टैब्ल्युओं ने किया दिल्ली का बेड़ा गर्क (अंक 24)
Jan 21st, 2008 by admin
नई दिल्ली। टैब्ल्यू एक ऐसा नाम जो गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर प्रदर्शित होने वाली देश के विभिन्न राज्यों की झांकी को रक्षा मंत्रालय से मंजूरी दिला सकता है या फिर उसका पत्ता साफ करवा सकता है। हालांकि यह नाम किसी अधिकारी अथवा सरकारी एजेंसी का नहीं है।
टैब्ल्यू झांकी बनाने वाले टैंपो मालिकों की वह संस्था है जो निजी होकर भी रक्षा मंत्रालय में अपनी पकड़ मजबूत किए हुए है। इसके पास झांकी की थीम चयन करने वाले बुद्धिजीवियों से लेकर उन कलाकारों तक की मंडली है जो झांकी में नृत्य अथवा नाटक प्रस्तुत कर लोगों का मन मोह लेते हैं। इन्हीं टैब्ल्युओं ने इस बार के गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर प्रदर्शित होने वाली दिल्ली की झांकी का पत्ता साफ करवाने में अहम भूमिका निभाई है।
वैसे तो किसी भी राज्य की झांकी अधिक से अधिक पांच से सात लाख रुपये में तैयार हो जाती है। मगर रक्षा मंत्रालय के आला अधिकारियों पर टैब्ल्युओं की पकड़ मजबूत होने के कारण राज्य सरकारों को लाखों रुपये की भेंट चढ़ानी पड़ती है। पिछले साल ही अकेले दिल्ली को झांकी बनवाने के लिए करीब 15 लाख रुपये की अदायगी करनी पड़ी थी। बताया जा रहा है कि टैंपो मालिकों के इस समूह ने पिछले साल भी दिल्ली का पत्ता साफ करवाने की कम कोशिश नहीं की थी। मगर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की केंद्र में राजनीतिक पकड़ मजबूत होने के कारण समय से पहले ही दिल्ली की झांकी बनकर तैयार हो गई थी और देश की सर्वश्रेष्ठ झांकियों में से एक थी। मगर इस बार शायद मुख्यमंत्री श्रीमती दीक्षित की भी विशेष चलने वाली नहीं है। क्योंकि इस समय केंद्र के उनके तमाम राजनीतिक आका रक्षा मंत्रालय से बाहर हैं।
दिल्ली सरकार के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रदर्शित होने वाली झांकी के चयन के लिए गणतंत्र दिवस आयोजित होने से करीब एक माह पहले ही रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों और राज्य सरकारों के सूचना एवं प्रचार निदेशालय के अधिकारियों की बैठक आयोजित की जाती है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय की ओर से बाकायदा राज्य सरकारों को चिट्ठी भी भेजी जाती है। हालांकि इस बैठक में टैब्ल्युओं को आमंत्रित नहीं किया जाता है। लेकिन रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों की सरपरस्ती के कारण इस बैठक में टैब्ल्यू मालिक भी शामिल होते हैं।
इस बैठक में झांकी की राशि तय करने की जिम्मेवारी इन्हीं टैब्ल्युओं के हाथ में होती है। यदि किसी राज्य की ओर से बैठक के समय ही टैब्ल्युओं को मोटी रकम पकड़ा दी जाती है उसका बेकार थीम का भी चयन कर लिया जाता है।
वहीं दूसरी ओर जिस राज्य सरकार की ओर से मोटी रकम नहीं दी जाती है उसके थीम की बात तो दूर झांकी बनने की उम्मीद भी क्षीण हो जाती है। इस बार केंद्रीय चयन समिति की बैठक के समय दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय की ओर से मोटी रकम नहीं दी गई। जिस कारण दिल्ली को झांकी की प्रदर्शनी से ही दूर कर दिया गया।
अब जबकि राजपथ पर प्रदर्शित होने वाली झांकियों के निर्माण की प्रक्रिया चरम पर है तब दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय को इस बात की सूचना मिली है कि इस बार दिल्ली की झांकी नहीं बनाई जा रही है।
मजे की बात यह है कि पर्दे के पीछे दिल्ली सरकार को बदनाम करने के लिए इतनी बड़ी घटना घट चुकी है। मगर अभी तक इसकी जानकारी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को नहीं है। अब सूचना एवं प्रचार निदेशालय के अधिकारियों को इस बात की उम्मीद है कि अब यदि मुख्यमंत्री ही पहल करें तो झांकी प्रदर्शनी में दिल्ली की उपस्थिति दर्ज हो सकती है।