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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था प्रतिवर्ष आठ से नौ प्रतिशत की दर से विकसित हो रही है। जिसकी वजह से आम आदमी की आमदनी में भी बढ़ोतरी हुई है। अर्थव्यवस्था की बढ़ती विकास दर के कारण ही छोटे शहर बड़े शहर के रूप में और गांव छोटे शहरों के रूप में तब्‍दील होते जा रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी होना सरकार और जनता के लिए फायदेमंद है।
लेकिन इसके साथ ही सरकार पर अतिरिक्‍त बोझ भी बढ़ा है। क्‍योंकि आमदनी बढ़ने के कारण लोगों की मांगों में भी बढ़ोतरी हुई है जिसे पूरा करना सरकार का काम है।
वह दिल्ली सरकार द्वारा बवाना में बनाए जा रहे गैस आधारित बिजली उत्पादन संयंत्र प्रगति पावर-तीन के उद्घाटन अवसर पर लोगों को संबोधित कर रहे थे। उद्घाटन समारोह में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे, दिल्ली के उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना, मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित, दिल्ली के ऊर्जा मंत्री डा. अशोक कुमार वालिया, बाहरी दिल्ली के सांसद सज्जान कुमार, स्थानीय विधायक सुरेंद्र कुमार, विधानसभा के मुख्‍य सचेतक रमाकांत गोस्वामी, दिल्ली सरकार के मुख्‍य सचिव राकेश मेहता और एनडीपीएल केञ् कई अधिकारियों सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य व्यक्‍ति भी मौजूद थे।
इस अवसर पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा कि देश की आम जनता की आमदनी में होने वाली बढ़ोतरी के कारण विभिन्न वस्तुओं की मांग में भी बढ़ोतरी हुई है। खासकर बिजली, स्वच्छ पेयजल, यातायात की सुगम व्यवस्था आदि शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में जिस अनुपात में बिजली की मांग में बढ़ोतरी हुई है उस अनुपात में बिजली की आपूर्ति नहीं की जा रही है। क्‍योंकि हम क्षमता के अनुरूप बिजली का उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। हमारे पास पारंपरिक प्राकृति‍क संसाधनों का भंडार है, लेकिन हम उन संसाधनों का दोहन नहीं कर सकते। इसके दोहन से हमारी आने वाली पीढि़यों को खतरे का सामना करना पड़ेगा। हमारे यहां कोयला का अकूत भंडार है, लेकिन कोयले से बिजली का उत्पादन करना पर्यावरणीय दृष्टिकोण से खतरनाक है। हमारे यहां पानी के भी खूब स्त्रोत हैं और सरकार पनबिजली उत्पादन के प्रति कारगर कदम भी उठा रही है।
लेकिन यह परियोजना भी लोगों के हित में नहीं है। क्‍यों कि पनबिजली के लिए बनाए जाने वाले बांधों से लाखों लोग बेघर हो रहे हैं और उनके सामने रोजी-रोटी का प्रश्न खड़ा हो गया है। अब हमारे पास तीसरे ऊर्जा के स्त्रोतों में सौर्य ऊर्जा भी काफी है, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर उपयोग करने में अभी कुछ और वक्‍त लगेगा। हमारी सरकार न्यूक्‍लियर एनर्जी को साफ-सुथरे बिजली संसाधन के रूप में विकसित करने के लिए बचनबद्ध है और इसके विकास से ही हमारी जरूरतें पूरी हो सकेंगी।
इस अवसर पर केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दिल्ली और देशवासियों से वायदा करते हुए कहा कि आगामी वर्ष 2012 तक देश के सभी गांवों और शहरों में बिजली की अबाध रूप से आपूर्ति की जाएगी और कहीं भी बिजली की कटौती नहीं की जाएगी। उन्होंने दिल्ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित को ‘लाडली’ की संज्ञा से अभिहित करते हुए कहा कि हम 2010 तक दिल्ली को बिजली के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कारगर कदम उठा रहे हैं। उन्हीं कारगर कदमों की पहल प्रगति पावर-तीन की यह परियोजना है।

नई दिल्ली। दिल्ली की मुख्‍यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने कहा कि बिजली के लिए अन्य राज्यों पर से निर्भरता कम करने के लिए दिल्ली सरकार बिजली उत्पादन के लिए और गैस प्लांट की स्थापना करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि 2010 में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों से पहले दिल्ली में पर्याप्त मात्रा में बिजली उपलब्‍ध होगी। श्रीमती दीक्षित ने लोगों से आह्वान किया कि वे आवश्यकतानुसार बिजली का इस्तेमाल करें ताकि उन्हें बिजली की कमी से होने वाली परेशानियों का सामना न करना पड़े। मुख्‍यमंत्री उत्‍तर-पश्चिमी दिल्ली के रि‍ठाला क्षेत्र में एनडीपीएल के 108 मेगावॉट क्षमता के गैस आधारित बिजली प्लांट का शिलान्यास कर रही थी। इस अवसर पर दिल्ली के वि‍त्‍त एवं बिजली मंत्री डॉ. अशोक कुमार वालिया, विकास मंत्री राजकुमार चौहान, बाहरी दिल्ली के सासंद सज्जान कुमार, विधायक जयभगवान अग्रवाल, मुख्‍य सचिव राकेश मेहता, ऊर्जा विभाग के सचिव राजेन्द्र कुमार, एनडीपीएल केञ् अध्यक्ष, इंजीनियर और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे। श्रीमती दीक्षित ने आगे कहा कि 2002 में जब बिजली के वि‍तरण क्षेत्र का निजीकरण किया गया था, उस समय राजधानी में बिजली की हालत दयनीय स्थिति में थी और बिजली उत्पादन की बड़ी कंपनियों को भी इस बात का डर था कि उन्हें सरकार की तरफ से पूरी मदद मिलेगी या नहीं लेकिन निजीकरण होने के बाद से बिजली क्षेत्र में लगातार सुधार आया है। इसी का परिणाम है कि पिछले कुछ सालों में दिल्ली में बिजली की सप्लाई की स्थिति काफी बेहतर हुई है। उन्होंने कहा कि राजधानी में आबादी बढ़ने के साथ-साथ बिजली की मांग भी लगातार बढ़ रही है। इतना ही नहीं यह मांग गर्मी के दिनों में बढ़कर करीब 4200 मेगावॉट तक पहुंच जाती है। इसमे से 3050 मेगावॉट बिजली के लि‍ए हमें अन्य राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। इतना ही नहीं बिजल की कमी को दूर करने के लिए इन राज्यों से महंगी कीमत पर बिजली खरीदनी पड़ती है।
उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों पर निर्भरता कम करने के लिए दिल्ली सरकार अधिक से अधिक बिजली प्लांट राजधानी में स्थापित करना चाहती है। इसी कड़ी में आगामी 24 मार्च को 1400 मेगावॉट क्षमता के बिजली प्लांट का शिलान्यास माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह करेंगे। इसी तरह बामनौली और झज्जार में 750-750 मेगावॉट के संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। इन संयंत्रों के शुरू हो जाने के बाद बिजली की कमी काफी हद दूर हो जाएगी।
मुख्‍यमंत्री ने एनडीपीएल के अध्यक्ष को बधाई देते हुए कहा कि पहली बार किसी प्राइवेट कंञ्पनी ने बिजली उत्पादन के क्षेत्र में कदम रखा है। हालांकि 108 मेगावॉट क्षमता के गैस आधारित बिजली प्लांट आवश्यता को देखते हुए कम है लेकिन यह एक अच्छी शुरूआत है। उन्होंने एनडीपीएल को इस बात के लिए भी बधाई दी कि उन्होंने बिजली के लए किए गए अपने सभी वायदा को तय समय में पूरा किया है। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां बिजली और पानी की कमी नहीं है लेकिन हम बचत की आदत डालकर इन चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। उन्होंने लोगों कसे आहवान किया कि वे बिजली की बचत करने के लिए सीएफएल बल्ब का इस्तेमाल करें साथ ही व्यर्थ में बिजली का खर्च न करे। मुख्‍यमंत्री ने कहा कि सरकार समाज के गरीब तबके के लोगों पर महंगी बिजली का बोझ नहीं डालना चाहती इसलिए कम यूनिट खर्च करने वाले लोगों को बिजली सस्ती कीमत पर उपलब्‍ध कराई गई है।
इस अवसर पर दिल्ली के बिजली मंत्री डॉ. अशोक कुमार वालिया ने मुख्‍यमंत्री का आभार प्रकट किया कि उनके कुशल नेतृत्व में राजधानी में बिजली के क्षेत्र में व्यापक सुधार आया है। उन्होंने कहा कि दिल्ली की जनता को राहत पहुंचाने के लिए दिल्ली सरकार से बिजली के लिए 450 करोड़ रुपये की सब्‍सिडी दी है।
उन्होने कहा कि निजी कंपनियां बिजली वितरण के क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रही हैं और इसका सीधा फायदा जनता तक पहुच रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक उपभोक्‍ता को 10 फीसदी की सब्‍सिडी मिल रही है। उन्होंने कहा कि बिजली की आवश्यकता खपत को कम करने के लिए लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में दिल्ली में बिजली की कोई कमी नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि आने वाले गर्मी के लिए बिजली की कोई कमी न हो इसके लिए दिल्ली सरकार ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है, साथ ही निजी कंपि‍नयों ने वायदा किया है कि वह बिजली की कमी नहीं होने देंगे।
इस मौके पर एनडीपीएल के अध्यक्ष श्री आदि इंजीनियर ने बताया कि 108 मेगावॉट क्षमता के गैस आधारित बिजली प्लांट 250 करोड़ रुपये की राशि खर्च आएगी और अगले वर्ष जुलाई तक यह प्लांट पूरी तरह से काम करना शुरू कर देगा। उन्होंने कहा कि एनडीपीएल क्षेत्र में बिजली की मांग 1100 मेगावॉट रहती है। इस मांग को पूरी करने के लिए अन्य राज्यों से महंगी कीमत पर बिजली खरीदनी पड़ती है।
उन्होंने कहा कि एनडीपीएल का सपना है कि बिजली उत्पादन के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाए ताकि वह अपने उपभोक्‍ताओं के लिए किसी भी तरह से बिजली की कमी न होने दें। उन्होंने कहा कि एनडीपीएल ने विभिन्न परियोजनाओं के लिए क्भ् करोड़ रुपये की राशि खर्च की है।

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा और लोकसभा चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है देश व राजधानी के विभिन्न राजनीतिक दलों की बेचैनियां भी बढ़ती जा रही हैं। कोई राजनेता दिल्ली के रास्ते केंद्रीय सात्ता के गलियारे में पहुंचने के लिए शक्ति प्रदर्शन कर रहा है तो कोई दलित और पिछड़े वर्ग के नेताओं और मतदाताओं का समर्थन दिखाने का। इस प्रकार की राजनैतिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए नेताओं ने रैली आयोजन का एक नायाब तरीका निकाला है। पहले तो प्रायः रैलियां जन-समस्याओं के प्रति सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए वामदलों द्वारा आयोजित की जाती थीं। लेकिन अब इन रैलियों का आयोजन जन-समस्याओं के प्रति सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए नहीं बल्कि राजनैतिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए किया जाता है। भले ही इस प्रकार की राजनैतिक रैलियों के आयोजन से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों को यातायात समस्या के साथ-साथ आर्थिक नुकसान का सामना क्यों न करना पड़ रहा हो।
अभी हाल ही में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो व उार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के लोगों का पार्टी के प्रति समर्थन जताने और सोशल इंजीनियरिंग की शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए रामलीला मैदान में एक महारैली का आयोजन किया था। इस महारैली से दिल्ली व देश के किसी राजनैतिक दल पर कोई प्रभाव भले ही न पड़ा हो, मगर इसके सफल आयोजन से कांग्रेस की सेहत पर जरूर फर्क पड़ा। पिछड़े वर्गों के नेताओं का बसपा की इस महारैली में अपार समर्थन से बौखलाई कांग्रेस पार्टी ने पहले तो आनन-फानन में प्रेसवार्ता बुलाकर यह जताने की कोशिश की कि पिछड़े और अनुसूचित वर्ग से ताल्लुक रखने वाले नेता अब भी उसके साथ हैं। लेकिन जब इससे भी बात नहीं बनी और यह मामला और अधिक तूल पकड़ गया तो उसे भी एक महारैली का आयोजन करना पड़ा।
बसपा को तो अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए महारैली के आयोजन में सोशल इंजीनियरिंग जैसे राजनीतिक मुद्दे के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के चुनावी मुद्दे का सहारा लेना पड़ा था। मगर कांग्रेस को अपनी रैली को सफल बनाने के लिए दिल्ली सरकार और नगर निगम नेताओं का सहारा लेना पड़ रहा है। यह बात दीगर है कि अब भी कांग्रेस की आपसी फूट की समस्या को सुलझाया नहीं जा सका है। बावजूद इसके पार्टी आलाकमान बसपा की महारैली की सफाई में रैली का आयोजन कर यह जताने की चेष्टा कर रहा है कि हमारे पास भी पिछड़े वर्गों के नेताओं का काफिला है, जो चुनावी बेड़े को पार लगाने में कुशल हैं। इस सिलसिले में कांग्रेस न केवल दिल्ली सरकार के मंत्रियों का इस्तेमाल कर रही है बल्कि वर्तमान नगर निगम में विपक्ष के नेताओं को भी रैली को सफल बनाने की जिम्मेवारी सौंप रखी है।
अब जहां तक राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन करने के लिए इन रैलियों से ताल्लुक की बात है तो चालू वर्ष 2008 आरंभ में ही गुजरात के विधानसभा चुनाव से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने केंद्रीय राजनीति में भी अपने बढ़ते कद और चुनावी रणनीति बनाने के लिए इसी रामलीला मैदान में विगत 29 जनवरी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी एवं परिषद की दो दिवसीय बैठक और रैली का आयोजन किया था। इस रैली के माध्यम से भाजपा ने यह जताने की चेष्टा की थी कि उसका राजनैतिक बढ़त न केवल गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में स्थापित है बल्कि केंद्रीय राजनीति में भी उसके पास कई ऐसे-ऐसे धुरंधर हैं जो लोकसभा चुनाव का बेड़ा सफलतापूर्वक पार लगा सकते हैं। इसके तुरंत बाद भाजपा ने ही महिला राजनीति में भी अपने वर्चस्व का प्रदर्र्शन करने के लिए फरवरी माह में राष्ट्रीय महिला कार्यकर्ताओं की एक रैली का आयोजन किया था। जिसमें देश के विभिन्न प्रदेशों की महिला नेत्रियों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद बसपा ने महारैली का आयोजन कर पिछड़ी और अनुसूचित जाति के नेताओं और मतदाताओं पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए महारैली का आयोजन किया था। अब जबकि उपरोक्त दोनों दलों ने रैलियों के माध्यम से अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर ही दिया तो भला कांग्रेस भी इसमें पीछे क्यों रहे। वह तो पारंपरिक रूप से पहले से ही तथाकथित रूप से पिछड़ी व अनुसूचित जाति का शुभचिंतक रही है। ऐसे में भला वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन न करे ऐसा होना संभव नहीं है। लिहाजा उसने भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने और पिछड़ी जाति के लोगों पर अपना वर्चस्व जताने के लिए उसने भी रैली का आयोजन किया है। कुल मिलाकर यह कि जो रैलियां कभी जनता के हितों के प्रति सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए आयोजित की जाती थीं वह रैलियां अब राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन का जरिया बन गई हैं।

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों के परिसीमन सहित देश के अन्य राज्यों की सीटों के परिसीमन पर राष्ट्रपति की मुहर लगने से लगे आघात से अभी राजधानी के दिग्गज उबर भी नहीं पाये हैं कि उनके सामने एक नई समस्या पैदा हो गई है। यह नई समस्या बहुजन समाज पार्टी (बसपा) है। जिसकी सुप्रीमों सुश्री मायावती की सोशल इंजीनियरिंग व दिल्ली के रास्ते केन्‍द्रीय सत्‍ता पर काबिज होने की बात ने सबकी पेशानी पर परेशानी की लकीर खींच दी है।
पिछले साल हुए निगम चुनाव में बसपा की सशक्‍त उपस्थिति से दिल्ली के राजनीतिक परिदृश्य में काफी बदलाव आया था। मगर भाजपा एवं कांग्रेस के दिग्गजों ने यह सोचकर इस बात को भुला दिया था कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव आते-आते बसपा की सारी ताकत क्षीण हो जाएगी और सरकार इन्हीं दो पार्टियों में से किसी एक की बनेगी। मगर बीते दिनों बसपा सुप्रीमों ने दिल्ली में महारैली का सफल आयोजन कर एक बार फिर दिल्ली के दिग्गजों की नींद हराम कर दी है। इस महारैली के बाद जहां एक ओर कांग्रेस को अपना दलित वोट खोने का भय सताने लगा है वहीं दूसरी ओर दूसरा सबसे बड़ा दल भाजपा अभी से ही बसपा को तीसरे सबसे बड़े दल के रूप में स्वीकार करने लगा है। इसके पीछे भाजपा की सोच भले ही यह रही हो कि बसपा की दिल्ली में उपस्थिति से भाजपा को नहीं बल्कि कांग्रेस को नुकसान है। क्‍योंकि भाजपा की राजनीति अनुसूचित जाति और सामाजिक ताना-बाना के आधार पर नहीं बल्कि औद्योगिक घरानों, व्यापारियों और धनाढ्‌यों के बूते चलती है।
बसपा की उपस्थिति को नकारते हुए और अपने वोट बैंक को सुरक्षित मानते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन कहते हैं कि दिल्ली की राजनीति में बसपा की उपस्थिति से भाजपा की राजनीति में कोई खास फर्क नहीं पड़ता। उनका कहना है कि चुनाव में किसी एक वर्ग के मतदाताओं द्वारा भाजपा को वोट न देने अथवा दिल्ली में एक-आध सीट पर बसपा के जीत हासिल कर लेने से भाजपा के वोट बैंक पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष डा. हर्षवर्धन यह भी कहते हैं कि दिल्ली की एक लोकसभा सीट उत्‍त्‍र -पश्चिम (नए परिसीमन के आधार पर) ऐसी सीट है जिसमें अनुसूचित जाति के अधिसंख्‍य मतदाता हैं। जिसके चलते इस लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले 10 विधानसभा क्षेत्रों में से कई क्षेत्र ऐसे हैं जिन पर बसपा प्रत्याशी का पलड़ा भारी हो सकता है।
वहीं दूसरी कांग्रेस के उपाध्यक्ष एवं परिसीमन आयोग के सदस्य चतर सिंह का कहना है कि आमामी विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्र, अनधिकृत कालोनियां और अनुसूचित जाति के मतदाता निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं। उनका यह भी कहना है कि उत्‍तर-पश्चिम, पश्चिम और बाहरी दिल्ली क्षेत्रों के अन्दर न केवल ग्रामीण क्षेत्र ही आते हैं बल्कि इन क्षेत्रों में अनधिकृत कालोनियां और अनुसूचित जाति के मतदाता भी आते हैं।
हालांकि बसपा की सफल महारैली के बाद कांग्रेस की परेशानी कुछ ज्यादा बढ़ती दिखाई दे रही है। बावजूद इसके कांग्रेस नेताओं का मानना है कि दिल्ली की राजनीति में हाथी कभी भी हाथ को टक्‍कर नहीं दे सकता।
जहां तक दिल्ली की राजनीति में बसपा की सशक्‍त उपस्थिति की बात है तो उत्‍तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव और इसके संस्थापक काशीराम के निधन के पूर्व इसके नेता पूर्वाग्रह से ग्रसित थे और उसकी चुनावी रणनीति भी पूर्वाग्रही ही बनाई जाती थी। जिसके चलते यह पार्टी उत्‍तर प्रदेश में सिमटती चली जा रही थी। काशीराम के निधन के बाद पार्टी सुप्रीमों की कमान संभालने के बाद मायावती ने पार्टी की रीति और नीति दोनों में परिवर्तन कर दिया और सोशल इंजीनियरिंग की नीति को अक्‍तियार किया। इसका लाभ पार्टी को न केवल उत्‍तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मिला बल्कि दिल्ली नगर निगम चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के बूते दो दर्जन से अधिक सीटों पर जीत हासिल की।
अगर पिछले दस साल के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 11998 के विधानसभा चुनाव के समय दिल्ली की राजनीति में बसपा का कोई राजनीतिक वजूद नहीं था। हालांकि इस चुनाव में पार्टी ने एक दो सीटों पर अपने उम्‍मीदवारों को उतारने की हिम्‍मत दिखाई थी। मगर भाजपा-कांग्रेस की चुनावी लड़ाई में बसपा केञ् हाथी का कुछ पता ही नहीं चला।
2002 के निगम चुनाव में पार्टी ने 139 वार्डों में से अधिकांश वार्डों पर अपने उम्‍मीदवारों को खड़ा किया। जिसमें एक ही सीट पर उसे सफलता मिली। बाकी की सीटों पर या तो जमानत जब्‍त हो गई या उम्‍मीदवारों को मामूली वोटों से ही संतोष करना पड़ा। 2003 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने करीब 20 से भी अधिक विधानसभा सीटों पर अपने उम्‍मीदवारों को खड़ा किया। मगर इसमें उसे फिर झटका लगा और हार की मार खाकर चारों खाने चि‍ता हो गई। मगर इस चुनाव में उसके उम्‍मीदवारों की जमानत जब्‍त होने की स्थिति पैदा नहीं हुई। इसके ठीक चार साल बाद वर्ष 2007 में नगर निगम चुनाव में भी भाजपा कांग्रेस इसकी उपस्थिति से अनभिज्ञ थे और उन्हें गुमान था कि दिल्ली की राजनीति के आकाश में उनका ही सितारा चमकता रहेगा। मगर ऐन चुनाव के वक्‍त निगम सीटों के विभाजन से वार्डों की संख्‍या में बढोत्‍तरी से चुनावी असंतुलन पैदा हो गया तो मतदाताओं में भी बंटवारा हो गया। चुनावी असंतुलन, मतदाताओं में बंटवारे एवं मायावती की सोशल इंजीनियरिंग के प्रभाव से पार्टी को 272 सीटों से 16 सीटों पर जीत मिली और 16 सीटों पर इसके उम्‍मीदवार दूसरे स्थान पर रहे। 32 सीटों से मायावती की पार्टी को करीब 155250 वोट प्राप्त हुए। बसपा की यही उपस्थिति अब राजनेताओं की नींद हराम करने वाली साबित हो रही है।
एक ओर तो वर्तमान कांग्रेस-भाजपा केञ् विधायकों को परिसीमन से विधानसभा चुनाव जीतने में संशय लग रहा है। ऊपर से बसपा की सशक्‍त उपस्थिति और मायावती की सफल महारैली ने इन नेताओं के लिए एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। यदि यूपी की तर्ज पर दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी बसपा का फार्मूला काम कर गया तो आगामी विधानसभा चुनाव के परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में बिजली के वितरण में लगी निजी बिजली कंपनियों ने अब अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह काम करना आरंभ कर दिया है। इन कंपनियों ने बिजली उपभोक्‍ताओं के लिए एक फरमान जारी किया है कि जिस किसी भी उपभोक्‍ता को चौबीसों घंटे बिना किसी कटौती के बिजली चाहिए वह सरकार द्वारा निर्धारित बिजली की दरों से अतिरिक्‍त 50 पैसे प्रति यूनिट के हिसाब से बिल का भुगतान करे तो उसे निर्बाध रूप से बिजली प्रदान की जा सकती है। अभी तो इस स्कीम के तहत बिजली वितरण करने वाली कंपनी नॉर्थ दिल्ली पावर लिमिटेड (एनडीपीएल) और कोका कोला कंपनी की सिस्टर कनसर्न कंपनी पर्ल ड्रिंक के साथ समझौता हुआ है। इस नए समझौते के तहत एनडीपीएल पर्ल ड्रिंक को 24 घंटे बिजली की आपूर्ति करेगी। इसके बदले में उक्‍त कंपनी को सरकार द्वारा औद्योगिक इकाइयों के लिए निर्धारित दर से भ् पैसे प्रति यूनिट अधिक का बिल देना होगा।
हालांकि बिजली कंपनियां अधिक कमाई करने के लिए भी यह फार्मूला औद्योगिक इकाइयों पर लागू कर रही हैं। मगर बताया यह भी जा रहा है कि यदि रिहायशी इलाकों के लोग आपस में एक ग्रुप बनाकर उद्यमियों की तरह बिजली बिल का अतिरिक्‍त भुगतान करने की हामी भरें तो भविष्य में यह योजना आम उपभोक्‍ताओं के लिए भी लागू की जाएगी।
एनडीपीएल के प्रवक्‍ता अजय महाराज का कहना है कि कोका कोला की सिस्टर कनसर्न कंपनी पर्ल ड्रींक्‍स की ओर से 24 घंटे बिजली की आपूर्ति करने की बात कही गई थी। इस बाबत उनकी ओर से जब उक्‍त दरों का जिक्र किया गया तो उन्होंने इस बात को स्वीकार कर लिया।
उनका यह भी कहना है कि इस कंपनी को पांच मिनट की भी कटौती होने पर लाखों का नुकसान हो रहा था। क्‍योंकि उन्हें जेनरेटर के माध्यम से एक यूनिट बिजली प्राप्त करने के लिए दस से भ् रुपये अतिरिक्‍त खर्च करना पड़ रहा था। ऐसे में यदि उन्हें 50 पैसे अधिक दर पर प्रति यूनिट बिजली 24 घंटे उपलब्‍ध करायी जाती है तो इसमें उन्हें दिक्‍कत नहीं है। श्री महाराज ने यह भी बताया कि इस तरह की स्कीम पर अभी पर्ल ड्रिंक्‍स के साथ में ही समझौता हुआ है। मगर यदि अन्य उद्यमी भी इस स्कीम के तहत अतिरिक्‍त भुगतान करके 24 घंटे बिजली की मांग करते हैं तो इसमें उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं है।
मजे की बात यह भी है कि एनडीपीएल ने भ् पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्‍त भुगतान करके 24 घंटे बिजली की आपूर्ति करने के इस फार्मूले पर काम करना आरंभ तो कर दिया है, मगर अभी उसे दिल्ली राज्य विद्युत विनियामक आयोग की ओर से इस स्कीम की मंजूरी नहीं मिली है।
इस संदर्भ में निजी कंपनियों को बिजली की आपूर्ति करने वाली कंपनी दिल्ली ट्रांस्को के प्रवक्‍ता ऋषीराज का कहना है कि ये निजी कंपनियां मनमाने तरीके से उपभोक्‍ताओं से अधिक कमाई करने के लिए नित्य नई-नई स्कीम लाने की घोषणा करती हैं।
लेकिन जब तक उन स्कीमों को लागू करने की मंजूरी विनियामक आयोग की ओर से नहीं मिलती है तब तक इन कंपनियों की सारी कवायद बेकार है। उनका यह भी कहना है कि यदि एनडीपीएल ने कोका कोला की सिस्टर कनसर्न कंपनी पर्ल ड्रिंक्‍स के साथ किसी प्रकार का समझौता किया है तो यह उसकी मनमानी है। इसके लिए पहले उसे विद्युत विनियामक आयोग से स्वीकृति‍ लेना आवश्यक है।
गौरतलब है कि सन्‌ 1772 में जब अंग्रेजों ने कोलकाता में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की थी तब उन्होंने सबसे पहले अपना कब्‍जा यहां के व्यापारियों पर जमाया था। इसके बाद उन्होंने पूरे देश की जनता पर अपना अधिकार जमा लिया था। ठीक उसी प्रकार बिजली कंपनियां भी दिल्ली के उपभोक्‍ताओं पर दरों में इजाफा करने के लिए पहले तो सरकार पर दबाव बना रही थीं। लेकिन जब यहां के उपभोक्‍ताओं और विपक्षी दलों के भारी विरोध के बाद सरकार और इन कंपनियों की एक न चली तो उन्होंने बिजली की दरें बढ़ाने का एक नया रास्ता अति‍रि‍क्‍त किया है।
इस नई स्कीम के माध्यम से पहले तो वह दिल्ली के उद्यमियों को सरकार द्वारा निर्धारित बिजली दर से 50 पैसे प्रति यूनिट अधिक की राशि वसूलने की कोशिश करेंगी। इसके बाद वह आम उपभोक्‍ताओं पर अपना शिकंजा कसेगी। बताया जा रहा है कि कहीं उद्यमियों को अपने कब्‍जे में लेने के बाद बिजली कंपनियां आम उपभोक्‍ताओं के बिलों में भी अपने आप इजाफा न कर दे। इससे न तो सरकार को बिजली की दर बढ़ने के कारण भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा और न ही बिजली कंपनियों को फजीहत होगी।

नई दिल्ली। लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों को सरकार का सहयोग जरूरी है , यह कहना है केंदीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का। श्री जायसवाल ने उदार एसोसिएशन ऑफ स्माल एंड मीडिम न्यूजपेपर्स ऑफ इंडिया के अखिल भारतीय सम्‍मेलन के अवसर पर रखे। इस अवसर पर सांसद श्री तारिक अनवर ने भी लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों की एक प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रस्तुत किया।
सम्‍मेलन का आयोजन नई दिल्ली के आईटीओ निकट स्थित गांधी प्रतिष्ठान में किया गया। इस अवसर पर श्री जायसवाल ने देश के विभिन्न प्रदेशों से आए समाचार पत्र प्रकाशकों को सम्‍बोधित करते हुए कहा कि आज 70 प्रतिशत ग्रामीण राष्ट्रीय समाचार पत्रों के स्थान पर क्षेत्रीय समाचार पत्रों को पढ़ कर ही संतुष्ट हो जाती है। इसीलिए लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों की उपयोगिता केंद्र एवं राज्य सरकार दोनों के लिए है। परंतु इस समाचार पत्रों को बदलती तकनीक में अपने आपको ढालना होगा।
इसी अवसरपर सांसद तारिक अनवर ने भी अपने पत्रकारिता से जुड़ाव को बताते हुए कहा कि मैं भी कॉलेज के समय से ही पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूं और शायद इसलिए मैं इन लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों की कठिनाइयों को समझ सकता हूं। आज भी समय के अभाव के चलते मैं एक पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन कर रहा हूं।
इस मौके पर सुभाष सूद एवं मनोहर प्रभाकर ने अपने ओजस्वी विचारों से उपस्थित पत्रकारों का मार्गदर्शन किया पीआईबी के सुबोध शुक्‍ला ने पत्रकारों पीआईबी द्वारा प्रदान की जा रही प्रकाशन सामग्री के संबंध आ रही कठिनाइयों का निदान बताया। साथ ही पीआईबी की वेबसाइट में कुछ नए बदलाव का आश्वासन दिया जिससे प्रकाशकों को आसानी से प्रकाशन सामग्री उपलब्‍ध करायी जा सके।
सम्‍मेलन में ऐसो. के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. डी. चंदोला व महामंत्री अशोक चतुर्वेदी ने प्रकाशकों की समस्याओ को दूर कराने का भरोसा दिया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्य से समाचारपत्र प्रकाशक पधारे।
आयोजिक कार्यशाला में लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों की व्यवहार्यता एवं लाभदायकता पर प्रकाश डाला गया। इसके अतिरिक्‍त एक तकनीकी प्रशिक्षिण कार्यक्रम का आयोजन भी इस दौरान किया गया। उल्लेखनीय है कि उपरोक्‍त एसो. लगभग 22 वर्षों से समाचार पत्र प्रकाशकों की सेवा में सेवारत है।

नई दिल्ली। आगामी दिसम्‍बर माह में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजधानी की जनता को भले ही दिल्ली सरकार की ओर से अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने का लॉलीपॉप दिया जा रहा हो, मगर चुनावी रणनीति तैयार करने में भाजपा के मास्टर माइण्ड भी कम नहीं हैं। उन्होंने भी चुनावी किला फतह करने की आधारशिला अभी से ही रखनी आरंभ कर दी है। एक ओर यदि दिल्ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित यहां की जनता को लुभाने के लिए कभी नौ साला पुरानी अपनी सरकार की उपलब्‍धियों का बखान करने के लिए पुस्तिका निकालती है तो कभी करीब 1500 अनधिकृत कालोनियों का फेहरिश्त लेकर केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्‌डी के पास जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर नौ साला पुरानी शीला दीक्षित सरकार की उपलब्‍धियों पर पानी फैरने के लिए भाजपा की प्रदेश इकाई ने कमर कस ली है। इसके लिए भाजपा की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल द्वारा संपादित एक पत्रिका प्रकाशित की गई है। ‘शीला सरकारः नौ सालः उपलब्‍धियां या नाकामियां’ के नाम से प्रकाशित इस पत्रिका में उन तमाम बिंदुओं और उपलब्‍धियों के नकारात्मक पहलुओं के अतिरिक्‍त अनेक रहस्यों का उद्घाटन किया गया है जिसे देख, सुन और पढ़कर आम जन शीला सरकार के प्रति क्षण भर के लिए नकारात्मक सोच अपने मन बैठा सकता है।
भाजपा के प्रदेश एवं मंडल अधिकारियों के अनुसार इस पत्रिका को कार्यकर्ताओं एवं पदाधिकारियों के माध्यम से घर-घर जाकर वितरित किया जाएगा। इस पत्रिका का वितरण कराना भाजपा का एक अभियान माना जा रहा है। भाजपा के पदाधिकारियों का कहना है कि शीला दीक्षित सरकार ने अपने शासन के नौ सालों में एक नहीं, अनेक ऐसे कार्य किए हैं जिसका दूरगामी दुष्प्रभाव दिल्ली की भोली-भाली जनता को झेलना पड़ रहा है। पत्रिका में उन्हीं प्रमुख बिन्दुओं को उद्घृत किया गया है। उनका कहना है कि शीला सरकार की सबसे बड़ी नाकामी बिजली का निजीकरण करना है। सरकार और सरकार में बैठे नेताओं ने निहित स्वार्थ के लिए बिजली का निजीकरण करवा दिया। आज स्थिति यह है कि निजीकरण होने के बाद भी बिजली वितरण व्यवस्था में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। आज भी बिजली की अघोषित कटौती पूर्ववत की जा रही है। बिजली के मीटर तेज भाग रहे हैं। बिजली कंपनियां 24 घंटे बिजली की आपूर्ति करने के एवज में अतिरिक्‍त धनराशि की मांग कर रही हैं। चाहे वह आम जनता हो या उद्यमी, बिजली कंपनियों की मार से सभी त्रस्त हैं।
इसी प्रकार दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या ब्‍ल्यू लाइन बसें हैं। भाजपा के शासन काल में प्राइवेट और सरकारी सभी बसें डीटीसी के अंतर्गत चलाई जाती थीं। मगर शीला सरकार ने निजी ऑपरेटरों की कमान ढीली करके निहित स्वार्थ की पूर्ति की। जिससे आज ये ब्‍ल्यू लाइन बसें किलर लाइन बनी बैठी हैं। परिवहन और यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। बावजूद इसके दिल्ली सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है।
भाजपा पदाधिकारियों का कहना है कि सरकार को भले ही दिल्ली की जनता की चिंता नहीं है और वह दिल्लीवासियों की कब्र पर पेरिस खड़ा करने की बात सोच रही है। मगर इससे पहले कि सरकार अपने नापाक इरादे में सफल हो जाए दिल्ली की जनता उसे उखाड़ फैकेंगी।
गौरतलब है कि करीब एक वर्ष पूर्व ही दिल्ली सरकार ने विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाना आरंभ कर दिया था। यही वजह है कि दिल्ली सरकार के वार्षिक बजट में पिछले दो सालों से किसी नई योजना को शामिल नहीं किया जा रहा है। सरकार पुरानी योजनाओं के प्रारंभिक स्वरूप को बदल-बदल कर लोगों के सामने प्रस्तुत कर रही है। पिछले दो सालों में इतना अवश्य हुआ है कि सरकार ने 2003 के विधानसभा चुनाव में अलग हुए दिल्ली की रेजिडेन्ट वेलफेयर एसोसिएशनों को एक बार पुनः भागीदारी योजना के माध्यम से या अन्य किसी दूसरे तरीके से संगठित करने में बहुत हद तक सफलता हासिल की है। हालांकि निगम चुनाव के समय अधिकांश बड़े वेलफेयर फेडरेशन ने सरकार का साथ नहीं दिया था। मगर निगम में भाजपा पार्षदों की कलई खुलने के बाद उन फेडरेशनों का रुझान एक बार फिर सरकार की ओर हो गया।
इसी बीच एक बड़ी घटना सीलिंग और तोड़फोड़ की हो गई। अभी सरकार ने चुनावी रणनीति बनाना आरंभ ही किया था कि अदालती आदेश से यह कार्रवाई आरंभ कर दी गई। जिसका खामियाजा निगम चुनाव में कांग्रेस को भुगतना पड़ा। मगर इधर कुछ महीनों में दिल्ली की जनता केञ् मन का यह भ्रम भी दूर हो गया कि सीलिंग एवं तोड़फोड़ का प्रमुख कारण सरकार नहीं बल्कि कोई और है। इसके चलते आम जनता का भी रुझान सरकार की ओर से बढ़ता जा रहा था।
भाजपा के सूत्रों का कहना है कि दिल्ली की शीला सरकार चारों तरफ से चुनावी रणनीति के तहत जनता को अपनी ओर आकर्षित करने की योजना पहले ही बना चुकी है। ऐसे में यदि भाजपा के पास कोई ठोस रणनीति नहीं होगी तो चुनावी समर में मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा। इसीलिए पार्टी के प्रमुख चिंतकों एवं नीति निर्धारकों की सलाह पर इस पत्रिका का प्रकाशन कराया गया है और इसे क्षेत्रीय स्तर पर चुनाव अभियान के रूप में वितरित किया जा रहा है।

नई दिल्ली। दिल्ली की मुख्‍यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने कहा है कि उनकी सरकार गरीबों के कल्याण को उच्च प्राथमिकता दे रही है और इसके लिए विभिन्न योजनाएं बनायी गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बेहद गरीब परिवारों और मध्यम आय वर्ग के लोगों को राशन पर पूरी आपूर्ति देने की योजना बनाई गई है। अपै्रल से पूरी गति से काम शुरू होगा। एक लाख रुपये से अधिक सालाना आमदनी वाले परिवारों को अब सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ नहीं मिलेगा और इस प्रकार गरीबों को सस्ते से सस्ते दाम पर राशन व तमाम आवश्यक वस्तुएं मिलने लगेंगी।
उन्होंने यह भी कहा कि गरीब परिवारों के लिए बिजली की दरों में भी एक रुपये प्रति यूनिट की कटौती लागू होने वाली है। श्रीमती दीक्षित ने कहा कि सभी वर्गों के उत्थान की योजनाओं पर तेजी से अमल किया जा रहा है। वे पटेल नगर विधानसभा क्षेत्र जरूरतमंद लोगों के लिए तीन नई चौपालों के उद्घाटन करने के बाद एक सभा को संबोधित कर रही थीं। इस सभा में महिलाओं और गरीबों को बड़ी संख्‍या में हिस्सा लिया। इस अवसर पर सांसद जयप्रकाश अग्रवाल और श्रीमती कृष्‍णा तीरथ तथा विधायक रमाकांत गोस्वामी और राजेश लिलौठिया भी उपस्थित थे।
श्रीमती दीक्षित ने कहा कि दिल्ली में गरीब और उपेक्षित लोगों को भरपूर मदद देने के काम में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। महिलाओं के विकास के लिए जैंडर रिसॉर्ट सैंटर और स्त्री शक्‍ति कार्यक्रमों महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कन्याओं को अब बोझ नहीं माना जाना चाहिए।
सरकार ने कन्या जन्म को प्रोत्साहन देने के लिए लाडली योजना की शरूआत की है। इसके अतंर्गत कन्या जन्म से और उसके 18 वर्ष होने केञ् बीच सरकार चरणबद्घ तरीके से 5-5 हजार रुपये जमा कराएगी जो उसे 18 साल की आयु के बाद एक लाख रुपये के उपहार के रूप में मिल सकेंगे। इससे उनकी शिक्षा और सम्‍मान में बढोत्‍तरी होगी। शिक्षा के पर्याप्त अवसर उपलब्‍ध करो केञ् लिए भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव अम्‍बेडकर विश्वविद्यालय खोजा जा रहा है। इसके अलवा दिल्ली में सुंदर चमकती हुई बसें आ जाने से मेट्रो के बाद एक और यात्री अनुकूल सेवा शुरू हुई है। कुछ वर्षों में दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन की समस्या समाप्त हो जाएगी।
उन्होने कहा कि तीन चौपाल खुल जाने से सामाजिक और सामुदायिक आयोजनों की सुविधा मिलेगी। पांडव नगर के ए ब्‍लॉक में रैगर समाज की गंगा मैय्या चौपाल, यू रंजीत नगर के बी ब्‍लॉक में जाटव समाज की डॉ. अम्‍बेडकर चौपाल और डी ब्‍लॉक में खटीक समाज की श्री दुर्बल नाथ चौपाल में आधुनिक हाल और खुला मैदान है जहां सामाजिक कार्यक्रमों से आपसी भाईचारे को बढ़ावा मिल सकेगा।
श्रीमती दीक्षित ने लोगों से कहा कि हम सब मिलकर दिल्ली को और बेहतर नगर बना सकते हैं।
सासंद जयप्रकाश अग्रवाल ने कहा कि दिल्ली की सरकार गरीबों की सच्ची हितैषी है और उसको पिछले नौ वर्ष में ऐसा कर दिखाया है। दुर्बल, गरीब, वंचित और उपेक्षित वर्ग की समस्याओं को दूर करना दिल्ली सरकार की वचनबद्घता में शामिल हैं। सांसद श्रीमती कृष्‍णा तीरथ ने जनहितकारी कार्यक्रम लागू करने के लिए दिल्ली सरकार के प्रति आभार प्रकट किया।

नई दिल्ली। दिल्ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा है कि सीखने की नई कला से बच्चे पारंगत बन सकेंगे और जीवन की चुनौतियों का सफलतापूर्वक मुकाबला कर सकेंगे। श्रीमती दीक्षित ने सावदा घेवरा जेजे कालोनी में एक अनूठे नए स्कूल भवन का शुभारंभ किया। इस अवसर पर स्थानीय सांसद सज्जान कुमार, शिक्षामंत्री अरविन्दर सिंह लवली, शिक्षा सचिव रीना रे आदि भी उपस्थित थे।
नया भवन, शिक्षा विभाग की नवीनतम पहल बाला के अनुरूप तैयार किया गया है। बाला का मकसद छतों, दीवारों, खम्‍भों, सीढि़यों, दरवाजों, छत पर लगे पंखों, पेड़ों और वर्षा की बूंदों की मदद से बच्चों को सिखाना है। खेल-खेल में सीखने वाली बाला योजना केञ् अंतगर्त सीखने को आसान बनाया गया है और गणित के चुनौतीपूर्ण सवालों को जादू की तरह हल करने की राह दिखाई गई है। इसके अंतर्गत बच्चे खुद-ब-खुद की नई-नई बातों को सीखते हैं और उन पर कहीं-कहीं किताबों की कठिन भाषा और अपने शिक्षकों केञ् पारंपरिक तरीके का बोझ नहीं रहता।
श्रीमती दीक्षित ने शिक्षा विभाग की इस साहसपूर्ण पहल की प्रशंसा करते हुए कहा कि खेल खिलौने, तस्वीरों से कुछ सीखना आसान और रोचक लगता है और बच्चों को बार-बार स्कूल आने की प्ररेणा मिलती है। मुख्‍यमंत्री ने इस अनूठी कला को देखा जहां सीढि़यों पर संखाएं लिखी थीं और बच्चे उनकी मदद से जमा घटा, गुणा भाग करना सीख रहे थे।
उन्होंने कहा कि इस कला को दिल्ली के अन्य सभी स्कूलों तक ले जाने की कोशिश की जाएगी।
मुख्‍यमंत्री ने कहा कि शिक्षा ऐसी दौलत हैं जिसे कोई लूट नहीं सकता और यह कभी व्यर्थ नहीं जाती। भविष्य में केपीओ और बीपीओ जैसे क्षेत्र में पढ़े-लिखे लोगों की मांग होने वाली है। उन्होंने छात्राओं के कार्यक्रम से प्रभावित हो कर कहा कि ये सभी छात्राएं निडर और साहसी, खुले दिमाग की हैं। इन सब पर हम सबको गर्व है। उन्होंने सभी उपस्थित विद्यार्थियों और छात्राओं को धन्यवाद देते हुए कहा कि इस कला के माध्यम से इस अनूठे स्कूल की कामयाबी को दिल्ली के कोने-कोने तक पहुंचाना जरूरी है।
शिक्षामंत्री अरविन्दर सिंह ने अपने विभाग की इस योजना की विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए कहा कि पुर्नवास बस्ती में शिक्षा की क्रञंति की नई शुरूआत की जा रही है।
उन्होंने कहा कि आठ माह के भीतर दो स्कूल खोले गए हैं। दिल्ली सरकार सभी बच्चों को गुणवात्‍तापूर्ण शिक्षा देना चाहती है। श्री सिंह ने कहा कि यह स्कूल समूची दिल्ली के लिए आदर्श बन जाएगा। यह स्कूल घेवरा में उन बच्चों के लिए खोला गया हैं जिनके परिवारों को अन्य स्थानों से हटाकर यहां बसाया गया है। उन्होंने अभिभावकों से कहा कि वे पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए अपने बच्चों को स्कूल भेजें। उन्होंने विभिन्न एनजीओ से कहा कि वह स्कूलों में बच्चों को भेजने के लिए रचनात्मक योगदान दें। शिक्षामंत्री ने कहा कि दाखिले की प्रक्रिया जटिल नहीं होनी चाहिए। जटिल शिक्षा होने के कारण सर्वशिक्षा अभियान में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली में हर महीने एक नया स्कूल खोला गया जो कि एक अनूठा रिकार्ड है। नौ वर्ष में 112 स्कूल खोले जाना कामयाबी की एक अनूठी कहानी है शिक्षा सचिव श्रीमती रीना रे ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। इस अवसर पर बच्चों ने विभिन्न सांस्कृति‍क कार्यक्रम प्रस्तुत किए। महाराष्ट्र की लावणी और राजस्थान के भूगावीर नृत्य ने समा बांधा दिया।

नई दिल्ली। टैब्ल्यू एक ऐसा नाम जो गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर प्रदर्शित होने वाली देश के विभिन्न राज्यों की झांकी को रक्षा मंत्रालय से मंजूरी दिला सकता है या फिर उसका पत्ता साफ करवा सकता है। हालांकि यह नाम किसी अधिकारी अथवा सरकारी एजेंसी का नहीं है।
टैब्ल्यू झांकी बनाने वाले टैंपो मालिकों की वह संस्था है जो निजी होकर भी रक्षा मंत्रालय में अपनी पकड़ मजबूत किए हुए है। इसके पास झांकी की थीम चयन करने वाले बुद्धिजीवियों से लेकर उन कलाकारों तक की मंडली है जो झांकी में नृत्य अथवा नाटक प्रस्तुत कर लोगों का मन मोह लेते हैं। इन्हीं टैब्ल्युओं ने इस बार के गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर प्रदर्शित होने वाली दिल्ली की झांकी का पत्ता साफ करवाने में अहम भूमिका निभाई है।
वैसे तो किसी भी राज्य की झांकी अधिक से अधिक पांच से सात लाख रुपये में तैयार हो जाती है। मगर रक्षा मंत्रालय के आला अधिकारियों पर टैब्ल्युओं की पकड़ मजबूत होने के कारण राज्य सरकारों को लाखों रुपये की भेंट चढ़ानी पड़ती है। पिछले साल ही अकेले दिल्ली को झांकी बनवाने के लिए करीब 15 लाख रुपये की अदायगी करनी पड़ी थी। बताया जा रहा है कि टैंपो मालिकों के इस समूह ने पिछले साल भी दिल्ली का पत्ता साफ करवाने की कम कोशिश नहीं की थी। मगर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की केंद्र में राजनीतिक पकड़ मजबूत होने के कारण समय से पहले ही दिल्ली की झांकी बनकर तैयार हो गई थी और देश की सर्वश्रेष्ठ झांकियों में से एक थी। मगर इस बार शायद मुख्यमंत्री श्रीमती दीक्षित की भी विशेष चलने वाली नहीं है। क्योंकि इस समय केंद्र के उनके तमाम राजनीतिक आका रक्षा मंत्रालय से बाहर हैं।
दिल्ली सरकार के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रदर्शित होने वाली झांकी के चयन के लिए गणतंत्र दिवस आयोजित होने से करीब एक माह पहले ही रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों और राज्य सरकारों के सूचना एवं प्रचार निदेशालय के अधिकारियों की बैठक आयोजित की जाती है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय की ओर से बाकायदा राज्य सरकारों को चिट्ठी भी भेजी जाती है। हालांकि इस बैठक में टैब्ल्युओं को आमंत्रित नहीं किया जाता है। लेकिन रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों की सरपरस्ती के कारण इस बैठक में टैब्ल्यू मालिक भी शामिल होते हैं।
इस बैठक में झांकी की राशि तय करने की जिम्मेवारी इन्हीं टैब्ल्युओं के हाथ में होती है। यदि किसी राज्य की ओर से बैठक के समय ही टैब्ल्युओं को मोटी रकम पकड़ा दी जाती है उसका बेकार थीम का भी चयन कर लिया जाता है।
वहीं दूसरी ओर जिस राज्य सरकार की ओर से मोटी रकम नहीं दी जाती है उसके थीम की बात तो दूर झांकी बनने की उम्मीद भी क्षीण हो जाती है। इस बार केंद्रीय चयन समिति की बैठक के समय दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय की ओर से मोटी रकम नहीं दी गई। जिस कारण दिल्ली को झांकी की प्रदर्शनी से ही दूर कर दिया गया।
अब जबकि राजपथ पर प्रदर्शित होने वाली झांकियों के निर्माण की प्रक्रिया चरम पर है तब दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय को इस बात की सूचना मिली है कि इस बार दिल्ली की झांकी नहीं बनाई जा रही है।
मजे की बात यह है कि पर्दे के पीछे दिल्ली सरकार को बदनाम करने के लिए इतनी बड़ी घटना घट चुकी है। मगर अभी तक इसकी जानकारी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को नहीं है। अब सूचना एवं प्रचार निदेशालय के अधिकारियों को इस बात की उम्मीद है कि अब यदि मुख्यमंत्री ही पहल करें तो झांकी प्रदर्शनी में दिल्ली की उपस्थिति दर्ज हो सकती है।

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