हाथी में है दम, बाकी सब हैं कम (अंक - 40)
May 12th, 2007 by admin
नई दिल्ली। तमाम चुनावी अटकलों व सर्वेक्षणों को धता बताते हुए उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर कब्जा कर लिया है। बसपा के मदमस्त ‘हाथी’ के मजबूत पैरो के तले आकर न केवल समाजवादी पार्टी की साइकिल टूट गई बल्कि भारतीय जनता पार्टी का ‘कमल’ भी मुरझा गया। हाथी के प्रभाव से कांग्रेस का हाथ भी चोटिल होने से बच नहीं पाया। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनावों में बसपा सुप्रीमों मायावती ने अगड़ी व पिछड़ी जातियों को मिलाकर सोशल इंजीनियरिंग के जिस फार्मूले का प्रचार किया था वह समाजवादी पार्टी व भाजपा सहित अन्य तमाम राजनीतिक दलों पर भारी पड़ा। इसे मायावती की सूझ-बूझ और दूरदर्शिता ही कहा जाएगा कि उन्होंने अपनी पार्टी को केवल दलित व पिछड़े वर्गों तक सीमित रखने के बजाय उससे सवर्णों को जोड़ने का काम किया। इसके लिए उन्होंने न केवल बसपा के हाथी को गणेश का नाम दिया बल्कि ‘जय भीम जय भारत’ का नारा छोड़कर ब्रह्मास्न, विष्णु, महेश का नारा दिया। दरअसल उन्होंने जीतने वाली सीटों पर ब्राह्माण उम्मीदवार को टिकट दिया और दलितों से उनके पक्ष में मतदान कराया। उनकी यह रणनीति पूरी तरह से कारगर साबित हुई। अपनी इस रणनीति के तहत ही मायावती ने ‘ब्राह्माण शंख बजाएगा और हाथी आगे जाएगा।’ का नया मंत्र फूंका जिसका चुनाव परिणाम पर सीधा असर दिखाई दिया। राजनीति प्रेक्षकों का यह भी मानना है कि मंत्रिपरिषद के गठन में मायावती अगड़ी जातियों को उचित प्रतिनिधित्व देंगी। इसके संकेत उन्होंने अपने पहले संवाददता सम्मेलन में दिए हैं।
प्रेक्षक उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम को प्रदेश की राजनीति में आए सुब्द बदलाव के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि 14 साल में यह पहला अवसर है जब मतदाताओं ने किसी एक दल को स्पष्ट रूप से पूर्ण बहुमत दिया है। उनका यह भी मानना है कि इस बार चुनाव आयोग की सख्ती और कम मतदान होने का भी बसपा को फायदा मिला है। आयोग ने चुनाव में धांधली रोकने और निष्पक्ष मतदान के संबंध में जो भी कदम उठाए थे उसकी वजह से लोग निर्भय होकर मतदान करने के लिए आगे आए। इस बार के चुनाव में मायावती ने जहां भाजपा के सवर्णों के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाबी हासिल की वहीं उन्होंने इस मिथ्य को भी तोड़ दिया कि उत्तर प्रदेश केञ् अल्प संख्यक पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के ही साथ हैं। इन चुनावों में अल्पसंख्यकों ने खुलकर बसपा के समर्थन में मतदान किया। विधानसभा चुनावों के दौरान मायावती ने न केवल लोगों को मुलायम के गुंडाराज से मुख्ति दिलाने का भरोसा दिलाया बल्कि उन्होंने साथ में आने पर मुलायम सिंह यादव उनके सिपहसालार अमर सिंह व अन्य खासमखास लोगों को जेल भेजने का वादा भी किया। उन्होंने मुलायम सिंह यादव व उनकी सरकार के खिलाफ बेहद आक्रामक रवैया अपनाया। जिसके बल पर वह लोगों का भरोसा जीतने में सफल रहीं। विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होते ही इस बात के कयास तो लगाए ही जा रहे थे कि बसपा की स्थिति समाजवादी पार्टी व भाजपा के मुकाबले मजबूत है। मगर यह माना जा रहा था कि बसपा समाजवादी पार्टी के बीच कांटे की टक्कर होंगी और भाजपा अपनी स्थिति पहले से ज्यादा सुधरेगी मगर चुनाव परिणाम ने सभी कयास गलत साबित कर दिए। मायावती के साथ में आने के बाद से मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह व उनके नजदीकी लोगों की परेशानियां बढ़ना स्वभाविक ही है। इसकी बानगी चुनाव परिणाम आते ही नजर आने लगी थी। बसपा की बढ़त का समाचार सुनते ही अमर सिंह अपनी गाड़ी की पिछली सीट के नीचे मुंह छिपाकर लोगों से बचते हुए नजर आये। वहीं लखनऊ में मुलायम सिंह सरकार के संसदीय कार्यकारी मंत्री बडबोले आजम खां ने विधानसभा परिसर में स्थित अपने कार्यालय में रखी हजारों सरकारी फाइले फड़वा दी। दरअसल उन्हें डर था कि इन फाइलों में रखे दस्तावेजों को हथियार बनाकर मायावती मुलायम सिंह व उनके मंत्रिपरिषद में सहयोगी रहे लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराके उन्हें जेल भिजवाने का बंदोबस्त कर सकती हैं। मायावती ने फाइले फाड़े जाने के मामले की जांच कराने को कहा हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी दोहराया है कि वह चुनावी वादों को अवश्य पूरा करेंगी। उनके इस कथन को मुलायम सिंह यादव व अमर सिंह के लिए चेतावनी के रूप में भी देखा जा सकता है। जानकारों के अनुसार मुख्यमंत्री के रूप में इस बार न केवल मायावती अपनी पारी मजबूती के साथ खेलेंगी बल्कि वह परिपक्वता का परिचय भी देंगी। प्रशासक के रूप में तो वह पहले भी ख्याति प्राप्त कर चुकी हैं। उनके सामने राज्य में भयमुक्त वातावरण बनाने के साथ ही विकास करने की चुनौती होगी। देखना यह है कि वह इस चुनौती से किस प्रकार से उबरेगी।