मुख्यमंत्री से मांग कि शिक्षा की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करें : विजेन्द्र गुप्ता

नगर संवाददाता
नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता श्री विजेन्द्र गुप्ता ने आज भाजपा प्रदेश मुख्यालय में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में आम आदमी पार्टी सरकार से शिक्षा की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की। उन्होंने मुख्यमंत्री से पूछा कि अब जब सेकेन्ड्री और सीनियर सेकेन्ड्री की परिक्षायें सिर पर हैं तो वह बताये कि उसने उन लाखों छात्रों के बारे में क्या किया जिनको उसने फेल होने के कारण स्कूलों से बाहर निकाल दिया। उन्होंने पूछा कि जब वर्ष 2015-16, 2016-17 तथा 2017-18 में नवीं व ग्यारहवीं कक्षाओं में पढ़ रहे 5.16 लाख विद्यार्थी प्रिबोर्ड की परीक्षा में फेल हो गए और उनमें से अधिकांश का पुनः दाखिला नहीं दिया तो तब वह शिक्षा में स्तर सुधारने का दावा किस प्रकार कर रही है ? उन्होंने कहा कि सरकार के दावों और जमीन पर स्थिति में भारी अंतर है। उन्होंने कहा कि सरकार वास्तव में अपने स्कूलों के परिणाम बेहतर दिखाने के लिए कमजोर छात्रों को निरन्तर अपने स्कूलों से निकाल रही है। उन्होंने कहा कि इससे सरकार की ’’बुनियाद’’ योजना की पोल खुल गई है।
नेता विपक्ष ने कहा कि सरकार ने हाल ही में माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल एक शपथ-पत्र में स्वीकार किया कि 2018-19 में नवीं से बारहवीं कक्षा तक के 66 प्रतिशत असफल छात्रों को अपने विद्यालय में उन्हें दाखिला देने से मना कर दिया और जब अध्यापकों के लगभग 25 हजार पद खाली पड़े हैं ऐसे में वह किन विद्यार्थियों के लिए बिना किसी सोच-विचार के धड़ल्ले से़ 20,748 कमरों का निर्माण करने जा रही है। उसने 500 स्कूल खोलने के वादे के बाद भी 4 वर्षों में एक भी नया स्कूल क्यों नहीं खोला? उन्होंने कहा कि विद्यमान स्कूलों में नए कमरों का निर्माण निश्चित रूप से दूर-दराज के उन क्षेत्रों तक शिक्षा नहीं पहुंचा सकते जो अभी भी शिक्षा से वंचित हैं।
विपक्ष के नेता ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में जिस प्रकार मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, उसके परिणाम जमीनी स्तर पर कहीं नजर नहीं आते। सरकार ने आज भी अध्यापकों के 25 हजार पद खाली छोड़ रखे हैं। लगभग 650 विद्यालयों में प्रधानाचार्य के पद खाली पड़े हैं। सरकार मैनेजर नियुक्त कर प्रधानाचार्यों की भरपाई नहीं कर सकती। स्कूल प्रबंधन में इस प्रकार की भारी कमी के बावजूद भी सरकारी आंकड़ों को अनुसार 1 जनवरी, 2019 को शिक्षा निदेशालय ने 90 प्रिंसिपलों और 32 वाइस प्रिंसिपलों को डायवर्टीड कैपेसिटी में प्रशासनिक कार्यों में लगा रखा है। इससे शिक्षा के स्तर पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
विपक्ष के नेता ने कहा कि जिस प्रकार केजरीवाल सरकार असफल छात्रों को पुनः दाखिला नहीं देती है, उससे सरकार का इन छात्रों के प्रति अन्यायपूर्ण रवैया दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2018-19 में दिल्ली सरकार के स्कूलों में बारहवीं में असफल छात्रों में 91 प्रतिशत को दाखिला ही नहीं दिया गया। ग्यारहवीं कक्षा में 58 प्रतिशत, दसवीं में 91 प्रतिशत तथा नवीं में 52 प्रतिशत असफल विद्यार्थियों को पुनः दाखिला देने से इन्कार कर दिया गया। इस प्रकार सरकार ने नवीं से ग्यारहवीं तक 1,55,436 असफल विद्यार्थियों में से 1,02,854 विद्यार्थियों को पुनः दाखिला नहीं दिया। एक सर्वे के अनुसार नवीं कक्षा से बाहरवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते मात्र 35 प्रतिशत विद्यार्थी ही रह जाते हैं। ऐसे में सरकार को यह बताना होगा कि वह किन बच्चों के लिए नये कमरे बना रही है और क्यों?
विपक्ष के नेता विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि केजरीवाल ने अपने चुनावी घोषणापत्र में 500 नये स्कूल खोलने का वायदा किया था परंतु दुर्भाग्य है कि चार वर्ष के कार्यकाल में एक भी नया स्कूल नहीं खोल पाये। यहां तक कि वे गत् 4 वर्षों से दिल्ली सरकार के पास स्कूल खोलने के लिये 29 प्लाटों पर एक ईंट नहीं नहीं लगवा पाये। आज वे यह कहकर जनता को गुमराह नहीं कर सकते कि उन्होंने जितने क्लासरूम बनवाये हैं वे 1000 स्कूलों के बराबर हैं।
विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि नये क्लासरूम बनाने के पीछे सरकार की दलील है कि इससे क्लासों में बच्चों की भीड़भाड़ (घनत्व) कम हो जायेगा। यदि सरकार की दलील मान भी ली जाये तो क्या नये क्लासरूमों के लिये अध्यापक या नया स्टाफ उपलब्ध है? अध्यापकों तथा प्रिंसिपलों की पहले से ही भारी कमी चल रही है तो ऐसे में नये क्लासरूम बनाने का औाचित्य क्या है ?

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