शीला सरकार के खिलाफ भाजपा ने कमर कसी (अंक-27)
Feb 9th, 2008 by admin
नई दिल्ली। आगामी दिसम्बर माह में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजधानी की जनता को भले ही दिल्ली सरकार की ओर से अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने का लॉलीपॉप दिया जा रहा हो, मगर चुनावी रणनीति तैयार करने में भाजपा के मास्टर माइण्ड भी कम नहीं हैं। उन्होंने भी चुनावी किला फतह करने की आधारशिला अभी से ही रखनी आरंभ कर दी है। एक ओर यदि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित यहां की जनता को लुभाने के लिए कभी नौ साला पुरानी अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करने के लिए पुस्तिका निकालती है तो कभी करीब 1500 अनधिकृत कालोनियों का फेहरिश्त लेकर केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी के पास जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर नौ साला पुरानी शीला दीक्षित सरकार की उपलब्धियों पर पानी फैरने के लिए भाजपा की प्रदेश इकाई ने कमर कस ली है। इसके लिए भाजपा की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल द्वारा संपादित एक पत्रिका प्रकाशित की गई है। ‘शीला सरकारः नौ सालः उपलब्धियां या नाकामियां’ के नाम से प्रकाशित इस पत्रिका में उन तमाम बिंदुओं और उपलब्धियों के नकारात्मक पहलुओं के अतिरिक्त अनेक रहस्यों का उद्घाटन किया गया है जिसे देख, सुन और पढ़कर आम जन शीला सरकार के प्रति क्षण भर के लिए नकारात्मक सोच अपने मन बैठा सकता है।
भाजपा के प्रदेश एवं मंडल अधिकारियों के अनुसार इस पत्रिका को कार्यकर्ताओं एवं पदाधिकारियों के माध्यम से घर-घर जाकर वितरित किया जाएगा। इस पत्रिका का वितरण कराना भाजपा का एक अभियान माना जा रहा है। भाजपा के पदाधिकारियों का कहना है कि शीला दीक्षित सरकार ने अपने शासन के नौ सालों में एक नहीं, अनेक ऐसे कार्य किए हैं जिसका दूरगामी दुष्प्रभाव दिल्ली की भोली-भाली जनता को झेलना पड़ रहा है। पत्रिका में उन्हीं प्रमुख बिन्दुओं को उद्घृत किया गया है। उनका कहना है कि शीला सरकार की सबसे बड़ी नाकामी बिजली का निजीकरण करना है। सरकार और सरकार में बैठे नेताओं ने निहित स्वार्थ के लिए बिजली का निजीकरण करवा दिया। आज स्थिति यह है कि निजीकरण होने के बाद भी बिजली वितरण व्यवस्था में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। आज भी बिजली की अघोषित कटौती पूर्ववत की जा रही है। बिजली के मीटर तेज भाग रहे हैं। बिजली कंपनियां 24 घंटे बिजली की आपूर्ति करने के एवज में अतिरिक्त धनराशि की मांग कर रही हैं। चाहे वह आम जनता हो या उद्यमी, बिजली कंपनियों की मार से सभी त्रस्त हैं।
इसी प्रकार दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या ब्ल्यू लाइन बसें हैं। भाजपा के शासन काल में प्राइवेट और सरकारी सभी बसें डीटीसी के अंतर्गत चलाई जाती थीं। मगर शीला सरकार ने निजी ऑपरेटरों की कमान ढीली करके निहित स्वार्थ की पूर्ति की। जिससे आज ये ब्ल्यू लाइन बसें किलर लाइन बनी बैठी हैं। परिवहन और यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। बावजूद इसके दिल्ली सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है।
भाजपा पदाधिकारियों का कहना है कि सरकार को भले ही दिल्ली की जनता की चिंता नहीं है और वह दिल्लीवासियों की कब्र पर पेरिस खड़ा करने की बात सोच रही है। मगर इससे पहले कि सरकार अपने नापाक इरादे में सफल हो जाए दिल्ली की जनता उसे उखाड़ फैकेंगी।
गौरतलब है कि करीब एक वर्ष पूर्व ही दिल्ली सरकार ने विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाना आरंभ कर दिया था। यही वजह है कि दिल्ली सरकार के वार्षिक बजट में पिछले दो सालों से किसी नई योजना को शामिल नहीं किया जा रहा है। सरकार पुरानी योजनाओं के प्रारंभिक स्वरूप को बदल-बदल कर लोगों के सामने प्रस्तुत कर रही है। पिछले दो सालों में इतना अवश्य हुआ है कि सरकार ने 2003 के विधानसभा चुनाव में अलग हुए दिल्ली की रेजिडेन्ट वेलफेयर एसोसिएशनों को एक बार पुनः भागीदारी योजना के माध्यम से या अन्य किसी दूसरे तरीके से संगठित करने में बहुत हद तक सफलता हासिल की है। हालांकि निगम चुनाव के समय अधिकांश बड़े वेलफेयर फेडरेशन ने सरकार का साथ नहीं दिया था। मगर निगम में भाजपा पार्षदों की कलई खुलने के बाद उन फेडरेशनों का रुझान एक बार फिर सरकार की ओर हो गया।
इसी बीच एक बड़ी घटना सीलिंग और तोड़फोड़ की हो गई। अभी सरकार ने चुनावी रणनीति बनाना आरंभ ही किया था कि अदालती आदेश से यह कार्रवाई आरंभ कर दी गई। जिसका खामियाजा निगम चुनाव में कांग्रेस को भुगतना पड़ा। मगर इधर कुछ महीनों में दिल्ली की जनता केञ् मन का यह भ्रम भी दूर हो गया कि सीलिंग एवं तोड़फोड़ का प्रमुख कारण सरकार नहीं बल्कि कोई और है। इसके चलते आम जनता का भी रुझान सरकार की ओर से बढ़ता जा रहा था।
भाजपा के सूत्रों का कहना है कि दिल्ली की शीला सरकार चारों तरफ से चुनावी रणनीति के तहत जनता को अपनी ओर आकर्षित करने की योजना पहले ही बना चुकी है। ऐसे में यदि भाजपा के पास कोई ठोस रणनीति नहीं होगी तो चुनावी समर में मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा। इसीलिए पार्टी के प्रमुख चिंतकों एवं नीति निर्धारकों की सलाह पर इस पत्रिका का प्रकाशन कराया गया है और इसे क्षेत्रीय स्तर पर चुनाव अभियान के रूप में वितरित किया जा रहा है।