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अमेरिका डूब गया, अब भारत की बारी है। दशहरा एवं दीपावली की मस्ती में डूबे देशवासियों को अब यह अहसास हो जाना चाहिए कि देश मंदी की चपेट में आ चुका है। शेयर बाजार से लेकर प्रॉपर्टी बाजार या फिर औद्योगिक बाजार, सबके सब धड़ाम हो चुकेञ् हैं। इन्हें तो इतनी चोट लगी है कि साल दो साल तक तो ये बिस्तर से उठने के काबिल भी नहीं रहेंगे। हालत इतनी नाजुक हो चुकी है कि बाजार को भरोसा दिलाने के लिए वित्त मंत्री को पिछले तीन दिनों से रोजना बयान जारी करना पड़ रहा है। दो महीने पहले रिजर्व बैंक ने जिस सीआरआर को बढ़ा दिया था उसमें कटौती कर दी गई है। नकदी आरक्षित अनुपात को सीआरआर कहते हैं और रिजर्व बैंक जो सीआरआर तय करती है उतनी मात्रा में हर बैंक को नकदी रिजर्व बैंक में जमा करनी पड़ती है। दो माह पहले महंगाई पर काबू पाने के लिए रिजर्व बैंक ने सीआरआर को बढ़ा कर 9 फीसदी कर दिया था लेकिन इस एक सप्ताह में बाजार में नकदी उपलबध कराने के उद्देश्य से इसमें 1.5 फीसदी की कटौती कर दी गई। आने वाले समय में इसमें और कटौती की संभावना है। वित्ता मंत्री पिछले तीन दिनों से यह कह रहे हैं कि लोगों का पैसा बैंक में सुरक्षित है। घबराने की कोई बात नहीं है। आखिर कौन सी ऐसी आफत आ गई है कि सरकार को यह बयान देना पड़ रहा है। असल में अमेरिका का सबसे बड़ा निवेशक बैंक लीमैन ब्रदर्स दिवालिया हो गया और मेरिन लींच बिक गया। लीमैन एवं मेरिन लींच में हमारे देश के सार्वजनिक एवं निजी दोनों ही क्षेत्रों के प्रमुख बैंकों ने पैसा लगाया हुआ था।
ऐसे में इस बात की आशंका जाहिर होना कि भारतीय बैंकों की हालत ठीक नहीं है, लाजिमी है। यूरोप के देशों की स्थिति भी उतनी ही खराब है। अमेरिका एवं यूरोप के निवेशकों द्वारा हाथ खींचने के कारण भारत में डॉलर की कमी हो गई जिससे हमारे रुपये का मूल्य रोजाना गिर रहा है। दो महीने पहले एक डॉलर का मूल्य 40 रुपये था जो अब 50 रुपये हो गया। ऐसे में आयात करने में हमारी लागत काफी बढ़ गई। जिससे हर आयातित चीज अब महंगी हो जाएगी। औद्योगिक उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले नौ फीसदी की गिरावट आ चुकी है। पिछले साल अगस्त महीने में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 10.3 फीसदी पर था जो इस साल की समान अविधि में 1.3 रह गया है। जाहिर है कि उद्यमी कितने परेशान हैं। किसी भी चीज का उत्पादन तभी गिरता है जब उसकी मांग में कमी होती है या फिर लागत बहुत अधिक हो जाती है। औद्योगिक उत्पादन में जो कमी आई है उसके लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार की मांग में आई गिरावट एक प्रमुख कारण है और जब उत्पादन में कमी आती है तो रोजगार का सृजन कम होता है और जब रोजगार कम होता है तो नई मांग नहीं निकलती है। फिलहाल देश इसी दुष्चक्र में फन्स चुका है। सरकार देश को इसी दुष्चक्र से उबारने के लिए बाजार में अधिक से अधिक नकदी का प्रवाह करना चाहती है ताकि उत्पादन की क्रिय जारी रह सके। लेकिन यह संकट इतनी आसानी से जाने वाला भी नहीं है। अमेरिका एंव यूरोप में संकट के कारण देश में आधे से अधिक बीपीओ (कॉल सेंटर) बंद हो चुके हैं जिससे हजारों लोगों की नौकरी जा चुकी है या जाने वाली है। दूसरी बात यह है कि बैंक की बयाज दर इतनी अधिक है कि कारोबारी नया निवेश करना नहीं चाहेंगे और निवेश में कमी से उत्पादन बढ़ाना संभव नहीं है।
प्रॉपर्टी बाजार की हालत तो सबसे अधिक खराब नजर आ रही है। बाजार में खरीदारों की एकाएक कमी हो गई है। बाजार तभी तक बूम कर रहा था जब तक नए खरीदार आ रहे थे। लोन की दिककत के साथ नौकरी एवं वेतन बढ़ात्तरी के संकट के कारण कोई भी व्यक्ति प्रॉपर्टी खरीदना नहीं चाहेगा। ऐसे में प्रॉपर्टी के कारोबार से जुड़े लोगों को घाटा होना निश्चित है। प्रॉपर्टी व्यवसायी बहुत दिनों तक अपनी प्रापर्टी को नहीं रख सकते हैं कयोंकि उन्हें भी बैंकों को बयाज अदा करना पड़ता है और बेचने जाने पर खरीदारों की कमी के कारण उन्हें घाटे में ही सोदा करना पड़ेगा। शेयर बाजार पहले ही लुढ़क चुका है। वहां के निवेशकों की हालत इतनी पतली हो चुकी है कि वे किसी अन्य क्षेत्र में पैसा लगाने की सोच भी नहीं सकते हैं। इधर महंगाई भी कम होती नहीं दिख रही है। सबजी, फल से लेकर दाल तक की कीमत रोजाना बढ़ रही है। कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था इस समय चारों तरफ से घिर चुकी है। सरकार चाहे लाख दावा कर ले कि सब ठीक चल रहा है पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है। ऐसे में संभल-संभल कर चलने में ही बुद्घिमानी है।

अच्छाई पर बुराई की जीत के रुप में हम हर साल दशहरे को मनाते हैं। रावण, कुंभकर्ण व अन्य राक्षसों के पुतले को जलाते हैं। पटाखे फोड़ते हैं। लाखों रुपये खर्च कर मेले का आयोजन होता है। दस दिनों तक रामलीला का मंचन होता है। शाम से देर रात तक हर गली-नुककड़ पर रामलीला के मंच व उसके दर्शक नजर आ जाते हैं। दशमी वाले दिन तो हर बच्चे को उसका बाप कहता है कि चलो बेटा रावण दहन देखकर आएं। दशहरे के मैदान में रावण जलता है। बच्चे ताली बजाते हैं। पिता पूछता है, चाट-पकौड़ी खाओगे। बेटा अगर हां में जवाब देता है तो ठीक नहीं तो वह अपने पिता के साथ घर चला आता है।
कल होकर अपने दोस्तों के बीच रावण दहन की चर्चा करता है। एक दोस्त दूसरे को बोलता है, मैंने तो बहुत बड़ा रावण देखा था। दूसरा बोलता है, मैंने तो उससे भी बड़ा रावण देखा था वो तो बहुत देर तक जल रहा था। आवाज भी बहुत आ रही थी। बच्चे भले ही नादानी में इन बातों को बोल रहे थे। लेकिन सही पूछें तो अब रावणों का कद हर साल बढ़ रहा है।
हर गली-चौराहों पर रावणों की भरमार हो गई है। कोई भी ऐसी गली नहीं जहां दो चार रावण न हों। उन्हें कौन जलाएगा? उनकी बुराइयों को कौन खत्म करेगा? इन बच्चों को कौन बताएगा कि जिस रावण के पुतले को जलते हुए देखने के लिये वे जाते हैं, उसे तो कब का मार दिया गया है। यह बात तो त्रेता युग की है। हमें तो इस युग के रावण से लड़ना है। उनकी लंका में आग लगाना है। उनकी बढ़ती हुई संक्या को रोकना है। वरना वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश में रावणों की संक्या बहुत अधिक हो जाएगी और राम सरीखे लोगों के पुतले जलाए जाएंगे।
इस बात को याद रखना चाहिए कि बुराई हम पर जल्दी हावी होती है। रावण के अवगुणों को अपनाने में हमें समय नहीं लगेगा लेकिन राम जैसा बनने में काफी वक्त लग सकता है। इसके लिए तपस्या की आवश्यकता होगी। आने वाली पीढ़ी को भी राम व रावण में फर्क बताना हमारा कर्तव्य है। इन बच्चों को सिर्फ रावण को जलते हुए दिखाने से ही हमारा काम समाप्त नहीं हो जाता है। हमें यह भी बताना होगा कि राम व रावण में क्या फर्क है और आने वाले दिनों में वे अपने ही गली-मोहल्ले के रावणों से कैसे लड़ेंगे। जिस दिन हर गली के रावणों पर हम विजय प्राप्त कर लेंगे हमारे देश के लिए असली विजयदशमी वही होगी। यह सब तो सिर्फ दिल बहलाने के लिए आयोजित हो रहा है। रावणों पर अपनी विजय पताका लहराने के लिए हमें खुद भी तैयार रहना होगा और आने वाले भविष्य को भी इसके लिए तैयार करना होगा तभी हम सचमुच विजयदशमी के अर्थ को साकार कर सकेंगे।

शनिवार को फिर बम फट गया। शुक्र है इस बार यह सीरियल बलास्ट का रूप नहीं लिया। महरौली में यह वारदात हुई जिसमें कई लोगों के मरने एवं दर्जन भर से अधिक लोगों के घायल होने की खबर है। ठीक पंद्रह दिन पहले शनिवार को ही दिल्ली में सीरियल बलास्ट हुआ था और पूरी दिल्ली दहल उठी थी, दिल्ली में बम का धुआं अभी तैर ही रहा था कि गत शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के मैरियट होटल में विस्फोट हो गया।
29 अकटूबर 2005 को दीपावली से ठीक दो दिन पहले यानी कि धनतेरस को दिल्ली में सीरियल बलास्ट हुआ था और वह काला दिन भी शनिवार ही था। तो क्या हम यह मान लेंगे कि भारत या दिल्ली के ऊपर शनि की काली छाया मंडरा रही है। क्या शनि की कुद्रष्टि से बम विस्फोट हो रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है। असल में बम विस्फोट का यह सिलसिला शनि नहीं आतंकवाद की काली छाया का नतीजा है, यह महज एक संयोग है। हां, इस बात से कोई गुरेज नहीं कि शनिवार की शाम को दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की सड़कों पर अधिक भीड़ होती है। लोग मौज-मस्ती के मूड में होते हैं, इसलिए आतंकियों को लगता है कि इस दिन विस्फोट करने से अधिक से अधिक लोगों को निशाना बनाया जा सकता है।
लेकिन विस्फोट के लिए सिर्फ और सिर्फ देश में पनपता आतंकवाद ही जिममेदार है। एक ऐसा आतंकवाद जिसका न तो कोई ईमान होता है और न ही कोई धर्म। यह अलग बात है कि आतंकवाद को आज भारत में एक धर्म विशेष से जोड़ा जा रहा है जो कहीं से न्यायपूर्ण नहीं है। हालांकि उस धर्म के कुछ लोग कहीं न कहीं आतंकवाद की भर्त्सना करने से पहले आतंकवादियों केञ् खिलाफ हुई कार्रवाई की भर्त्सना भी करते हैं जो देश की अखंडता के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इंडियन मुजाहिदीन के जन्म केञ् लिए लोग अतीत की गलतियों को जिममेदार मान रहे हैं लेकिन किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि आतंक के रास्ते पर चलने वाले उस इंडियन मुजाहिदीन के सदस्यों को उस अतीत की गलती से कोई मतलब नहीं है, वे तो रास्ते से भटके हुए नौजवान है जो मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार हैं और लश्करे तयैबा, हूजी, अलकायदा और दाऊद जैसे संगठनों का नाम उन्हें अपनी ओर खींचता है।
भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। भारत के बंटवारे केञ् दौरान भी दंगे हुए थे और धर्म के नाम पर उससे बड़ी लड़ाई कभी नहीं हुई थी। लेकिन उसके बाद तो किसी प्रकार के आतंकवाद का जन्म नहीं हुआ। लोग उसे हादसा समझकर भूल गए। उस दंगे पर कई किताबें लिखी गईं। मजहब के नाम पर आपसी मनमुटाव हुआ लेकिन वकत के साथ हम एक हो गए। हमारा जो संस्कार है वह सहिष्णु है। हमारे देश में दुख के समय में मदद के लिए उठने वाले हाथ यह कभी नहीं देखते कि वह किस मजहब का है। अतीत में भी जो गलतियां हुई हैं उसके लिए महज चंद लोग ही जिममेदार हैं अधिकतर हाथ तो मदद या गले लगने के लिए उठे हैं।
असल में यह आतंकवाद आयात हो रहा है। यह हमारा अपना उत्पाद नहीं है। तभी तो हर विस्फोट के बाद कहीं न कहीं से उसमें विदेशी बू आती है। जड़ कहीं और है। कभी आपने देखा है कि विस्फोट करने वाले की उम्र पचास साल की या पैतालीस साल की हो। ऐसा इसलिए नहीं कि इस उम्र के लोग परिपकव हो जाते हैं, उन्हें विदेशी अपने झांसे में नहीं ले पाते हैं। इसलिए आतंकवाद की लड़ाई किसी मजहब विशेष की लड़ाई नहीं है इसके खात्मे के लिए हमें इसको जड़ से खत्म करना होगा। यह तभी संभव है जब हम आतंकवाद की काली परछाई को अपने-अपने घरों से दूर रखने की शपथ लेंगे। जब कोई धमाके के सिलसिले में पकड़ा जाता है तो उसके घरवालों को इस बात का भरोसा नहीं होता है, उन्हें लगता है कि मजहब के नाम पर पुलिस और प्रशासन उनके साथ सौतेला बर्ताव कर रहा है। जबकि ऐसा होता नहीं है। हमें इन्हीं कारणों को खोजना होगा कि ऐसी क्या मजबूरी थी जो घर के चिराग आतंकवाद को रोशन करने निकल पड़े।

देश में फेलता आतंकवाद सुरक्षा ऐजेंसियों के लिए किसी नासूर से कम नहीं है। कभी जम्मु-कश्मीर, आसाम जैसे सीमावर्ती राज्यों तक सीमित रहने वाली आतंकवादी गतिविधियां अब देश के हर राज्य में आम हो गई हैं। आतंकवादी किसी भी राज्य, किसी भी शहर में बेखौफ होकर सीरियल बलास्ट जैसी घटनाओं को अन्जाम देकर साफ बच निकलते हैं और सुरक्षा ऐजेंसियां घटनाओं की जांच पड़ताल करती रह जाती हैं। इस आतंकवाद ने अब तक न जाने कितने मासूम लोगों की जान ले ली है और न जाने कितने जवान इसका मुकाबला करते हुए शहीद हो गए हैं। बावजूद इसके सरकार अभी तक आतंकवाद के सफाए के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है। इसी का नतीजा है कि गत 19 सितमबर शुक्रवर 2008 को एक और जांबाज आतंकवाद के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गया। वर्षों तक दिल्ली पुलिस की सेवा में रहे पुलिस इंस्पेकटर मोहन चंद शर्मा की गिनती न केवल जांबाज पुलिसकर्मियों में होती थी बल्कि उन्हें अपराधियों का दुश्मन माना जाता था। यह उनकी देशभकति और बहादुरी का ही नमूना है कि अपने बेटे को डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी से जूझता हुआ छोड़ कर वे आतंकवादियों से लोहा लेने जामिया नगर इलाके में पहुंच गए। श्री शर्मा के नेतृत्व में पुलिस टीम ने इस इलाके के एक फलैट में छिपे दो आतंकवादियों को तो ढेर कर दिया लेकिन इसकी कीमत उन्हें श्री शर्मा के बलिदान से चुकानी पड़ी।
श्री शर्मा की मौत पर पक्ष विपक्ष के छोटे बड़े नेताओं ने मगरमछी आंसू बहाते हुए उनकी शहादत को नमन किया और आतंकवाद के खिलाफ डट कर मुकाबला करने का आह्वन किया। ऐसा आह्वन हमारे नेता हर आतंकी घटना के बाद करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि देश में फेल रहे आतंकवाद की असली जड़ हमारे यह नेता ही हैं। वोटों की राजनीति और विशेष वर्ग को खुश रखने के चक्कर में हमारी केन्दर सरकार अभी तक कोई भी ऐसा कड़ा कानून नहीं बना पाई है जिसके बल पर आतंकवाद का सफाया किया जा सके। यदि कुच राजनैतिक दल अथवा विपक्षी पार्टियां आतंकवाद के खिलाफ पोटा जैसे कड़े कानून की मांग करती भी हैं तो कांग्रेस सरकार व मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले उनके सहयोगी दल यह कह कर इस मांग को ठुकरा देती हैं कि पोटा जैसे कानून की आड़ में मुस्लिम समुदाय के लोगों को बेवजह परेशान किया जाएगा।
सवाल यह उठता है कि जब पोटा जैसा कानून आतंकवाद से लड़ने के लिए बनाया जाएगा न कि किसी धर्म विशेष के लोगों को तंग करने के लिए, तो फिर यह नेता ऐसा कियों सोचते हैं कि इस कानून का इस्तेमाल केवल मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ही होगा। यह बात अलग है कि देश में होने वाली अधिकांश आतंकवादी गतिविधियों में मुस्लिम समुदाय से जुड़े आतंकियों का ही हाथ होता है, जिन्हें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की खुफिया ऐजेंसी आईएसआई का समर्थन मिला हुआ है। इस बात को नए कानून का विरोध करने वाले नेता भी भली भांति जानते हैं।

हर देश की राष्ट्र भाषा होती है और उस देश की सरकार व जनता अपनी राष्ट्र भाषा सममान करती है। लेकिन इसे हिन्दुस्तान का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि संविधान में भले ही हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया गया हो लेकिन इसके सममान को लेकर न तो आज तक कोई भी केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और न ही यहां के नेता गंभीर रहे हों। हाल ही में सपा सांसद एवं अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री जया बच्चन ने मुम्बई के एक समारोह में हिन्दी में भाषण क्या दे दिया कि वहां की राजनीति में तूफान खड़ा हो गया।
यह तूफान किसी और ने नहीं बल्कि अपने आपको सबसे ज्यादा राष्ट्र भक्त बताने वाली महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने खड़ा किया। वैसे तो महाराष्ट्र में अपने वजूद को बचाए रखने के लिए मनसे सुप्रिमो राज ठाकरे आए दिन कोई न कोई ऐसी बयानबाजी करते रहते हैं जिससे मुम्बई व महाराष्ट्र में तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है।
इस मामले में सबसे ज्यादा गंभीर व चिंता की बात यह है कि एक हिन्दुस्तानी अपने ही देश में अपनी राष्ट्र भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकता। यह बात अलग है कि हर प्रदेश की अपनी कोई न कोई मातृ भाषा है और वहां का हर नागरिक उस राज्य की मातृ भाषा का मान-सम्मान करता है। राज ठाकरे यदि महाराष्ट्र में रहने वाले लोगों को मराठी भाषा का इस्तेमाल करने पर जोर देते हैं तो किसी को भी इस बात पर एतराज नहीं होना चाहिए क्योकि देश के अधिकांश राज्यों में अपनी मातृ भाषा को न केवल पाठ्‌य क्रम में आवश्यक किया गया है बल्कि बोलचाल में भी अधिक से अधिक मातृ भाषा का प्रयोग करने की चेष्टा की गई है। इस मामले में यदि राज ठाकरे यह कह कर जया का विरोध कर रहे हैं कि उन्होंने यूपी को अपना घर व हिन्दी को मातृ भाषा बताया, तो भी यह विरोध किसी भी तरीके से उचित नहीं माना जा सकता।
कयोंकि हिन्दी यूपी की मातृ भाषा बाद में है पहले भारत की राष्ट्र भाषा है। इसके अलावा किसी भी राज्य में भले ही वहां की मातृ भाषा का प्रयोग किया जाता हो, लेकिन राष्ट्र भाषा होने के कारण हिन्दी का प्रयोग करने में किसी भी राज्य की सरकार को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। राज ठाकरे ने यह सब बबाल भले ही मनसे को राजनीतिक संजीवनी देने के लिए खड़ा किया हो लेकिन इस सारे प्रकरण में केन्द्र सरकार की चुप्पी बेहद शर्मनाक है।
जिस राष्ट्र भाषा को बोलने के बाद किसी व्यक्ति को सार्वजनिक माफी मांगनी पड़े ऐसी राष्ट्र भाषा का सम्मान कब तक और कितना रह पाएगा, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन यदि केन्द्र सरकार ने राष्ट्र भाषा हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में जीवित रखने के लिए गंभीरता से जन-जागरण अभियान नहीं चलाया तो आने वाले कुछ वर्षों में हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी अतीत का इतिहास बन कर रह जाएगी।

बिहार में बाढ़ की विपदा कोई नई बात नहीं है। उत्तरी- बिहार में हर साल बाढ़ आती है और करोड़ों रुपये का नुकसान होता है। कोसी नदी का कहर भी कोई पहली बार नहीं बरपा है। करीब बीस साल पहले कोसी नदी की धार से बचने के लिए नेपाल सीमा पर बांध बनाया गया। पर इस बार कोसी की धार के आगे बूढ़े बांध की कुछ नहीं चली और बिहार के लगभग 11 जिलों में प्रलय जैसी स्थिति बन गई। रातों रात लोग बेघर हो गए, भिखमंगे हो गए। बिहार के छह जिलों में तो ऐसा लग रहा है जैसे यहां कभी कोई रहता ही नहीं था। यहां सिर्फ पानी ही पानी है। पहले से ही गरीबी में जी रहे बिहार वासियों को इस बाढ़ ने ऐसा डुबोया है कि उन्हें होश संभालने में कम से कम तीन साल लगेंगे। घर-द्वार, गाय-बैल न जाने क्या-क्या बाढ़ में बह गए।
भोले-भोले गांववासियों को यह पता तक नहीं चला कि कब बिहार की अभिशाप कोसी ने अपना रास्ता बदल लिया। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रशासन को भी इस बात की पूरी खबर नहीं लगी। असल में कोसी बांध की खबर कई सालों से नहीं ली गई। पानी का रिसाव शुरु हो चुका था लेकिन उस बांध तक जाने की जहमत बिहार सरकार के अधिकारियों ने नहीं उठायी। जब लोग डूबने लगे, मरने लगे तब जाकर उन्हें लगा कि यह तो प्रलय आ गया। राहत कार्य भी शुरु हुआ तो देर से। तब तक कई मां अपने बेटों से बिछड़ चुकी थीं, कई बच्चे अनाथ हो चुके थे तो कईयों की मांग उजड़ चुकी थी, बची थी तो सिर्फ उनके पेट की आग जो उन्हें भी जलाने को तैयार बैठी थी। लेकिन देर से ही सही राहत कार्यों ने लोगों को जिंदा रखा है।
प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रीय विपदा बताया और क् करोड़ रुपये देने की घोषणा भी की और न जाने किन-किन लोगों ने प्रधानमंत्री राहत कोष से लेकर मुखयमंत्री राहत कोष तक में पैसे देने की बात कही है। लेकिन सवाल है कि इस राहत के पहुंचने तक क्या वे बच पाएंगे। उन्हें तो फौरी राहत चाहिए थी जिसके लिए बिहार प्रशासन तैयार नहीं था। प्रशासन पिछले साल बाढ़ में किए गए अपने कार्यों को अपनी उपलホधि मानता है। उसे इस बात का इल्म था कि ऐसा भी हो सकता है, लेकिन इसकी तैयारी पहले से नहीं की गई। 30 लाख लोगों को राहत देना कोई आसान काम भी नहीं है। असली मदद वहां के स्थानीय लोग ही कर रहे हैं। शिविर लगाए गए हैं और हजारों लोग अपनी नई जिंदगी की उममीद में किसी तरीके से एक शाम मिलने वाली खिचड़ी खाकर अपना गुजर बसर कर रहे हैं। कई बच्चों ने तो इसी राहत शिविर में जन्म भी ले लिया है जिन्हें दूध की जगह बाढ़ का पानी पीना पड़ रहा है। सबसे बड़ी बात है कि राहत के लिए हाथ बढ़ाने में देश केञ् लोगों ने थोड़ी देरी जरूर की है। मुखयमंत्री नीतिश कुमार को भी प्रधानमंत्री से इसके लिए गुहार लगानी पड़ी।
किसी भी बड़े फिल्म स्टार या उद्योगपति ने प्रलयकारी बाढ़ की बात सुनने के बाद भी अपनी तरफ से मदद की कोई घोषणा नहीं की। नेता भी ईमानदारी से मदद करने की जगह बाढ़ पर अपनी राजनीति करते ज्यादा दिखे। सबको पता है जहां बाढ़ आती है वहां बीमारियां भी बहुत ज्यादा होती हैं और काबू नहीं पाने पर यह महामारी का रूप ले लेती हैं।
बिहार में डॉकटरों की कमी पहले से ही है। अगर दस प्रांतों से सौ-सौ डॉकटर इस दुख की घड़ी में वहां भेज दिए जाएं तो बहुत बड़ी मदद मिल सकती है। लेकिन ऐसा कियो किया जाएगा? हर प्रांत की सरकार यह देखती है वहां सरकार किस पार्टी की है। भाजपा समर्थित सरकार है तो अन्य प्रांत की भाजपा सरकार ही इस प्रकार की पहल करेगी। दिल्ली नगर निगम ने चिकित्सा सेवा के 100 लोगों के दल को बिहार रवाना किया है जिसमें 30 डॉकटर हैं। अब जरा दिल्ली में रह रहे बिहारियों की बात करें। दिल्ली में 40 लाख से अधिक बिहारीवासी हैं। इनमें से पांच लाख लोग तो ऐसे जरूर हैं जो बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए पांच रुपये दे सकते हैं। ऐसे में यह रकम 25 लाख हो जाती है। लेकिन इस प्रकार की कोई पहल नहीं की गई। छठ पूजा के नाम पर बिहार के लोग मुमबई से लेकर दिल्ली तक रात में आर्केस्तरा करवाते हैं, नौटंकी करवाते हैं और लाखों रुपये फान्द देते हैं, लेकिन बिहार के बेबस लोगों के लिए इन लोगों ने कोई पहल नहीं की। दिल्ली में तथाकथित बिहारी नेता ने बड़े पैमाने पर ऐसा कियों नहीं किया? गरीबी झेल रहा बिहार भी भारत का ही अंग है और देश का विकास भी बिहार के विकास से जुड़ा है। बिहार को सोमालिया बनाकर हम भारत को पेरिस नहीं बना सकते हैं। परिवार में कम कमाने वाले सदस्य के बीमार पड़ने पर अमीर भाई के छोड़ देने पर उस परिवार का एक सदस्य चला जाता है, परिवार छोटा हो जाता है, एक सदस्य का योगदान खत्म हो जाता है। भारत की संस्कृति सबको साथ लेकर चलने की है और हमें अकेले नहीं बांट कर खाना सिखाया जाता है। जो भी हो विपाति की इस घड़ी में बिहार को सहारे की जरूरत है। देश के सक्षम हर हाथ को इस घड़ी में मदद के लिए आगे आने चाहिए। यह भी नहीं देखा जाना चाहिए कि बिहार में सरकार किसकी है। सरकार वहां किसी पार्टी की हो मुसीबत में फन्से लोगों की एक ही पार्टी होती है एक ही मजहब होता है और वह है बेबसी। उनकी आंखों में बस मदद की गुहार दिखती है। भारत इतना विशाल देश है और मुसीबत में हम तमाम दीवारों को तोड़ते हुए एक दूसरे के काम आए हैं और यही हमारी पहचान है, इसी से हम आज एक हैं। आओ हम सब मिल कर प्रतिज्ञा करें कि इस बार भी हम बिहार को डूबने के लिए नहीं छोड़ेंगे।

दिल्लीवासी आजकल सड़कों पर जाम की समस्या से खासे त्रस्त हैं। वैसे तो दिल्ली के विभिन्न मार्गों पर ट्रेफिक जाम रहना दिल्ली की नियति बन चुका है लेकिन बरसातों के कारण ट्रेफिक जाम की समस्या और भी गंभीर हो गई है। हालत यह है कि मात्र 10 से 20 किलोमीटर का रास्ता तय करने के लिए वाहन चालकों को दो से तीन घंटे तक सड़कों पर रेंगना पड़ता है। दिल्ली सरकार द्वारा मुखय मार्गों को सिग्नल फिरि बनाने के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं और विभिन्न मुखय चौराहों पर अंडर पास या ओवर ब्रिज का निर्माण भी करवाया जा रहा है। बावजूद इसके जाम की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। वैसे तो दिल्ली की अधिकांश सड़कों पर ट्रेफिक की स्थिति यह है कि कोई भी वाहन चालक 25 से 30 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफतार से अधिक अपना वाहन नहीं चला पाता है, लेकिन हाल ही में हुई बरसातों ने दिल्ली की अधिकांश सड़कों पर गड्ढ की ऐसी बरसात कर दी है कि अब वाहन चालकों का ध्यान वाहन चलाने से ज्यादा वाहन बचाने में लगा रहता है।
एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में वाहनों की संखया लगभग 60 लाख के आसपास है। इनमें से करीब 98 प्रतिशत वाहन 24 घंटे सड़कों पर ही रहते हैं। दिल्ली की सड़कें जहां दिन में वाहन चलाने के काम आती हैं वहीं रात के समय वाहन पार्क करने के लिए। दिल्ली में वाहन पार्किंग की समस्या एक गंभीर समस्या है। आज एक-एक परिवार के पास दो से चार वाहन हैं लेकिन इनमें से एक भी वाहन खड़ा करने के लिए पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। जिसके चलते अधिकांश वाहन मालिकों को दिन के समय अपनी दुकानों अथवा कार्यालयों के आगे तथा रात के समय अपने घर के आगे बनी सड़क पर अपने वाहन पार्क करने पड़ते हैं।
दिल्ली में ट्रेफिक नियमों की अनदेखी भी ट्रेफिक जाम का एक बहुत बड़ा कारण है। प्रतिबंध के बावजूद भी रिंग रोड अथवा आउटर रिंग रोड पर साईकिल, रिकशा, रेहड़ी वाले बेखौफ होकर सड़क के बीचोंबीच चलते हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह साईकिल अथवा रिकशा चालक लाल बात्ति की भी परवाह नहीं करते हैं और बिना सिग्नल के ही जिधर चाहे, जहां चाहे मुड़ जाते हैं। जिसके चलते वाहनों की गति तो अवरुद्घ होती ही है साथ ही दुर्घटनाएं भी घटती रहती हैं। कहने को इन दोनों मुखय मार्गों के दोनों ओर सर्विस लेन का निर्माण किया गया है लेकिन यह सर्विस लेन अवैध पार्किंग, अवैध पटरी बाजार अथवा अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी हैं।
दिल्ली में अधिकांश चौराहों के चारों ओर रिकशा वालों का जमघट लगा रहता है जिसके चलते कोई भी वाहन चालक बाईं ओर भी मुड़ने में भारी परेशानी महसूस करता है। इस मामले में दिल्ली ट्रेफिक पुलिस की भूमिका भी बेहद चौकाने वाली है। उन्हें लाल बात्ती क्रोस करते हुए अथवा बिना हेलमेट दुपहिया चलाते हुए चालक तो दिखाई दे जाते हैं लेकिन चौराहों पर रिकशा वालों का लगा रहने वाला जमावड़ा दिखाई नहीं देता। बात स्पष्ट है कि वे भी अपनी ड्यूटी से ज्यादा जेब भरने में विश्वास रखते हैं।

भारत ने ओलंपिक में तीन मेडल जीत लिए हैं, एक स्वर्ण तो दो कांस्य। इतने मेडल पहली बार भारत को ओलंपिक में मिले हैं, बहुत खुशी की बात है। भारतवासियों को भी कहने का मौका मिल गया है कि वे ओलंपिक में मेडल जीत सकते हैं। यह अलग बात है कि मेडल जीतने में चीन की बराबरी तो दूर उसके आस-पास पहुंचने में भी हमें सालों लग जाएंगे। हालांकि जब विकास की बात होती है तो हम अपना मुकाबला चीन से ही करते हैं या दूसरे देश भी चीन के बाद भारत को ही सबसे तेजी से बढ़ता देश मानते हैं।
खैर छोडि़ए इन बातों को, अभिनव ने भारत को शूटिंग में स्वर्ण पदक दिलाया है। बीजिंग आलंपिक में इस कारण भारत के राष्ट्रगान को बजने का मौका मिला। हर देशवासी का सीना फख्र से चौड़ा हो गया। हो भी कयों नहीं, हमारे देश में कोई फेलेप्स तो पैदा होता नहीं है कि इकट्ठे 6-7 स्वर्ण पदक जीत ले। इतने पदक तो हमने 60 साल में नहीं जीते। अगर अभिनव के स्वर्ण पदक को ही देखें तो उसकी चमक में भारत सरकार का कया योगदान है? वैसे उसकी जीत के बाद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर हर बड़े लोगों ने उसे शाबाशी दी और उस पर इनामों की बौछार हो गई। चार-पांच करोड़ रुपये उसे इनाम स्वरूप मिल गए। लेकिन लोगों को यह भी पता होना चाहिए कि अभिनव का कोचिंग पर सालाना खर्च एक करोड़ रुपये से अधिक का था और बीते पांच सालों से वह इस प्रकार की कोचिंग ले रहा था।
अभिनव जन्म-जात संपन्न है। उसकी प्रॉपर्टी क् करोड़ रुपये से अधिक की है। लेकिन हर शूटर अभिनव की हैसियत का नहीं होता। उसे तो सरकार से ही मदद की आस होती है। जिस दिन अभिनव को स्वर्ण पदक मिला उस दिन मिलखा सिंह कह रहे थे कि हर मां को ऐसा बेटा पैदा करना चाहिए। लेकिन होना यह चाहिए कि देश के हर शूटर को अभिनव जैसी सुविधा और कोचिंग मिलनी चाहिए और यह जिममेदारी सरकार की है। चीन के खिलाड़ी अमेरिका को पछाड़ रहे हैं, क्यों? क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग देने की जिममेदारी वहां की सरकार लेती है। हमारे यहां तो क्रिकेट छोड़ किसी भी खेल पर खर्च करने के लिए पैसा ही नहीं है। क्रिकेट पर भी सरकार नहीं बीसीसीआई खर्च करती है। हॉकी का तो यह हाल हो गया है कि ओलंपिक खेलने केञ् लिए हम कवालिफाई ही नहीं कर पाए। कितने दुख की बात है।
ओलंपिक के जिस खेल में हमने स्वर्ण पदक हासिल किया था आज हम उस खेल में हिस्सा लेने के काबिल भी नहीं रहे। बॉकसिंग और कुश्ति के विजेताओं को भी सरकार से कोई खास मदद नहीं मिली है। इन दोनों खेलों में खुराक की बड़ी अहमियत होती है। खुराक में अच्छी खासी रकम खर्च हो जाती है। इसलिए कोई गरीब घर का बच्चा भारत में न तो कुश्ति लड़ सकता है और न ही मुक्केबाजी कर सकता है। क्योंकि भारत में सरकार की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं होती है। गरीब बच्चों की प्रतिभा भूख और अच्छे भोजन के अभाव में दब जाती है। जो लोग इस हैसियत में होते हैं कि रोजाना 5-7 लीटर दूध पी सकें या उस प्रकार का खाना अपने पैसे से खा सकें, वही पहलवान बन सकता है या फिर मुक्केबाज।
आखिर बिहार, उड़ीसा या पूर्वी उत्तर प्रदेश से कोई मुककेञ्बाज या पहलवान पैदा タयों नहीं होता। कयों सिर्फ पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में ही इस प्रकार के खिलाड़ी होते हैं। कयोंकि ये राज्य अपेक्षाकृत संपन्न हैं और यहां के किसान परिवार अपने बच्चों को रोजना काफी मात्रा में दूध, घी, मकखन खिलाने में सक्षम हैं। लेकिन अन्य प्रदेशों में ऐसा नहीं है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मैडल तालिका में देश के नाम को चमकाने के लिए वहां की सरकार को भारी मशककत करनी पड़ती है। कोई बच्चा पेट से ही शूटर, मुककेञ्बाज या तीरंदाज पैदा नहीं होता। यह सब उसकी प्रेकटिस या उसे मिलने वाली सुविधा पर निर्भर करता है। सरकार से मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर करता है। जिस देश के नेता और अफसर इन बातों को समझते हुए भी न समझें और खिलाडि़यों को प्रोत्साहित करने की जगह खुद को प्रोत्साहित करने में लगे रहें, उस देश से कया उम्मीद की जा सकती है।

इसे देश चलाने वाली सरकार की नाकामी कहें या फिर विभिन्न राजनीतिक दलों की महत्वकांक्षा कि आज देश के दुश्मनों पर गोली चलाने वाले जवानों को अपने ही देशवासियों पर गोली चलानी पड़ रही है। आज पूरा जममू-कश्मीर जल रहा है, लेकिन सभी राजनीतिक दल जममू-कश्मीर में लगी आग बुझाने का प्रयास करने की बजाय उसी आग पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में मश्गूल हैं। भूमि के एक छोटे से टुकड़े ने एक बार फिर दो समुदायों के बीच नफरत का बीज बो दिया है। कश्मीर के कुछ हिस्से को लेकर भले ही भारत-पाक के बीच आज भी विवाद बना हुआ हो, लेकिन जो हिस्सा भारत के कホजे में है निःसंदेह वह भारत का एक अभिन्न अंग है।
जममू-कश्मीर में भले ही धारा 370 लागू हो लेकिन यह प्रदेश किसी एक जमात अथवा समुदाय की जागीर नहीं है। गत दिनों संसद में विश्वास प्रस्ताव के दौरान बोलते हुए नेशनल कांफेस के नेता उमर अホदुल्ला ने जिस बेशर्मी के साथ चीख-चीख कर कहा ‘यह जमीन हमारी है और कश्मीर का मुसलमान अपनी जमीन के लिए जान भी दे सकता है। हर वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए जो लाखो हिन्दू यहां पहुंचते हैं और दर्शन करते हैं, यह सभी यहां के मुसलमान के बिना कतई संभव नहीं है’। यह वाकय बोलते हुए उनके चेहरे पर जिस प्रकार के भाव उभर रहे थे वह निश्चित रूप से किसी एक वर्ग के खिलाफ जहर उगलते दिखाई दे रहे थे। जमीन और हक की इसी लड़ाई ने पाकिस्तान की नींव रखी और आज देश के हितैषी बनने वाले यह तथाकथित नेता कश्मीर में एक और पाकिस्तान बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
वास्तविकता तो यह है कि अमरनाथ श्राईन बोर्ड को अस्थायी रूप से आवंटित की जाने वाली 100 एकड़ भूमि को लेकर वहां के स्थानीय मुसलमान भाईयों को कोई एतराज नहीं है। यदि एतराज है तो उन राजनीतिक दलों को जो मुसलमानों के सच्चे हितैषी बनने का ढोंग कर हिन्दू-मुस्लिम एकता में दरार डालना चाहते हैं। यदि शीघ्र ही सभी राजनीतिक दलों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर जममू-कश्मीर में लगी आग को शांत करने की कोशिश नहीं की तो आने वाले समय में देश के अन्य भागों में भी जममू-कश्मीर जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है।

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