भाजपा व कांग्रेस के दिग्गजों की नींद हराम (अंक 30)
Mar 3rd, 2008 by admin
नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों के परिसीमन सहित देश के अन्य राज्यों की सीटों के परिसीमन पर राष्ट्रपति की मुहर लगने से लगे आघात से अभी राजधानी के दिग्गज उबर भी नहीं पाये हैं कि उनके सामने एक नई समस्या पैदा हो गई है। यह नई समस्या बहुजन समाज पार्टी (बसपा) है। जिसकी सुप्रीमों सुश्री मायावती की सोशल इंजीनियरिंग व दिल्ली के रास्ते केन्द्रीय सत्ता पर काबिज होने की बात ने सबकी पेशानी पर परेशानी की लकीर खींच दी है।
पिछले साल हुए निगम चुनाव में बसपा की सशक्त उपस्थिति से दिल्ली के राजनीतिक परिदृश्य में काफी बदलाव आया था। मगर भाजपा एवं कांग्रेस के दिग्गजों ने यह सोचकर इस बात को भुला दिया था कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव आते-आते बसपा की सारी ताकत क्षीण हो जाएगी और सरकार इन्हीं दो पार्टियों में से किसी एक की बनेगी। मगर बीते दिनों बसपा सुप्रीमों ने दिल्ली में महारैली का सफल आयोजन कर एक बार फिर दिल्ली के दिग्गजों की नींद हराम कर दी है। इस महारैली के बाद जहां एक ओर कांग्रेस को अपना दलित वोट खोने का भय सताने लगा है वहीं दूसरी ओर दूसरा सबसे बड़ा दल भाजपा अभी से ही बसपा को तीसरे सबसे बड़े दल के रूप में स्वीकार करने लगा है। इसके पीछे भाजपा की सोच भले ही यह रही हो कि बसपा की दिल्ली में उपस्थिति से भाजपा को नहीं बल्कि कांग्रेस को नुकसान है। क्योंकि भाजपा की राजनीति अनुसूचित जाति और सामाजिक ताना-बाना के आधार पर नहीं बल्कि औद्योगिक घरानों, व्यापारियों और धनाढ्यों के बूते चलती है।
बसपा की उपस्थिति को नकारते हुए और अपने वोट बैंक को सुरक्षित मानते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन कहते हैं कि दिल्ली की राजनीति में बसपा की उपस्थिति से भाजपा की राजनीति में कोई खास फर्क नहीं पड़ता। उनका कहना है कि चुनाव में किसी एक वर्ग के मतदाताओं द्वारा भाजपा को वोट न देने अथवा दिल्ली में एक-आध सीट पर बसपा के जीत हासिल कर लेने से भाजपा के वोट बैंक पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष डा. हर्षवर्धन यह भी कहते हैं कि दिल्ली की एक लोकसभा सीट उत्त्र -पश्चिम (नए परिसीमन के आधार पर) ऐसी सीट है जिसमें अनुसूचित जाति के अधिसंख्य मतदाता हैं। जिसके चलते इस लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले 10 विधानसभा क्षेत्रों में से कई क्षेत्र ऐसे हैं जिन पर बसपा प्रत्याशी का पलड़ा भारी हो सकता है।
वहीं दूसरी कांग्रेस के उपाध्यक्ष एवं परिसीमन आयोग के सदस्य चतर सिंह का कहना है कि आमामी विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्र, अनधिकृत कालोनियां और अनुसूचित जाति के मतदाता निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं। उनका यह भी कहना है कि उत्तर-पश्चिम, पश्चिम और बाहरी दिल्ली क्षेत्रों के अन्दर न केवल ग्रामीण क्षेत्र ही आते हैं बल्कि इन क्षेत्रों में अनधिकृत कालोनियां और अनुसूचित जाति के मतदाता भी आते हैं।
हालांकि बसपा की सफल महारैली के बाद कांग्रेस की परेशानी कुछ ज्यादा बढ़ती दिखाई दे रही है। बावजूद इसके कांग्रेस नेताओं का मानना है कि दिल्ली की राजनीति में हाथी कभी भी हाथ को टक्कर नहीं दे सकता।
जहां तक दिल्ली की राजनीति में बसपा की सशक्त उपस्थिति की बात है तो उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव और इसके संस्थापक काशीराम के निधन के पूर्व इसके नेता पूर्वाग्रह से ग्रसित थे और उसकी चुनावी रणनीति भी पूर्वाग्रही ही बनाई जाती थी। जिसके चलते यह पार्टी उत्तर प्रदेश में सिमटती चली जा रही थी। काशीराम के निधन के बाद पार्टी सुप्रीमों की कमान संभालने के बाद मायावती ने पार्टी की रीति और नीति दोनों में परिवर्तन कर दिया और सोशल इंजीनियरिंग की नीति को अक्तियार किया। इसका लाभ पार्टी को न केवल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मिला बल्कि दिल्ली नगर निगम चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के बूते दो दर्जन से अधिक सीटों पर जीत हासिल की।
अगर पिछले दस साल के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 11998 के विधानसभा चुनाव के समय दिल्ली की राजनीति में बसपा का कोई राजनीतिक वजूद नहीं था। हालांकि इस चुनाव में पार्टी ने एक दो सीटों पर अपने उम्मीदवारों को उतारने की हिम्मत दिखाई थी। मगर भाजपा-कांग्रेस की चुनावी लड़ाई में बसपा केञ् हाथी का कुछ पता ही नहीं चला।
2002 के निगम चुनाव में पार्टी ने 139 वार्डों में से अधिकांश वार्डों पर अपने उम्मीदवारों को खड़ा किया। जिसमें एक ही सीट पर उसे सफलता मिली। बाकी की सीटों पर या तो जमानत जब्त हो गई या उम्मीदवारों को मामूली वोटों से ही संतोष करना पड़ा। 2003 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने करीब 20 से भी अधिक विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों को खड़ा किया। मगर इसमें उसे फिर झटका लगा और हार की मार खाकर चारों खाने चिता हो गई। मगर इस चुनाव में उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने की स्थिति पैदा नहीं हुई। इसके ठीक चार साल बाद वर्ष 2007 में नगर निगम चुनाव में भी भाजपा कांग्रेस इसकी उपस्थिति से अनभिज्ञ थे और उन्हें गुमान था कि दिल्ली की राजनीति के आकाश में उनका ही सितारा चमकता रहेगा। मगर ऐन चुनाव के वक्त निगम सीटों के विभाजन से वार्डों की संख्या में बढोत्तरी से चुनावी असंतुलन पैदा हो गया तो मतदाताओं में भी बंटवारा हो गया। चुनावी असंतुलन, मतदाताओं में बंटवारे एवं मायावती की सोशल इंजीनियरिंग के प्रभाव से पार्टी को 272 सीटों से 16 सीटों पर जीत मिली और 16 सीटों पर इसके उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे। 32 सीटों से मायावती की पार्टी को करीब 155250 वोट प्राप्त हुए। बसपा की यही उपस्थिति अब राजनेताओं की नींद हराम करने वाली साबित हो रही है।
एक ओर तो वर्तमान कांग्रेस-भाजपा केञ् विधायकों को परिसीमन से विधानसभा चुनाव जीतने में संशय लग रहा है। ऊपर से बसपा की सशक्त उपस्थिति और मायावती की सफल महारैली ने इन नेताओं के लिए एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। यदि यूपी की तर्ज पर दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी बसपा का फार्मूला काम कर गया तो आगामी विधानसभा चुनाव के परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।