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कैलाश मानसरोवर यात्रा

मानसरोवर-हिमालय के उत्तर में 45०० मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक विश्वप्रसिद्ध झील है जो वर्तमान में चीन के तिब्बत क्षेत्र में है। मानसरोवर झील की उत्पत्ति के विषय में प्रसिद्ध है कि ब्रह्माजी ने अपनी इच्छा मात्र से इसका निर्माण किया था। ब्रह्माजी के मानस (मन) की शक्ति द्वारा अस्तित्व में आने के कारण ही इसका नाम ‘मानस-सरोवर पड़ा जो बाद में मानसरोवर हो गया। मानसरोवर झील का संबंध ब्रह्माजी से जुडऩे के कारण ही इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व है।

जहाँ तक कैलाश पर्वत का संबंध है वह भगवान शंकर का स्थान है। सबका कल्याण करने वाले भगवान शंकर अनिर्वचनीय तथा सर्वव्यापक हैं लेकिन उनके भक्त उस परमशक्ति को विषम परिस्थितियों वाले कैलाश पर्वत पर निरंतर वास करते देखते हैं जो विषधरकंठयुक्त भोलेनाथ का आद्य परम धाम है। पुराणों के अनुसार कैलाश तथा मानसरोवर शिव तथा पार्वती का ही स्वरूप हैं इसलिए अनादि काल से ही अत्यंत दुर्गम होने के बावजूद कैलाश-मानसरोवर यात्रा की जाती रही है।

कैलाश-मानसरोवर के इसी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व के कारण ही प्रत्येक हिंदू की यह इच्छा होती है कि वह कैलाश पर्वत तथा मानसरोवर झील की परिक्र मा कर एक बार इस पवित्रा सरोवर में डुबकी अवश्य लगाए। वस्तुत: मानस-यात्रा मानसरोवर यात्रा के रूप में व्यक्ति के मन की यात्रा है। यदि व्यक्ति इस मानस-यात्रा द्वारा अपने मन को नियंत्रित करना सीख ले तो वह अपने मन की शक्ति का उपयोग कर ब्रह्माजी के मानस की शक्ति की तरह अपने मानस की शक्ति या इच्छा मात्र से भौतिक जगत की किसी भी वस्तु का सृजन कर सकता है।

यहाँ चारों ओर लगातार परिवर्तन देखने को मिलता है। कैलाश शिखर, मानसरोवर और आसपास की पर्वत श्रृंखलाओं पर ही नहीं, मानस-यात्रियों में भी परिवर्तन दिखता है। एक परिवर्तन है उनके चेहरों और उनके शरीर की त्वचा में। यहाँ के प्रतिकूल मौसम तथा लगातार तेज़ ठंडी हवा के कारण सभी के चेहरे साँवले पड़ जाते हैं लेकिन इस यात्रा में एक और परिवर्तन भी दृष्टिगोचर होता है और वो परिवर्तन है कि यात्री अपने इस भौतिक परिवर्तन, इस बाह्य परिवर्तन से एकदम निरपेक्ष होते हैं।

यात्रियों को किसी अन्य परिवर्तन की अपेक्षा होती है। किसी सकारात्मक स्थायी परिवर्तन की खोज में इतनी दूर चले आते हैं। बाह्य परिवर्तन से निरपेक्ष हैं लेकिन आंतरिक परिवर्तन के लिए व्याकुलता झलकती है चेहरों से। कुछ किसी चमत्कार के घटित होने की प्रतीक्षा में भी दिखलाई पड़ते हैं तो कुछ अन्य किसी विश्वास से ओतप्रोत दिखलाई पड़ रहे हैं। विश्वास के अभाव में तो यह यात्रा संभव ही नहीं है। जीवन-यात्रा का उद्देश्य भी यही होना चाहिये।

मानस के किनारे पर स्थित ठूगू शिविर तथा ठूगू शिविर से मानस के उस पार दूर स्थित कैलाश पर्वत के विविध रूप दोपहर से ही देखने को मिल रहे हैं, कभी बर्फ सा चमकता उज्ज्वल रूप, कभी बादलों की परछाई से युक्त राख जैसा नीला-स्लेटी रूप तो कभी पूर्ण रूप से मेघाच्छादित। शिविर के नीचे सामने दूर तक फैला विस्तृत मानसरोवर और मानसरोवर के पार दृष्यमान हमारी चिर प्रतीक्षित आकांक्षाओं का प्रतीक कैलाश शिखर। कभी योगी-सा भस्माच्छादित तो कभी विरही-सा मेघाच्छादित और कभी युवक-सा तेजोमय स्वर्णाभ, हर क्षण नया रूप, तरल-तरंगित-सा हमारे शरीर की यात्रा की तरह जो लगता तो ठोस है लेकिन है तरंग रूप।

ध्यान से देखिए तो सही। सहस्रार से षडचक्रों की यात्रा करते हुए पैरों की उंगलियों के पोरों तक तरंगें ही तरंगें हैं। कुछ भी ठोस नहीं है, न अस्थियों का ठोसपन, न मांस-रक्त का भार। ऊपर से नीचे तक तरंगें ही तरंगें। तरंग रूप शरीर को इसके मूल रूप में जानना, मूल रूप को अनुभव करना ही तो मानस-यात्रा है। यही वास्तविक कैलाश यात्रा है। इसके अभाव में यात्रा का क्या प्रयोजन हो सकता है? सिर्फ शरीर के बाह्य आवरण को, इसकी जड़ता को देखा तो क्या देखा, क्या यात्रा की? सब कुछ पिघलाकर नये साँचे में ढालना, नये रूप में आना अर्थात् रूपांतरण ही वास्तविक यात्रा है।

कैलाश शिखर प्राय: घने बादलों के कारण नजऱों से ओझल होता है। सिर्फ नजऱों से ओझल, मन से नहीं। छुपना, प्रकट होना, फिर छुपना, फिर प्रकट होना, यही तो उसकी माया है। इसी माया को समझना हमारी यात्रा है। जो है भी और नहीं भी है, उसी को खोजना या उसके वास्तविक स्वरूप को समझना यही तो मानस-यात्रा है। मानस-यात्रा नहीं की तो झील व पर्वत शिखर के चारों ओर चक्कर लगाने का कोई औचित्य नहीं।

आप क्या समझते हैं कि इस स्वदेश वापसी के बाद यात्रा का अंत हो जाएगा। यात्रा का अंत नहीं होता। न मानस-परिक्र मा से यात्रा का अंत हुआ है न कैलाश-परिक्र मा के बाद यात्रा का अंत होगा और न ही स्वदेश वापसी के बाद घर पहुँचने पर यात्रा का अंत होगा। यह जीवन ही यात्रा है। जब तक यात्रा होती रहेगी, जीवन भी चलता रहेगा। जीवन चलता रहे, इसलिए कभी मत रुको। चलते रहो, चलते रहो। चरैवेति, चरैवेति।

– सीताराम गुप्ता

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