिन करीब दो माह गुजर जाने के बाद भी इस सहायता पैकेज के 40 फीसदी पात्रों को ही यह सहायता राशि मिल पाई है। इस बात का खुलासा भी एक जनहित याचिका के माध्यम से हो पाया।
कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन में दिल्ली में रह रहे लाखों मजदूर बेरोजगार हो गये और भूखे रहने के कारण पलायन को मजबूर हो गए। जबकि दिल्ली सरकार द्वारा लगातार यह दावा किया जाता रहा है कि सरकार द्वारा रोजाना लाखों मजदूरों को दो वक्त का खाना मुहैया करवाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर आये दिन भूख से तड़पते मजदूरों के वायरल हो रहे वीडियो दिल्ली सरकार के दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं।
इसके अलावा जहां कहीं भी सरकार द्वारा भोजन वितरित किया गया उसकी गुणवत्ता का स्तर क्या था, वह भी किसी से छिपा नहीं है। यह तो भला हो दिल्ली की धार्मिक, सामाजिक व गैर सरकारी संस्थाओं का जो ईमानदारी से लॉकडाउन शुरु होने से लेकर अभी तक लाखों लोगों को नि:शुल्क भोजन व राशन की व्यवस्था कर रही है। वरना जरूरतमंदों की स्थिति क्या होती, उसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। हकीकत तो यह है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार दिल्ली में काम करने की बजाय विज्ञापनों में सरकार चला रही है। यहां यह भी विडम्बना है कि अगर कोई समाचार पत्र अथवा टीवी चैनल दिल्ली सरकार की नाकामियां उजागर करने की कोशिश करता है तो सरकार द्वारा उस समाचार पत्र अथवा टीवी चैनल को दिल्ली सरकार द्वारा जारी विज्ञाापनों के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाता है। देश का एक प्रतिष्ठित लोकप्रिय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। उक्त समाचार पत्र ने केजरीवाल सरकार के पिछले कार्यकाल में दिल्ली सरकार की नाकामियों को उजागर करना शुरु किया था, जिसके चलते लगभग एक साल तक दिल्ली सरकार द्वारा उक्त समाचार पत्र को एक रुपये का विज्ञापन भी जारी नहीं किया गया।
कोरोना महामारी के चलते जहां एक ओर दिल्ली सरकार घोर वित्तीय संकट से जूझ रही है वहीं सरकार कोरोना महामारी पर अपनी नाकामी छिपाने के लिए कोरोड़ों रुपये के विज्ञापन जारी कर रही है। जिसके चलते ऐसा लगता है कि दिल्ली सरकार इन विज्ञापनों के माध्यम से मीडिया पर कंट्रोल करना चाहती है तकि मीडिया कोरोना महामारी को लेकर उसकी नाकामियों को उजागर करने से परहेज करे।

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