अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र का शिकार हो रहा है कृषि उद्योग (अंक 43)
Jun 5th, 2007 by admin
नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी आलाकमान और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से बुरी तरह से खफा हो गए हैं, जिसकी वजह से वसुंधरा की गद्दी खतरे में पड़ गई है। राजस्थान में गुर्जरों को आरक्षण देने के मुद्दे पर भड़के जातिय दंगों को केंन्द्र सरकार ने भी गंभीरता से लिया है। केन्द्र ने इस संबंध में गुप्तचर ब्यूरों से अपने स्तर पर जांच कराने के साथ ही राजस्थान के राज्यपाल से हालात के बारे रिपोर्ट मांगी है। इसकी वजह से भी वसुंधरा की गद्दी पर खतरे के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। राजस्थान में गुर्जरों को आरक्षण देने के मुद्दे को लेकर भड़के जातीय दंगों में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की भूमिका को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह व साहिब सिंह ने मोर्चा खोल दिया है। इन दोनों ने ही स्थिति से निपटने में मुख्यमंत्री की सक्षमता को मुद्दा बनाकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन दोनों के अलावा भाजपा के अन्य शीर्ष नेता वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग को लेकर आलाकमान पर दबाव बना रहे हैं। पार्टी में उठे वसुंधरा विरोधी बवंडर के कारण आलाकमान जबदस्त दबाव महसूस कर रहा है। उत्तर-प्रदेश चुनावों में भाजपा की जबरदस्त हार के कारण पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह खुद भी विरोधियों के निशाने पर हैं, ऐसे में अगर वह वसुंधरा के बचाने का प्रयास करेंगे तो पार्टी में आंतरिक गुटबाजी और कलह तेज हो जाएगी।भाजपा शीर्षस्थ नेताओं का मानना है कि गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग को लेकर इस समुदाय की ओर से शुरू किए गए आंदोलन की गंभीरता का आकलन लगाने व उससे निपटने में वसुंधरा राजे पूरी तरह से विफल रही हैं। इतना ही नहीं गुर्जरों की ओर से चलाए जा रहे आंदोलन को कुलने के लिए जिस तरह से मीणा समुदाय के लोग बीच में कूदे हैं और उसके बाद राज्य में जातीय आंदोलन भड़कने से जनता में यह संदेश गया है कि मीणा समुदाय को मुख्यमंत्री का आशीर्वाद प्राप्त है। इन नेताओं ने आलाकमान को यह भीी बताया कि मीणा समुदाय को गुर्जरों के खिलाफ मैदान में उतारने और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की विफलता को आधार बनाकर केंन्द्र राज्य सरकार को बर्खास्त करने जैसा कदम भी उठा सकता है। सहयोगी दलों का सहयोग न मिलने और राजनीतिक मजबूरीवश अगर केंन्द्र ने राजस्थान सरकार को बर्खास्त करने जैसा कदम न भी उठाया तब भी वह इस संबंध में गुप्तचर ब्यूरो और राज्यपाल की रिपोर्ट को आकार बनाकर राज्य सरकार को इस मोर्चे पर विफल रहने के मामले को तूल अवश्य देगा।इतना ही नहीं राजस्थान के घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस भाजपा के खिलाफ काफी आक्रामक रवैया अपना सकती है। इन नेताओं का यह भी कहना है किआलाकमान के संकेत पर फिलहाल राजस्थान में वसुंधरा राजे विरोधी मंत्री व अन्य नेता खामोश हैं मगर वह अधिक दिन तक खामोश रहेंगे ऐसा सोचना आलाकमान की खुशफहमी के सिवाए कुछ नहीं होगा। कलराज मिश्र के स्थान पर गोपीनाथ मुंडे को राजस्थान का प्रभारी बनाए जाने की वजह से भी वसुंधरा राजे की परेशानी काफी बढ़ गर्ई है वसुंधरा के विरोधी गोपीनाथ मुंडे की नियुक्ति से काफी खुश हैं। उनका मानना है कि श्री मुंडे राज्य में सभी की आवाज व भावनाओं का ध्यान रखेंगे और उसी के अनुरूप ही आलाकमान को अपनी रिपोर्ट देंगे। उल्लेखनीय है कि लखनऊ में आयोजित भाजपा राष्ट्रीय परिषद की बैठक के दौरान वसुंधरा राजे ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को बखान करने वाले जो ‘आईना’ पत्रिका वितरित कराई थी, उसमें लाल कृष्ण आडवाणी व संघ परिवार की आलोचना करने वाले लेख की कतरन भी छप गई थीं। तब इस मामले को लेकर भाजपा के साथ ही संघ परिवार में भी बवेला मच गया था। मगर तब भाजपा के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी वसुंधरा के सिर पर अपना वरद्हस्त रख दिया था। जिसकी वजह से भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह व राजस्थान के तत्कालीन प्रभारी कलराज मिश्र इस मामले को ठंडा करने में जुट गए थे। आलाकमान के रुख को देखते हुए तब राजस्थान के असंतुष्ट नेता खामोश हो गए थे। इस मामले की गूंज अभी पूरी तरह से बंद भी नहीं हुई थी कि पिछले दिनों वसुंधरा को देवी रूप में दिखाने वाले कलेंडर के प्रकाशन ने भाजपा की राजनीति में एक बार फिर से तूफान खड़ा कर दिया। उनके इस फैसले की जहां भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कड़ी आलोचना करते हुए इसे अमर्यादित करम बताया वहीं राज्य में मुख्यमंत्री विरोधियों को एक हथियार मिल गया। जिसे लेकर उन्होंने वसुंधरा राजे के खिलाफ नए सिरे से आक्रमण बोल दिया। अभी मुख्यमंत्री इस हमले से पूरी तरह से संभल भी नहीं पाई थी कि गुर्जरों द्वारा शुरू किया गया आंदोलन जातीय संघर्ष में तब्दील हो गया। जिसकी वजह आग की चपेट में आकर राजस्थान धू-धू कर जलने लगा। इस आग की लपटें मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सिंहासन की ओर भी बढ़ रही हैं। भाजपा के विश्वस्त सूत्रों के अनुसार राजस्थान में हालात सुधरने के तुरंत बाद वसुंधरा राजे के भाग्य का फैसला किया जाएगा। वैसे हर बार की तरह इस बार भी भाजपा वसुंधरा राजे के बारे में दो खेमों में बंटती नजर आ रही है। बावजूद इसके आलाकमान के लिए वसुंधरा राजे का उनके पद से हटाने के संबंध में पड़ने वाले दबाव की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। भाजपा नेता वसुंधरा राजे के भविष्य के बारे में फैसला लेने की माथा पच्ची में उलझे हुए हैं। इसी बीच केंन्द्रीय गृह मंत्रालय ने गुप्तचर ब्यूरों से गुर्जरों के आंदोलन के हिंसक हो जाने और राज्य में जातीय संघर्ष फैलने के कारणों के बारे में रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। गृह मंत्रालय ने स्थिति से निपटने में राज्य सरकार की विफलता के बारे में वहां के राज्यपाल से भी रिपोर्ट मंगवाई है। इन दोनों रिपोर्ट के आधार पर ही केंन्द्र सरकार राजस्थान की स्थिति के बारे में आकलन करने के साथ ही वहां उठाए जाने वाले कदमों के बारे में कोई फैसला लेगी। दिल्ली में साथ के गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि केंन्द्र सरकार राजस्थान में हालात बिगड़ने का ठीकरा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सिर पर फोड़ने के साथ ही इस मामले में भाजपा को भी कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करेगी। जिससे आने वाले दिनों में वसुंधरा राजे व भाजपा दोनों को ही परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति भाजपा के लिए उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनावों में हुई दुर्गति के बाद एक और बड़े झटके के समान होगी।