धन व संतान के दाता हैं कामेश्वर महादेव

उज्जैन के गंधवती घाट पर स्थित कामेश्वर महादेव 84 महादेवों में 13वें नम्बर के महादेव हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्माजी ने सृष्टि की उत्पत्ति के लिए ध्यान किया। उनके अंश से काम उत्पन्न हुआ। ब्रह्मजी ने सृष्टि उत्पन्न करने के लिए प्रजापतियों को उत्पन्न किया। परन्तु उन्हें इस कार्य में अशक्त देखकर कामदेव को इस कार्य हेतु आज्ञा दी। इस पर कामदेव अदृश्य हो गये। तब ब्रह्मा ने श्राप दिया कि तुम शिव के क्रोध से भस्म हो जाओगे। तब कामदेव घबराकर वह फिर ब्रह्मा के पास गया। तब ब्रह्माजी ने उससे कहा कि तुम निम्न बारह स्थानों पर अनंग होकर रहोगे-स्त्रियों के कटाक्ष, केशराशि, जंघा, स्तन, नाभि, जंघामूल, अधर, कोयल की कूक, चांदनी, वर्षाकाल, चैत्र और वैशाखी महीना। इनके साथ स्त्रियों को लेकर कामदेव ने जगत को वशीभूत कर लिया। स्त्रियों के कारण ही दैत्यों और कामलोलुप मनुष्यों का पतन होगा। उन्होंने कामदेव को फूलों का धनुष और पंचबांध दिये। मन में उत्पन्न होने वाला कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ मछली का ध्वज लगाकर संसार के सब प्राणियों को जीतने के लिए चल पड़ा। वह शिवजी के पास पहुंचा। शिवजी ध्यान मग्न थे। तब वह उनके हृदय में प्रविष्ट हो गया। शिवजी का मन चंचल हो गया। उन्होंने विचार कर देखा कि कामदेव उनके हृदय में उपस्थित है। उन्होंने उसे दहन करने का सोचा। तब कामदेव सामने एक आम के वृक्ष के नीचे जाकर खड़ा हो गया। उसने शिवजी पर मोहन नामक बाण छोड़ा। इससे क्रुद्ध होकर शिवजी ने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से उसे भस्म कर दिया। उसे जलते देख उसकी पत्नी रति रोने लगी। तब आकाशवाणी हुई कि तुम रोओ मत और शिव की उपासना करो। इससे तुम्हारा पति पुन: जीवित हो जाएगा। तब रति ने शिवाजी की प्रार्थना की। शिवजी ने कहा इसने मेरे मन को विचलित किया था इस कारण मैंने इसे भस्म कर अंग रहित कर दिया है। यह अनंग रूप में महाकाल वन में जाकर शिवलिंग की उपासना करे। तब कामदेव ने अवंतिका में आकर एक लिंग की उपासना की। तब शिवजी ने प्रसन्न होकर कहा -तुम अनंग होकर भी कार्य में समर्थ रहोगे। कृष्णावतार के समय तुम रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्युन्न के रूप में जन्म लोगे। कामदेव द्वारा पूजित इस कामेश्वर लिंग के दर्शन पूजन से ऐश्वर्य, भोग, आरोग्य, संतति आदि प्राप्त होते हैं। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को उसकी उपासना करने से देवलोक प्राप्त होता है।

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