संकट में वसुंधरा (अंक 43)
Jun 5th, 2007 by admin
नई दिल्ली। भारतीय कृषि व किसान दोनों ही अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र का शिकार हो गए हैं। जिसकी वजह से कर्ज के कुचक्र और भुखमरी से तंग आकर देश के किसान आत्महत्या कर रहे हैं और जरूरतें पूरी करने के लिए भारत को विदेशों से खाद्यान्न का आयात करना पड़ रहा है। विदेशी दबाव में आकर ही वित्त मंत्रालय और योजना आयोग ने ऐसी नीतियां लागू की हैं जिसकी वजह से कृषि पर आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह से चरमरा गई है। सरकार की उपेक्षा के कारण कृषि व किसान दोनों दुर्दशा का ही शिकार नहीं हुए हैं बल्कि सकल घरेलू उत्पादन में भी इनका योगदान केवल नाममात्र का रह गया है। भारतीय कृषि व किसान के खिलाफ विदेशी षड़यंत्र का इसी से पता चलता है कि आए दिन कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के किसान सरकार की उपेक्षा के कारण कर्ज के दलदल में बुरी तरह से फंस गए हैं। जिससे मुक्ति पाने के लिए वह मृत्यु को गले लगा रहे हैं। अपनी आर्थिक नीतियों व कार्यक्रम के बल पर भारतीय अर्थव्यवस्था केञ् फलने-फूलने और उच्च विकास दर का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपाने वाले वितमंत्री पी. चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया शायद यह भूल गए हैं कि जब तक इस देश में कृषि क्षेत्र की स्थिति और किसान की हालत नहीं सुधरेगी तब तक देश की अधिकांश जनता बदहाल ही रहेगी।जानकारों का मानना है कि कृषि प्रधान देश के वित्तमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने अब किसानों को बिजली व पानी पर दी जाने वाली सホसिडी में कटौती करने की सिफारिश की है। अगर सरकार ने इनकी सिफारिश मान ली तो किसानों की स्थिति और भी खराब हो जाएगी।अर्थ जगत के विशेषज्ञ और विदेश मामलों के जानकारों के अनुसार ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे पता चला है कि अमेरिका व उसके कुछ साथियों की इच्छानुसार ही भारत की कृषि नीति बनाई जा रही है। सरकार की गलत नीतियों के कारण ही किसान फास्फेट खाद के स्थान पर यूरिया का उपयोग करने लगे हैं। जिससे खेतों में जमीन का उपजाऊपन कम होता जा रहा है। जिसकी वजह से किसान अपनी खेती योग्य जमीन बेचने पर मजबूर हो गए हैं। आए दिन देश भर में बनने वाले नए टाउनशिप, बड़े-बड़े माल व अन्य व्यवसायिक निर्माण इस बात का जीता जागता सबूत है कि अब किसानों को अपनी जमीन से ज्यादा लगाव नहीं रह गया है। यही वजह है कि यह अपनी खेती योग्य जमीन बेचने के लिए अब आसानी से तैयार हो जाते हैं।इन विशेषज्ञों के अनुसार भारत की आर्थिक नीतियों की तरह ही अमेरिका उसकी कृषि नीति को भी प्रभावित कर रहा है। दरअसल अमेरिका ऐसा कर एक तीर के साथ दो शिकार करने की नीति पर चल रहा है। इराक पर हमले और ईरान के साथ बढ़ते टकराव के कारण खाड़ी के देशों में अमेरिका के प्रति मैत्री की भावना खत्म हो गई है। जिसकी वजह से अमेरिका को लगता है कि आने वाले समय में उसके लिए पेट्रोलियम पदार्थ प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए उसने 2021 तक पेट्रोलियम पदार्थ के विकल्प के रूप में 25 फीसदी वाहनों में प्रोपलेन का उपयोग करने की योजना बनाई है। प्रोपलेन मक्का के पौधों में से तैयार होता है। इसके मद्देनजर अमेरिका ने भारत को ऐसी कृषि नीति अपनाने पर बाध्य किया है जिससे भारतीय किसान गेहूं और अन्य खाद्यान्न का उत्पादन करने के बजाय मक्का की फसल पैदा करें। यही वजह है कि पहले तो उसने भारत सरकार को गेहूं की फसल के लिए लाभकारी फास्फेट खाद के दाम इतने अधिक बढ़ाने के लिए दबाव बनाया जिससे किसान उसका उपयोग न कर पाएं। इसके साथ ही उसने अन्य खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी भी कम करा दी। जिसकी वजह से किसानों के लिए खेती करना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। यही वजह है कि भारत में खाद्यान्न उत्पादन कम होता जा रहा है और लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए इनका आयात करना पड़ रहा है।अगर समय रहते सरकार ने विदेशी दबाव से मुक्त होकर कृषि व किसानों की दशा सुधारने के लिए आवश्यक सभी कदम नहीं उठाए तो वह दिन दूर नहीं जब ‘भारत किसानों का देश’ यह बात केवल किताबों तक ही सीमित रह जाएगी और वास्तविकता इसके ठीक विपरीत दिखाई देगी।