रैलियां बन गई हैं शक्ति प्रदर्शन का जरिया (अंक 31)
Mar 11th, 2008 by admin
नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा और लोकसभा चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है देश व राजधानी के विभिन्न राजनीतिक दलों की बेचैनियां भी बढ़ती जा रही हैं। कोई राजनेता दिल्ली के रास्ते केंद्रीय सात्ता के गलियारे में पहुंचने के लिए शक्ति प्रदर्शन कर रहा है तो कोई दलित और पिछड़े वर्ग के नेताओं और मतदाताओं का समर्थन दिखाने का। इस प्रकार की राजनैतिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए नेताओं ने रैली आयोजन का एक नायाब तरीका निकाला है। पहले तो प्रायः रैलियां जन-समस्याओं के प्रति सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए वामदलों द्वारा आयोजित की जाती थीं। लेकिन अब इन रैलियों का आयोजन जन-समस्याओं के प्रति सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए नहीं बल्कि राजनैतिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए किया जाता है। भले ही इस प्रकार की राजनैतिक रैलियों के आयोजन से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों को यातायात समस्या के साथ-साथ आर्थिक नुकसान का सामना क्यों न करना पड़ रहा हो।
अभी हाल ही में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो व उार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के लोगों का पार्टी के प्रति समर्थन जताने और सोशल इंजीनियरिंग की शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए रामलीला मैदान में एक महारैली का आयोजन किया था। इस महारैली से दिल्ली व देश के किसी राजनैतिक दल पर कोई प्रभाव भले ही न पड़ा हो, मगर इसके सफल आयोजन से कांग्रेस की सेहत पर जरूर फर्क पड़ा। पिछड़े वर्गों के नेताओं का बसपा की इस महारैली में अपार समर्थन से बौखलाई कांग्रेस पार्टी ने पहले तो आनन-फानन में प्रेसवार्ता बुलाकर यह जताने की कोशिश की कि पिछड़े और अनुसूचित वर्ग से ताल्लुक रखने वाले नेता अब भी उसके साथ हैं। लेकिन जब इससे भी बात नहीं बनी और यह मामला और अधिक तूल पकड़ गया तो उसे भी एक महारैली का आयोजन करना पड़ा।
बसपा को तो अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए महारैली के आयोजन में सोशल इंजीनियरिंग जैसे राजनीतिक मुद्दे के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के चुनावी मुद्दे का सहारा लेना पड़ा था। मगर कांग्रेस को अपनी रैली को सफल बनाने के लिए दिल्ली सरकार और नगर निगम नेताओं का सहारा लेना पड़ रहा है। यह बात दीगर है कि अब भी कांग्रेस की आपसी फूट की समस्या को सुलझाया नहीं जा सका है। बावजूद इसके पार्टी आलाकमान बसपा की महारैली की सफाई में रैली का आयोजन कर यह जताने की चेष्टा कर रहा है कि हमारे पास भी पिछड़े वर्गों के नेताओं का काफिला है, जो चुनावी बेड़े को पार लगाने में कुशल हैं। इस सिलसिले में कांग्रेस न केवल दिल्ली सरकार के मंत्रियों का इस्तेमाल कर रही है बल्कि वर्तमान नगर निगम में विपक्ष के नेताओं को भी रैली को सफल बनाने की जिम्मेवारी सौंप रखी है।
अब जहां तक राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन करने के लिए इन रैलियों से ताल्लुक की बात है तो चालू वर्ष 2008 आरंभ में ही गुजरात के विधानसभा चुनाव से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने केंद्रीय राजनीति में भी अपने बढ़ते कद और चुनावी रणनीति बनाने के लिए इसी रामलीला मैदान में विगत 29 जनवरी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी एवं परिषद की दो दिवसीय बैठक और रैली का आयोजन किया था। इस रैली के माध्यम से भाजपा ने यह जताने की चेष्टा की थी कि उसका राजनैतिक बढ़त न केवल गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में स्थापित है बल्कि केंद्रीय राजनीति में भी उसके पास कई ऐसे-ऐसे धुरंधर हैं जो लोकसभा चुनाव का बेड़ा सफलतापूर्वक पार लगा सकते हैं। इसके तुरंत बाद भाजपा ने ही महिला राजनीति में भी अपने वर्चस्व का प्रदर्र्शन करने के लिए फरवरी माह में राष्ट्रीय महिला कार्यकर्ताओं की एक रैली का आयोजन किया था। जिसमें देश के विभिन्न प्रदेशों की महिला नेत्रियों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद बसपा ने महारैली का आयोजन कर पिछड़ी और अनुसूचित जाति के नेताओं और मतदाताओं पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए महारैली का आयोजन किया था। अब जबकि उपरोक्त दोनों दलों ने रैलियों के माध्यम से अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर ही दिया तो भला कांग्रेस भी इसमें पीछे क्यों रहे। वह तो पारंपरिक रूप से पहले से ही तथाकथित रूप से पिछड़ी व अनुसूचित जाति का शुभचिंतक रही है। ऐसे में भला वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन न करे ऐसा होना संभव नहीं है। लिहाजा उसने भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने और पिछड़ी जाति के लोगों पर अपना वर्चस्व जताने के लिए उसने भी रैली का आयोजन किया है। कुल मिलाकर यह कि जो रैलियां कभी जनता के हितों के प्रति सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए आयोजित की जाती थीं वह रैलियां अब राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन का जरिया बन गई हैं।