मतदाता की आवाज मीडिया देशभर में पहुँचायें : रिखब चन्द जैन

नई दिल्ली। दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में “मीडिया एंड इलेक्शन फॉर नेशन” परिचर्चा कार्यक्रम संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय, के.जी. सुरेश, दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष मनोहर सिंह एवं सेक्रेटरी प्रमोद कुमार और कई प्रबुद्ध पत्रकार उपस्ठित थे।
भारतीय मतदाता संगठन के संस्थापक अध्यक्ष रिखब चन्द जैन ने कार्यक्रम में पत्रकारों का स्वागत करते हुए अपने अभिभाषण में कहा कि मीडिया लोकतन्त्र का सशक्त चौथा स्तम्भ है। लोकतन्त्र के अन्य तीन स्तम्भ जो न करें उसे करने के लिए तैयार करना मीडिया का काम है। मीडिया में इसके लिए आधुनिक तकनीक एवं विज्ञान के साथ लोकतन्त्र को प्रभावित करने की शक्ति में बहुत विस्तार हुआ है। मैं भारत के 80 करोड़ मतदाताओं की तरफ से भारत के लोकतन्त्र की गुणवत्ता में सुधार के लिए आगामी चुनाव जिसे हम लोकतन्त्र का उत्सव कहते हैं उसके सम्बन्ध में मतदाताओं के मन की बात उनकी आशायें और उम्मीदें तथा उनकी शिकायतें मीडिया के माध्यम से एवं आप सबके माध्यम से देशभर में पहुंचाने के लिए अपील करने के लिए प्रस्तुत हुआ हूँ।
श्री जैन ने आगे कहा कि भारतीय मतदाता संगठन एक विचार मंच है। इसमें सभी गैरराजनीतिज्ञों की भागीदारी हैं। सजग एवं प्रबुद्ध नागरिकों का फोरम हैं। संवाद के माध्यम से बदलाव के लिए विधायिका, सरकार एवं न्यायालय से राष्ट्रहित में लोकतन्त्र के पायदान को नार्वे, स्वीडन जैसे देशों के स्थान तक ले जाने के लिए प्रयासरत् है। मतदाता जागरुकता पहला काम है। मतदाता मित्र के माध्यम से हमारा संगठन एनजीओ और प्रबुद्ध नागरिकों एवं सिविल सोसाइटी के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को वोट देने के लिए प्रेरित करता है। वोट प्रतिशत 90-95 प्रतिशत हो, इसके लिए प्रयासरत् है। कोई भी नागरिक वोट न बेचें। वोट सोच-समझ कर दें। अपराधी प्रत्याशी, हिंसक प्रवृति के प्रत्याशी को वोट देने से मतदाता बचें। मतदाता धर्म, जाति, रंग, लिंग का भेद करके वोट न दें। प्रत्येक मतदाता वोट देने को कर्तव्य समझें और वोट देने के अधिकार का प्रयोग भी करें।
भारत के मतदाताओं की सबसे पहली परेशानी है कि उसकी कोई सुनता नहीं है। जिनको वो वोट देकर जीत दिलाते है, वो भी चुनाव होने के बाद उनकी सुनते नहीं हैं। उनसे मिलने तक का समय नहीं मिलता। अपने क्षेत्र की समस्याएं और विकास के लिए रास्ता बनाने के लिए भी बहुत से प्रतिनिधि कुछ नहीं करते हैं । अपने पद को अधिकत्तर जनप्रतिनिधि व्यवसाय में बदलकर अपने हित में और अपने परिवार के हित में तथा थोड़ा बहुत पार्टी के हित में काम करते हैं। विडम्बना यह है कि पार्टी लाईन के चलते हुए वे पार्लियामेन्ट या विधानसभा में अपने क्षेत्र की बात शायद ही पूरी अवधि में कभी 2-4 मिनट के लिए ही रख पाते है। अगर उनके क्षेत्र की जरुरत तथा पार्टी की सोच में अन्तर हो तो जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की वकालत करने से भी परहेज करते हैं। जनप्रतिनिधियों को पार्टीतन्त्र की ऐसी पाबन्दी से मुक्ति मिलनी चाहिए।
कहने को लोकतन्त्र में मतदाता या जनता जनार्दन की बात चलती है। क्या वास्तविकता में ऐसा हैं? भारत के संविधान के अनुसार 15 से 20 प्रतिशत वोट शेयर पर भी राज्य में और केन्द्र में सरकारें बन जाती है। किसी भी चुनाव क्षेत्र में 51 प्रतिशत से कम वोट लेकर भी जनप्रतिनिधि एम.पी./एम.एल.ए.इत्यादि बन जाते है। यह कैसा बिना बहुमत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था है? इसके लिए संविधान संशोधन हो।
कहने के लिए मतदातागण प्रतिनिधि का चुनाव करते है लेकिन जनप्रतिनिधि के लिए प्रत्याशी तो पार्टियां तय करती है। पार्टियां जेल में बैठे हुए अपराधी लोगों को और अनेकानेक आपराधिक मामलों में संलिप्त लोगों को भी प्रत्याशी बना देती है। राजनैतिक शुचिता हो तभी लोकतन्त्र आगे बढ़ेगा, विकास होगा, सुशासन होगा। इस बारे में 25 से अधिक वर्षों से अनेक आयागों की रिपोर्ट धूल चाट रही हैं। अक्टूबर 2018 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक बार फिर सरकार से अपराधी लोगों को संसद और विधानसभाओं में न आने देने के लिए कानून बनाने का आदेश दिया, पर सरकार और राजनेता एवं राजनीतिक पार्टियां इस तरह के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को दरकिनार ही कर देती है। भारतीय मतदाता संगठन की तरफ से जो कोई निवेदन-प्रतिवेदन, मैमोरेन्डम सरकार, राष्ट्रपति जी, प्रधानमंत्री जी, कानून मंत्रालय, विधि आयोग, राज्यपाल महोदयगण, मुख्यमंत्री महोदयगण जिनकों भी लिखते है / जिनको भी निवेदन भेजते है वो बिना पढ़ें, बिना उस पर विचार किये मैमोरन्डम की कॉपी चुनाव आयोग के दफ्तर भेजकर सारी बात की इतिश्री कर देते हैं। मिलने का तो समय हमारे संगठन को भी नहीं दिया जाता है। मतदाताओं का प्रश्न है कि जब सरकार ड्राइवर, चपरासी, हेल्पर, स्वीपर आदि का काम भी किसी अपराधी को नहीं सौंप सकती है तो फिर अपराधी व्यक्तियों को राजनीति में मान्यवर बनने का रास्ता कैसे खुला हैं?
अब तो सदन में जनप्रतिनिधि जिस तरह का आपसी व्यवहार करते हैं, तू-तू , मैं-मैं से घटिया स्तर की भाषा का प्रयोग करते हैं, उसके लिए उन्हें शर्म भी नहीं आती है, पर देश शर्मसार हैं। अपनी ही पार्टी के दो जनप्रतिनिधि कार्यक्रमों में जूता-पैजाम जोर से कर रहे हैं। टिकट न देने पर उम्मीदवार प्रत्याशी हिंसा पर उतर कर अपनी ही पार्टी कार्यालय को तोड़-फोड़ कर देते हैं। क्या यह ठीक है?
मतदाताओं को पिछले 5 राज्यों के हुए चुनाव में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद किसी भी अपराधी प्रत्याशी ने चुनाव आयोग के निर्देश पर भी अपना आपराधिक ब्यौरा स्थानीय अखबारों, इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रकाशित नहीं करवाया और न ही पार्टियों ने ऐसा किया तथा न ही चुनाव आयोग ने ऐसा न करने वालों पर कोई कार्रवाई की। अब मतदाता किसे सुनाये? क्या करें? इस देश में सुनने वाले कम और भाषण देने वाले ज्यादा हैं।
मतदाता चाहता है कि ई-वोटिंग हो। उपस्थित टेक्नोलॉजी से ऐसा करना बहुत आसान और सम्भव है। इससे चुनाव बूथ पर वोटिंग का भार कम हो जायेगा। कोई भी व्यक्ति कहीं से भी अपने मतदान का प्रयोग कर सकेगा। माननीय पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी ने भी ई.वोटिंग की वकालत की थी। अभी टाईम्स ऑफ़ इन्डिया ग्रुप मीडिया समुह ने इस कम्पैन को बडे़ जोश के साथ उठा रखा है। इसी तरह चुनाव आयोग और हिन्दुस्तान टाईम्स ने फर्स्ट टाइम वोटर्स को प्रेरित करने का अभियान (कम्पैन) चला रखा है। सभी नये वोटर अवश्य वोट दें, ऐसा सुनिश्चित हो। भारतीय मतदाता संगठन तो युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए राजनैतिक पार्टियों से उन्हें अधिक से अधिक प्रत्याशी बनाने की अपील करता है या फिर युवा अपनी अलग ऑल यूथ राजनैतिक पार्टी बनायें। मतदान की उम्र 18 से 16 वर्ष करने की भी भारतीय मतदाता संगठन अपनी मांग रख रहे है। क्योंकि युवक आजकल कम उम्र में ही समझदार हो रहे हैं। यू.के. में भी इस बात में लिए प्रयास चल रहे हैं।
भारत के लोकतन्त्र में राजनैतिक पार्टियाँ महिलाओं को स्वैच्छिक रुप से 33 प्रतिशत प्रत्याशी घोषित करें। महिला शक्ति से कोई अपरिचित नहीं है। प्रत्येक परीक्षा में महिलाएं एवं युवतियां युवकों से आगे आ रही हैं। फिर उन्हें अपना वर्चस्व बनाने का अवसर क्यों न मिले? भारतीय मतदाता संगठन ऑल वुमन पोलिटिकल पार्टी बनाने वाली महिलाओं का स्वागत करता हैं। ऐसी एक पार्टी हाल ही में तेलंगाना में बनी है। जिन्होंने राज्य में विधानसभा के चुनाव में भाग लिया।
राजनैतिक पार्टियों से निवेदन है कि 70 साल से ऊपर की उम्र वाले लोगों को टिकट न दें। एक प्रत्याशी को एक पद पर दो बार से ज्यादा अवसर न दें। टिकट न बेचें। सारी टिकटें परिवारवादि पार्टियां अपने परिवार और नजदीक के रिश्तेदारों को ही न बाटें। प्रत्येक प्रत्याशी के लिए न्यूनतम शिक्षा स्त्तर भी तय होने चाहिए। अब तो सैनिक जिसे बाहुबल पर काम करना है सिक्योरिटी गार्ड, चपरासी को भी अच्छी शिक्षा और कम्प्यूटर के प्रयोग करने आना अति आवश्यक हो गया है। तो राजनीतिक जनप्रतिनिधि की न्यूनतम शिक्षा स्त्तर तो तय होना ही चाहिए।
अगर हम किसी वकील को तय करते है और वह ठीक काम न करें तथा मामलें की पेशी में हाजिर ही ना हो तो हमें वकील बदलने का अधिकार है। जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र का काम न करें, पार्लियामेन्ट, विधानसभा में उपस्थित नाम मात्र के लिए रहे, कुछ ना बोले और कुछ ना कहे या अन्य कारणों से मतदाताओं को उन्हें रिकॉल करने का अधिकार विशेष परिस्थितियों में मिलना चाहिए। इससे जनप्रतिनिधि सत्तर्क रहेगें और सही काम कर पायेगें। माननीय पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी ने तो यहां तक अपने विचार रखे हैं कि प्रत्येक क्षेत्र का अलग घोषणा पत्र हो और अगर उस घोषणा पत्र के वादे हासिल ना करें तो जनप्रतिनिधि जी जिम्मेदार हो और अपना पद त्यागे या जनता उन्हें वापिस बुलाये। कोई भी राजनैतिक पार्टी चुनाव के समय लुभावना घोषणा पत्र जारी न करें। उसमें असम्भव होने वाली नामुमकिन बातें न डालें। अगर घोषणा पत्र पर चुनाव के बाद पार्टी न चले, तो कुछ कार्रवाई करने की व्यवस्था मतदाताओं को मिले।
मतदाता चुनाव में धनबल के प्रभाव से बहुत दुःखी है। करोड़ों रुपयों में लोग राज्यसभा की सदस्यता ले रहे हैं। संसद में एक वोट के लिए भी करोड़ों रुपये लोग दे देते है। चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी हारने वाले और जीतने वाले सभी निर्धारित धन सीमा से अधिक कई गुणा खर्च चुनाव में करते है। इस प्रवृति पर रोक लगनी चाहिए। श्रीमति इन्दिरा गांधी को इस मुद्दें पर प्रधानमंत्री पद से हटाने तक इलाहाबाद कोर्ट ने आदेश दे दिया। ऐसे खर्च करने वाले प्रत्येक प्रत्याशी का पद रिक्त हो और उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने के लिए एवं वोट देने के लिए अयोग्य घोषित किया जाये। दुःख की बात यह भी है कि इन सब बातों की जानकारी चुनाव आयोग को भी है। प्रत्येक राजनैतिक पार्टी और मंत्री मंडल तथा सभी सभा अध्यक्षों को भी होती है फिर भी कुछ अपवाद छोड़कर इसका संज्ञान नहीं लिया जाता है।
भारत के चुनाव में अभी भी ई.वी.एम. के प्रयोग के बावजूद बल प्रयोग भी बहुत से क्षेत्रों में हो रहा है। वोट देने नहीं देते है। नॉमिनेशन फाईल करने नहीं देते है। फर्जी वोट डाल देते है। इसका सबसे बड़ा मामला पश्चिम बंगाल के पंचायत एवं स्थानीय चुनाव में न्यायालयों तक भी पहुंचा, पर समाधान कुछ नहीं निकला। ऐसी प्रवृतियों पर रोक लगाना, निर्भिक, निष्पक्ष चुनाव कराना लोकतन्त्र की पहली शर्त है।
भारत के लोकतन्त्र में राजनैतिक पार्टियों को हर तरह से खुली छूट है। न संविधान में, न जनप्रतिनिधि कानून में किसी भी तरह की कोई लगाम नहीं है। अंकुश नहीं है। वो चाहे जिसे प्रत्याशी बना देते है। वो स्वयं अपनी पार्टी में आपराधियों को सदस्य बनाते हैं और पद भार भी देते हैं। अधिकतर पार्टियाँ राष्ट्रहित में काम न करके पार्टीहित या स्वयं हित में काम कर रही है। ऐसा क्यों है? उनकी नेक नियति में बदलाव आवश्यक है। हमारे संगठन ने इस बारे में जितने प्रयास किए पूर्व चुनाव आयुक्त, प्रबुद्ध सही सोच के राजनीतिज्ञ, समाज शास्त्री सभी ने यह कहा कि राजनीतिज्ञ स्वयं अपने आपकों कभी भी सुधारने वाले नहीं है। (They will not reform themselves) अतः कानूनी लगाम चाहिए। प्रत्याशी तय करने के लिए दिशा निर्देश दिए जाये। पार्टी में आंतरिक लोकतन्त्रिक प्रणाली की व्यवस्था सुनिश्चित हो। पार्टी को और प्रत्याशियों को चुनाव खर्च के लिए स्टेट फंडिंग हो ताकि गलत रास्ते से चुनाव फंड और पार्टी फंड इक्ट्ठा न कर सकें।
मतदाता नहीं चाहते है कि उनका कोई भी जनप्रतिनिधि संसद या विधानसभा के कामकाज में बांधा डालें। विपक्ष की भूमिका में रहने वाले जनप्रतिनिधि और राजनीतिक पार्टियां सकारात्मक सहयोग के रास्ते पर चले। वैकल्पिक सुझाव पेश करें और ऐसे विकल्प पर ठोस कारण बताये। इस देश में टांग खिचाई, अडंगेंबाजी बंद हो, तभी विकास तेज़ होगा।
भारत का मतदाता चाहता है कि लोकतन्त्र वहीं है जिसमें गरीबी को कोई स्थान ना हो। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और घर का अच्छा इन्तजाम गरीब से गरीब के लिए हो। सेकुलरिज्म के नाम पर बहुमत समाज को आरोपित न करें। अल्पंसख्यक समाज को बराबरी का दर्जा अवश्य दें। वोट बैंक और दल बदलू, मान्यवरों की खरीद फरोख्त जैसी प्रवृतियां खत्म हो।
लोकतंत्र में अपर हाउस (राज्यसभा और विधान परिषदें) की कल्पना एक विशिष्ट विद्वत परिषद् के रूप में की गई है। अत: इसमें उपसभापति महोदय जी सिर्फ गैर राजनैतिक सज्जन, प्रबुद्ध नागरिक ही सदस्य बने। राजनैतिक पार्टियाँ संदर्भ विहिन नेताओं को राज्यसभा और विधान परिषदों में न भेजें।
सम्मानीय पत्रकार एवं मीडिया के बन्धुओं को अभी मैंनें उपरोक्त सारी बातें प्रस्तुत की है। आप इन विषयों को अच्छी तरह से जानते है। मतदाताओं के प्रश्नों को आप विधायिका, सरकार, सरकार के अफसर, चुनाव आयोग, राजनैतिक पार्टियां, राजनीतिज्ञ अलंकृत सेलेब्रिटिज, प्रबुद्ध नागरिक, शिक्षाविद्, कानूनविद् आदि लोगों से यह प्रश्न रखें, उनके विचार और उनसे समाधान भी लें और इन सब बातों को जन-जन तक पहुंचायें। यही मेरी मीडिया के बन्धुओं से अपील है। जो काम भारतीय मतदाता संगठन के लिए नामुमकिन है वह आप सबके लिए दायें हाथ का खेल है। मीडिया जो चाहे उसके होने की हवा बना सकता है और उन विषयों पर निर्णय लेने के लिए सम्बन्धित अधिकारियों एवं सरकार को मजबूर कर सकता है। भारत के लोकतन्त्र में गुणवत्ता सुधार के लिए आपके योगदान की अत्यन्त आवश्यकता है और उसका दूरगामी महत्त्व भी है। मुझे विश्वास है आप सभी अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभायेगें।

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