गद्दी बचाने में जुटी शीला (अंक - 39)
May 6th, 2007 by admin
नई दिल्ली। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के राजनीतिक भविष्य का फैसला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद होना तय माना जा रहा है। इसी बीच कुछ समय की खामोशी के बाद शीला दीक्षित और उनके मंत्रिपरिषद के सहयोगियों ने एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मुख्यमंत्री और उनके विरोधी मंत्री इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। इस बार भी मोर्चा खोलने की शुरूआत मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की तरफ से ही हुई है। नगर निगम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी आलाकमान के समक्ष अपनी सफाई पेश करने पहुंची शीला दीक्षित ने हार के लिए अन्य कारणों के अलावा कुछ मंत्री व अधिकारियों को भी इसका जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की विजय सुनिश्चित करने के लिए उन्हें उम्मीदों पर खरा न उतरने वाले मंत्रियों को बदलने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने खास तौर पर योजना एवं शहरी विकास, परिवहन एवं ऊर्जा, खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के मंत्रियों का विशेष तौर पर जिक्र करते हुए कहा कि ये सभी विभाग जनता से सीधे जुड़े हुए हैं। जनता की अपेक्षा पर इनके खरा न उतरने की वजह से लोगों में इनके खिलाफ नाराजगी है, जिसे लोगों ने नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ वोट देकर प्रकट किया है। नगर निगम चुनावों में मतदान से पहले तक इन चुनावों को दिल्ली सरकार के कामकाज के मूल्यांकन का आधार मानने से साफ इंकार करने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आलाकमान के समक्ष स्वीकार किया है कि उनके मंत्रिपरिषद के कुछ सहयोगियों का कामकाज व कार्यप्रणाली सही न होने की वजह से राज्य सरकार के प्रति लोगों में नाराजगी बढ़ी है। भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक उन्होंने यह भी कहा है कि खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री ने अनधिकृत कालोनी, पुनर्वास बस्ती, व झुग्गी-झोंपड़ी वालों के राशन कार्ड बनवाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। जिसकी वजह से न तो इन लोगों के नाम मतदाता सूचियों में शामिल हो पाए और न ही मतदाता पहचान बन पाए। जिसकी वजह से कांग्रेस समर्थक मतदाता बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग करने से वंचित रह गए, जिसका खामियाजा पार्टी को नगर निगम चुनावों में भुगतना पड़ा है। मुख्यमंत्री ने यह शिकायत भी की है कि उनके मंत्रिपरिषद के छह में से चार मंत्री उन्हे न तो अपेक्षित सहयोग दे रहे हैं और न ही उनके निर्देशों का पालन कर रहे हैं। जिसकी वजह से वरिष्ठ अधिकारी भी अपने कामकाज में रूचि नहीं ले रहे हैं। इसका सीधा असर विकास संबंधी योजना व कार्यों पर पड़ रहा है। उन्होंने आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इस स्थिति को पार्टी हित के विरूद्ध बताते हुए कहा कि प्रशासन को चुस्त बनाने व सरकार की छवि सुधारने के लिए मंत्रिपरिषद में रद्दोबदल करना अनिवार्य है। कांग्रेस की राजनीति के जानकारों के अनुसार नगर निगम चुनावों में पार्टी की हार से लेकर बिजली निजीकरण जल बोर्ड के घोटालों तक में घिरी हुई मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपना अस्तित्व बचाने की अंतिम कोशिश कर रही है। यही वजह है कि वह अपने मंत्रियों को निशाना बनाने से भी नहीं चूक रही है। हालांकि वह यह अच्छी तरह से जानती हैं कि वह हारी हुई लड़ाई जीतने का प्रयास कर रही हैं। बावजूद इसके वह अपनी गद्दी बचाने की हर संभव कोशिश कर रही हैं। इसके लिए वह जहां एक ओर आलाकमान के सामने अपने मंत्रिपरिषद के सहयोगियों की कार्यप्रणाली संतोषजनक न होने का रोना रो रही हैं वहीं दूसरी ओर अपने विरोधी मंत्रियों का विश्वास जीतने का भी प्रयास कर रही है मगर मंत्री शीला दीक्षित के झांसे में आने को तैयार नहीं है। क्योकि पिछले अनुभव को देखते हुए वह अच्छी तरह से जानते हैं कि काम निकल जाने के बाद किसी को भी दूध में से मक्खी की तरह फेंक देना शीला दीक्षित की फितरत में शामिल है। यही वजह है कि वह मुख्यमंत्री के हर कदम पर सर्तकतापूर्ण नजर रखे हुए हैं। मुख्यमंत्री के अपने विरोधी मोर्चा खोलने के बाद उनके विरोधी मंत्रियों ने भी मोर्चा खोल दिया है। इन मंत्रियों ने आलाकमान के साथ ही अपने राजनीतिक आकाओं के दर पर दस्तक देकर यह कहना शुरू कर दिया है कि शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव लड़ने पर कांग्रेस का वही हश्र होगा जो नगर निगम चुनाव में हुआ है। पता चला है कि इन मंत्रियों ने आलाकमान से यह भी कहा कि बिजली निजीकरण और जलबोर्ड घोटालों में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की भूमिका की वजह से जनता के बीच दिल्ली सरकार की छवि दागदार हुई है। इन मंत्रियों का यह भी कहना था कि मुख्यमंत्री जिस प्रकार से बिजली वितरण कर रही निजी कंपनियों की वकालत करते हुए उनकी कमियों पर पर्दा डाल रही है, उससे लोगों के मन में यह विश्वास घर करता जा रहा है कि सरकार व निजी कंपनियों के बीच सांठगांठ अवश्य है। कांग्रेस के भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार आलाकमान ने दिल्ली में नेतृत्व परिवर्तन व मंत्रिपरिषद में रद्दोबदल करने के बारे में शीघ्र ही फैसला लेने का भरोसा दिलाया है। वर्तमान परिस्थितियों में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के लिए आलाकमान का विश्वास प्राप्त कर पाना टेढ़ी खीर ही लगता है। बावजूद इसके उनके करीबियों को लगता है कि पिछले मौकों की तरह ही इस बार भी वह बाजी जीतने में सफल रहेंगी। शीला दीक्षित की गद्दी बचती है या नहीं यह तो समय ही बताएगा मगर मंत्रिपरिषद में रद्दोबदल होने की प्रबल संभावनाओं को देखते हुए मंत्री बनने के दावेदार वरिष्ठ विधायकों ने भी लाबिंग तेज कर दी है और वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के घर पर नियमित रूप से हाजिरी लगा रहे हैं।