खटाई में पड़ता जा रहा है अनधिकृत कालोनियों का मामला (अंक 41)
May 21st, 2007 by admin
नई दिल्ली। दिल्ली की लगभग 1500 अनधिकृत कालोनियों में रहने वाले38-40 लाख लोगों को रिझाने के लिए केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने मास्टर प्लान के तहत इन सभी कालोनियों को नियमित करने की घोषणा की थी। मगर इन कालोनियों के नियमित होने की राह में अभी भी कई अड़चनें पेश आ रही हैं। हालांकि केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी व शहरी विकास राज्यमंत्री अजय माकन अब इन कालोनियों को नियमित करने और मास्टर प्लान 2021 के तहत इस बारे में प्रावधान करने की बात दोहरा रहे हैं। बावजूद इसके अदालती रूख, स्थानीय निकाय, दिल्ली सरकार और केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के रवैये से तो ऐसा ही लगता है कि उनकी निकट भविष्य में इन कालोनियों को नियमित करने में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। दिल्ली की राजनीति के जानकारों के अनुसार वोट बैंक की राजनीति की वजह से राजनीतिक दल अनधिकृत कालोनियों के मुद्दे को लटकाए रखना चाहते हैं ताकि इसे चुनाव में कैश कराया जाए। अगर अनधिकृत कालोनियों को नियमित कर दिया गया तो यह मुद्दा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा और इन कालोनियों में रहने वाले लोगों को बरगलाना आसान नहीं होगा। दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने की घोषणा तो कर दी मगर इस संबंध में आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने और नियमितकरण की प्रक्रिया शुरू करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया है। मंत्रालय ने इस संबंध में अभी तक अदालत को भी अपनी नीति से अवगत नहीं कराया है। उल्लेखनीय है कि अदालत ने न केवल विकास शुल्क लिए बिना अनधिकृत कालोनियों को नियमित न करने का आदेश जारी किया हुआ है बल्कि वह मास्टर प्लान 2021 के प्रावधान की समीक्षा भी कर रही है। गौरतलब है कि 1993 में भारतीय जनता पार्टी के विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता में आने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना ने अपने मंत्रिपरिषद की पहली ही बैठक में 1071 अनधिकृम कालोनियों को नियमित करने का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार के पास भेजा था। अभी केन्द्र सरकार इस प्रस्ताव पर विचार कर ही रही थी कि कॉमन काज संस्था के बैनर तले एस.डी. शौरी ने इस संबंध में अदालत में एक जनहित याचिका दायर कर दी। इस याचिका में अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने के विरूद्ध स्थगन आदेश जारी करने का अनुरोध किया गया था। जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। अदालत ने स्थगन आदेश जारी करने के साथ ही अनधिकृत कालोनियों में बसी आबादी और उन्हें नियमित करने के एवज में लिए जाने वाले विकास शुल्क की दर का ब्यौरा मांगा था। मगर न तो केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय और न ही दिल्ली सरकार इस संबंध में अदालत को कोई संतोषजनक जवाब दे पाई है। दिल्ली सरकार के अधिकारी के अनुसार नगर निगम के पास इन अनधिकृत कालोनियों में से अधिकांश के नक्शे ही उपलब्ध नहीं हैं। दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग के पास भी इस बात के पुख्ता दस्तावेज नहीं है कि कौन सी अनधिकृत कालोनी सरकारी जमीन पर बनी है और कौन सी निजी जमीन पर। सरकार अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने के एवज में लिए जाने वाले शुल्क की दर के बारे में भी कोई फैसला नहीं ले पाई है। क्योंकि कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में बार-बार यह वादा किया है कि सभी अनधिकृत कालोनियों को 1977 की नीति के आधार पर विकास शुल्क लिए बिना ही नियमित किया जाएगा। दूसरी ओर शहरी विकास मंत्रालय का कहना है कि विकास शुल्क तय करना दिल्ली सरकार का काम है, जबकि अनधिकृत कालोनियों का ले-आउट प्लान नगर निगम को बनाना है। दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल विजय कपूर का मानना है कि केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय और दिल्ली सरकार ने जनता की वाहवाही लूटने के लिए जल्दबाजी में अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने की घोषणा तो कर दी मगर इस संबंध में जरूरी प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं की गई है। उनके अनुसार इन कालोनियों में बुनियादी नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने के लिए नगर निगम, दिल्ली जल बोर्ड, ऊर्जा विभाग, दिल्ली विकास प्राधिकरण व केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारियों का एक कार्यदल गठित करना चाहिए। यह कार्यदल अनधिकृत कालोनियों का अध्ययन करने के बाद तय करेगा कि इन कालोनियों में पानी व सीवर की लाइनें कहां और कैसे बिछाई जाएंगी। वहां आंतरिक सड़के, गलियां व पार्क कहां-कहां बनाए जाएंगे। इसके साथ ही यह दल इन कालोनियों में मुहैया कराई जाने वाली सुविधाओं के एवज में लिए जाने वाले विकास शुल्क की दर भी निर्धारित करेगा। श्री कपूर के अनुसार 1977 में जिन 615 अनधिकृत कालोनियों को नियमित किया गया था उनसे भी विकास शुल्क लेने का फैसला लिया गया था। कुछ कालोनियों के निवासियों ने यह शुल्क जमा भी करवाया था। यह बात दीगर है कि बाद में राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से विकास शुल्क वसूलने का मामला खटाई में पड़ गया। उनका यह भी कहना है कि इस बार अनधिकृत कालोनियों को नियमित करते समय विकास शुल्क लेने के साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में और अनधिकृत कालोनियां न बसने पाएं। हालांकि कांग्रेस के नेताओं का अभी भी यह कहना है कि अनधिकृत कालोनियों को विकास शुल्क लिए बिना ही नियमित किया जाएगा।