शिवलोक की प्राप्ति करवाते हैं कपालेश्वर महादेव

उज्जैन के अनन्त पेठ इलाके में कपालेश्वर महादेव के नाम से आठवें महादेव विराजमान हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार वैवस्वत-कल्प के त्रेतायुग में एक बार महाकाल वन में ब्रह्माजी यज्ञ कर रहे थे। ब्राह्मण आहूतियां दे रहे थे। तब शिवजी भस्म धारणकर कंथा लपेटकर विकृत रूप में कपाल हाथ में लेकर भिक्षा लेने पहुंचे। ब्राह्मणों ने उनका अनादर किया। शिवजी ने कापालिक के रूप में कहा कि मैंने कापालिक का व्रत लिया है और ब्रह्महत्या दूर करने के लिए बारह वर्ष के लिए शिव की आराधना कर रहा हूं। तब ब्राह्मणों ने कहा कि शिवजी को तो कपाली रूप होने से दक्ष ने भी अपने यज्ञ में नहीं बुलाया था। फिर उन्होंने कपाली रूप शिवजी को वहां से चले जाने को कहा। शिवजी ने कहा मैं भोजन कर अभी लौटता हूं। यह सुनकर ब्राह्मणों ने उनका निरादर किया। तब शिवजी ने वहां अपना कपाल रख दिया। ब्राह्मणों ने उसे बाहर फेंक दिया। इस पर वहां दूसरा कपाल उत्पन्न हो गया। ब्राह्मणों ने उसे भी फेंक दिया। तब वहां तीसरा कपाल उत्पन्न हो गया। इस पर वहां कपालों का ढेर लग गया। तब ब्राह्मणों को समझ में आया कि यह भगवान शिव का ही चमत्कार है। उन्होंने शिव की शतरुद्रिय से स्तुति की। शिवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि एक बार ब्रह्मा का पांचवां सिर काट देने पर मुझे ब्रह्महत्या लगी थी। उनका सिर मेरे हाथ से चिपक गया था। कई तीर्थों में स्नान करने पर भी नहीं छूटा। तब आकाशवाणी ने बताया कि महाकाल वन में गजरूप के पास बड़ा लिंग है, उसकी पूजा करो। तब वे वहां आये और उनके हाथ से कपाल अलग हो गया। उस लिंग का नाम कपालेश्वर रखा गया।
तब ब्राह्मणों ने उस शिवलिंग के दर्शन किए। कपालेश्वर महादेव की चौदस को पूजन करने से घोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं। जो उसका नित्य प्रति दर्शन करते हैं, उन्हें शिवलोक प्राप्त होता है।

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