अटल आडवाणी ने खुफिया तंत्र को पंगु बनाया (अंक 48)
Jul 10th, 2007 by admin
नई दिल्ली। दिन रात देशप्रेम का राग अलापने और शासक दल पर खुफिया तंत्र का बेज़ा इस्तेमाल करने का आरोप लगाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने न केवल खुफिया तंत्र को पूरी तरह से पंगु बना दिया था बल्कि देश की सुरक्षा को भी खतरे में डालने से गुरेज नहीं किया।
इतना ही नहीं इन दोनों ने कारगिल षडयंत्र रचने के संबंध में पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ और उनके लेफटीनेंट जनरल मोहम्मद अजीज के बीच हुई बातचीत का टेप भी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भिजवा दिया। जिसकी वजह से पाकिस्तान को अपने यहां चलार्ई जा रही भारतीय खुफिया तंत्र की गतिविधियों की जानकारी मिल गई और उसने भारतीयों को सूचना मुहैया कराने वाले सरकारी स्त्रोतों पर रोक लगा दी।
राष्ट्रिय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के शासनकाल के दौरान प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के बीच भले ही कुछ मुद्दों पर मतभेद दिखाई देते हों मगर खुफिया तंत्र को पंगु बनाने और पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी दिखाने के मामले में दोनों पूरी तरह से एकमत थे। यह आरोप वाजपेयी, आडवाणी व राजग के विरोधियों ने नहीं लगाए हैं बल्कि यह सनसनीखेज खुलासा किया है देश की प्रमुख खुफिया एजेंसी ‘रा’ के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी मेजर जनरल वी.के. सिंह ने।
उन्होंने ‘रा’ छोडऩे के बाद लिखी अपनी पुस्तक ‘एक्सटर्नल इंटेलीजेंस, सीक्रेटस ऑफ रिसर्च एंड एनालाइसिस विंग’ में किया है। इस पुस्तक में राजग सरकार के सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगाए गए हैं।
मेजर जनरल वी.के. सिंह के अनुसार जब हमारी सेना के जवान कारगिल में पाकिस्तान की सेना से लोहा ले रहे थे ठीक उसी दौरान विदेश मंत्रालय के विवेक काटजू व रिलायंस ग्रुप आफ इंडस्ट्रीज के आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के कर्ताधर्ता आर.के. मिश्रा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को एक टेप और ऐसे अन्य दस्तावेज सौंप रहे थे जिनमें बताया गया था कि कारगिल युद्घ की साजिश पाक सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने रची है।
नवाज शरीफ को खुफिया तंत्र के जांबाज जासूसों द्वारा अपनी जान पर खेल कर जुटाई गई इतनी महत्पूर्ण और गोपनीय सूचनाएं सौंपने का फैसला अटल बिहारी वाजपेयी ने आडवाणी व सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा से विचार विमर्श करने के बाद लिया था। इस बैठक में रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज भी मौजूद थे।
गौतरतब है कि कारगिल युद्घ शुरू होने से पहले तक जार्ज फर्नाडीज बार-बार यही दोहरा रहे थे कि कश्मीर में पाकिस्तान की सेना नहीं घुसी है। वह तो कारगिल में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी की सूचनाओं को भी सिरे से खारिज करते आ रहे थे। रक्षामंत्री के इस तरह के रवैये की कीमत भारतीय जवानों को अपने खून से अदा करनी पड़ी।
मेजर जनरल वी.केञ्. सिंह के मुताबिक जिस वक्त भारत की ओर से नवाज शरीफ को जनरल परवेज मुशर्रफ और लेफटिनेंट जनरल मोहम्मद अजीज के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के टेप और अन्य दस्तावेज सौंपे गए थे, उस वक्त तथा पाकिस्तानी शासक बार-बार एक ही बात कह रहे थे कि कारगिल की घटनाओं के पीछे उनकी सेना का कोई हाथ नहीं है। वहां तो आतंकवादी संगठन स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर रहे हैं।
अगर यह दस्तावेज पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को सौंपने की बजाय उजागर कर दिए जाते तो पाक का चेहरा सबके सामने बेनकाब किया जा सकता था। मगर भारतीय शासकों ने ऐसा करने की बजाय उन्हें नवाज शरीफ को सौंपना ही बेहतर समझा। यह दस्तावेज मिलने के बाद से ही पाकिस्तानी सरकार अपने यहां सक्रिय भारतीय खुफिया तंत्र के सूत्र व स्त्रोतों का सफाया करने में जुट गई। जिसका नतीजा यह निकला कि भारतीय खुफिया तंत्र को पाकिस्तान की भारत विरोधी गतिविधियों की जानकारी मिलनी बंद हो गई।
इतना ही नहीं पाकिस्तान को भारत के खुफिया तंत्र की संचार माध्यमों में सेंध लगाने की तकनीक व क्षमता की जानकारी भी मिल गई। इससे भारतीय खुफिया तंत्र की मुहिम को गहरा धक्का लगा। इसकी भरपाई हो पाना काफी मुश्किल है। मेजर जरलन वी.के. सिंह ने अपनी इस पुस्तक में राजनेताओं के चेहरे को बेनकाब करने के साथ ही यह भी बताया कि इन नेताओं की नजर में देश की सुरक्षा से महत्वपूर्ण स्वयं की छवि निखारना रहा है। जिसकी वजह से बार-बार खुफिया तंत्र को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। यह देश की सुरक्षा के लिए कभी भी घातक साबित हो सकता है।
इस पुस्तक में कारगिल युद्घ के बारे में बार-बार भ्रामक बयान देने और स्थिति के बारे में गुमराह करने पर तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज को कटघरे में खड़ा किया है। पुस्तक में कहा गया है कि खुफिया तंत्र को तबाह करने के लिए राजग सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान बार-बार प्रयास किए गए।
कारगिल युद्घ केञ् संबंध में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को महत्वपूर्ण व गोपनीय दस्तावेज सौंपने का फैसला लेने से पहले भी अटल बिहारी वाजपेयी ने खुफिया तंत्र को पाकिस्तान में अपनी सारी गतिविधियां बंद करने के निर्देश दिए थे। जिनका खुफिया तंत्र के अधिकारियों को पालन करना पड़ा। मेजर जनरल वी.के. सिंह के अनुसार इस प्रकार के निर्देश लाहौर बस यात्रा से लौटने के तुरंत बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने दिए।
ऐसा लगता है कि वाजपेयी ने यह मान लिया था कि उनकी लाहौर बस यात्रा से भारत व पाक के बीच संबंध सुधर जायेंगे। वाजपेयी के इस निर्देश का पालन करने पर खुफिया तंत्र के वर्षों की मेहनत से पाकिस्तान में बनाएं गए सूत्र व स्त्रोत खत्म हो गए। दरअसल राजनेताओं को इस बात का गुमान तक नहीं है कि दूसरे देश में खुफिया सूत्र व स्त्रोत बनाने में खुफिया तंत्र को सालों तक जी तोड़ मेहनत करने के अलावा अपने कई जांबाज जासूसों से भी हाथ धोना पड़ता है। एक बार अगर खुफिया तंत्र के सूत्र व स्त्रोत समाप्त हो जाएं तो उन्हें दुबारा से बनाना आसान नहीं होता है। इससे खुफिया तंत्र को अपना काम करने में काफी कठिनाई आती है। पुस्तक के अनुसार एक तरफ अटल बिहारी वाजपेयी ‘रा’ को तबाह करने में जुटे थे वहीं लालकृञ्ष्ण आडवाणी ने गुप्तचर ब्यूरों के अधिकारियों को अपना निजी सेवक बना दिया था। आडवाणी ने गुप्तचर ब्यूरो के अधिकारियों से सभी कामकाज छोड़कर केञ्वल उनके इशारों पर नाचने पर मजबूर कर दिया।
तब गुप्तचर ब्यूरो का एक ही काम रह गया था। वह था आडवाणी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को ठिकाने लगाने के साथ ही उप-प्रधानमंत्री व उनके परिवार की सुरक्षा व्यवस्था को अभेद बनाना। जिस समय ‘रा’ और गुप्तचर ब्यूरो को नकरा बनाया जा रहा था उस वक्त सीमापार से आतंकवाद अपने पूरे जोर पर था मगर न तो प्रधानमंत्री और नही ही उप-प्रधानमंत्री को इसकी परवाह थी। वह तो देश की बाहरी व आंतरिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी खुफिया तंत्र को नकारा बनाने में जुटे हुए थे।
मेजर जनरल वी.के. सिंह ने अपनी इस पुस्तक में राजग सरकार के कार्यकाल के दौरान ‘रा’ व गुप्तचर ब्यूरो को खोखला बनाने केञ् संबंध में किए गए वाजपेयी व आडवाणी के प्रयासों का खुलासा करने के साथ ही खुफिया तंत्र की प्रणाली के बारे में भी कई सवाल उठाए हैं। पुस्तक के मुताबिक ‘रा’ और गुप्तचर ब्यूरो के अधिकारी राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं।
इसके अलावा इन संस्थाओं में नेतृत्व व जवाबदेही का भी अभाव है। मेजर जनरल सिंह के अनुसार प्रधानमंत्री के लिए गोपनीय सूचना तंत्र नेटवर्क स्थापित करने के संबंध में ‘रा’ के अधिकारियों ने अपना काम सही ढंग से नहीं किया।
मई 2001 में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में तैनात स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) ने 26.2 करोड़ रुपये की लागत से उन्नत किस्म की संचार प्रणाली खरीदने का फैसला लिया था। इस संबंध में ‘रा’ को सबसे बेहतर प्रणाली की शिनाख्त और उसका मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
उस वक्त अमेरिका की ‘मोटरोला’ कंपनी इस प्रकार की संचार प्रणाली मुहैया कराने की प्रमुख दावेदार कंपनी थी। इस कंपनी कें संचार उपकरणों की जांच करने का कोई प्रयास नहीं किया गया कि यह प्रणाली पूरी तरह से गोपनीय रहे। मेजर जनरल सिंह के प्रबल विरोध को देखते हुए उस वक्त मोटरोला के उपकरणों की खरीद स्थगित कर दी गई। मगर उनके सेवानिवृत होते ही मोटरोला को उपकरण मुहैया कराने का आर्डर दे दिया गया।