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Archive for the 'चेतन वाणी' Category

पांच साल का ये अपना इतिहास है
‘अपनी दिल्ली’ अपना है और खास है
इन्टरनेट से सारी दुनिया देख रही
पाठक का हमने पाया विश्वास है।

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वो आया और महफिल को ही लूट गया
जैसे कोई प्यार का झरना फुट गया
इश्मित के जाने से हमको लगता है
संगीत गगन का चम चम तारा टूट गया

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नोट उड़े संसद भवन, नेता बड़े महान
खतरे में हमको लगे, लोकतंत्र की शान
लोकतंत्र की शान, हुआ भारी घोटाला
पैसे लेकर नेता जी ने बदला पाला
कहे चेतन कविराय नोट की महिमा न्यारी
जीत गई सरकार, हार गई जनता सारी

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अमरिका से हो रहा परमाणु इकरार
जिसके कारण कष्ट में मोहन की सरकार
मोहन की सरकार सिंहासन डोल रहा है
दल बदलू जी खुल कर चांदी तोल रहा है
कह चेतन कविराय ये कैसी डेमोक्रेसी
जनता की हर दम होती है एसी तैसी

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अमरीकन इस डील से ऐसा मचा बबाल
मोहन की सरकार अब देखो है बेहाल
देखो है बेहाल महंगाई बात पुरानी
कांग्रेस और वामपंथ की एक कहानी
महंगाई से जनता का है ध्यान हटाना
छेड़ दिया परमाणु का नया बहाना

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विश्वविद्यालय एडमिशन क्‍या कहना
भटक रहा है तन और मन क्‍या कहना
लगता है पैरिस ही उतरा दिल्ली में
चहुंओर है फन ही फन क्‍या कहना

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मोहन जी की ये कैसी लाचारी है
महंगाई की जंग साथियो जारी है
कर्नाटक में कमल खिला देखा जबसे
लगता है अब लोकसभा की बारी है।

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नगर नोएडा लगता कुछ घबराया है
एक पिता ने रिश्ता नहीं निभाया है
निठारी को नहीं भुला हम पाए थे
आरूषि ने फिर से हमें रुलाया है

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अधिकारी भी चादर तानें लेटे हैं
नेतागण इक दूजे पर ऐठे हैं
जयपुर के ये बम धमाके बोल रहे
घर के दुश्मन घर में आकर बैठे हैं।

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सांस सांस देश पे चढ़ाने वालों को नमन
अठारह सौ सतावन भूल नहीं पाते हैं
लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे, जफ़र की कुर्बानी
गली-गली, गांव-गांव, घूम-घूम गाते हैं
देश के लिए जो तन-मन-धन वार गए
उन रण बांकुरों पे वारी-वारी जाते हैं
जिनकी शहादत से भारत आजाद हुआ
उन बलिदानियों को शीश हम झुकाते हैं।

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