कोर्ट को अंधेरे में रख रही है सरकार (अंक 11)
Oct 22nd, 2007 by admin
नर्ई दिल्ली। दिल्ली सरकार ने अपनी कैबीनेट बैठक में ब्ल्यू लाइन बसों की जगह वर्ष 2009 तक भले ही 4500 नई एसी बसें खरीदने की मंजूरी दे दी हो, लेकिन यह मंजूरी उच्च न्यायालय को अंधेरे में रखने के सिवा और कुछ नहीं है। क्योंकि जिन बसों को खरीदने की घोषणा सरकार कर रही है वह आज नहीं बल्कि दो साल पहले ही बनाई जा चुकी है। यहां तक कि इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट सिस्टम के तहत नई करीब 1100 बसों की खरीद करने की मंजूरी सरकार द्वारा करीब छह माह पहले ही दी जा चुकी है। बावजूद इसके सरकार अब कोर्ट के डंडे पड़ने के बाद उसी की आंख में धूल झोंकने का काम कर रही है।
यह बात दीगर है कि सरकार पहले राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर एसी बसों को खरीदने की घोषणा कर रही थी, मगर अब यह काम ब्ल्यू लाइन बसों को हटाने के नाम पर कर रही है। बाकी सब कुछ वही है। पहले भी सरकार का लक्ष्य वर्ष 2009 ही था और अब अदालत की फटकार के बाद भी सरकार 2009 तक ही 4500 बसों की खरीदने का एलान कर रही हैं।
सरकार की तबकी और अबकी घोषणा में अगर कुछ फर्क है तो सिर्फ बसों में आने वाली लागत का। सरकार द्वारा की गई पहले की घोषणाओं के अनुसार राष्ट्रमंडल खेलों के मद्देनजर खरीदी जाने वाली 1100 बसों में से एक बस की कीमत करीब दो करोड़, 36 लाख, 36 हजार, 363 रुपये थी जबकि अबकी बार की घोषणा में सरकार जिन 4500 बसों की खरीद के लिए 1793 करोड़ रुपये की घोषणा की है उसमें एक बस की कीमत करीब तीन करोड, 98 लाख, 44 हजार, 444 रुपये आएगी। इन दोनों घोषणाओं के दौरान बसों की कीमतों में करीब एक करोड़, 62 लाख, 08 हजार 081 रुपये की बढ़ोतरी हुर्ई है।
यह बात भी उसी प्रकार की हुई जिस प्रकार की बात पिछले दिनों सरकार ने सिग्नेचर ब्रिज के निर्माण को लेकर की थी। पहले इस ब्रिज के निर्माण की लागत भी कम बताई गई थी। मगर शिलान्यास हो जाने के बाद सरकार ने इसकी लागत 400 करोड़ रुपये से बढ़ाकर नौ सौ करोड़ रुपये कर दी है। जिससे इसका काम भी अधर में लटक गया है। कहीं ऐसा न हो कि वर्ष 2009 तक 4500 बसों की खरीद करने वाली सरकार की घोषणा का हश्र भी सिग्नेचर ब्रिज की तरह ही हो।
वहीं दूसरी ओर ब्ल्यू लाइन बसों को राजधानी की सड़कों से पूरी तरह हटाने में सरकार जिस प्रकार की कोताही बरत रही है उससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि इसके पीछे उसका निजी स्वार्थ भी टकरा रहा है। उसमें दो वजह हो सकती हैं। पहला यह कि या तो सरकार में बैठे बड़े-बड़े घूसखोरों को किसी बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनियों की ओर से ऑफर नहीं आ रहा होगा या फिर दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने वाली बसों में उनकी बसें भी शामिल हैं।
जहां तक अदालत की आंखों में धूल झोंकने का सवाल है तो सरकार पूरी तरह से अदालत के आदेशों की अवमानना कर रही है। क्योंकि अदालत द्वारा ब्ल्यू लाइन को सड़कों से हटाने के मामले को लेकर आदेश कुछ और दिए जा रहे हैं और सरकार उस आदेश को दरकिनार करते हुए कुछ और फैसला कर रही है।