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दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा हाल ही में करीब पांच हजार फ्लेटो के लिए किये गए ड्रॉ में जो घोटाला सामने आया है उसने एक बार फिर यह सिद्घ कर दिया है कि दिल्ली का विकास तथा दिल्ली में रह रहे जरूर्त्मनद के लिए आशियाना मुहैया कराने का दावा करने वाला डीडीए अब केव्ल भूमाफियाओं, प्रोपर्टी डीलरों तथा भ्रष्ट अधिकारियों की कमाई का जरिया बन कर रह गया है। ऐसा नहीं है कि डीडीए में फ्लेट आवंटन घोटाला पहली बार हुआ है। वर्षों पहले भी ऐसे ही एक घोटाले ने डीडीए का दामन दागदार किया था। लेकिन इस बार के घोटाले ने डीडीए द्वारा पारदर्शी तरीके से ड्रॉ निकालने के दावे की पूरी तरह से पोल खोल कर रख दी है। फ्लेट आवंटन में घोटाला होने का एक बड़ा कारण डीडीए द्वारा फ्लेटों की निर्धारित कीमत तथा बाजार भाव में भारी अंतर होना भी रहा है।
डीडीए द्वारा जिस एमआईजी फ्लेट की कीमत ब् से ब्भ् लाख रुपये निर्धारित की गई थी, उसका बाजार भाव करीब एक करोड़ रुपये है। यही कारण है कि मात्र 5000 फ्लेटों के लिए छः लाख से अधिक फार्म भरे गए। यदि इन सभी फार्मों की गहराई से जांच की जाए तो यह बात स्पष्टस्न् हो जाएगी कि एक-एक भूमाफिया ने अलग-अलग फर्जी नामों से अकेले ही सैकड़ों फार्म जमा करवाए।
इसके अलावा अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के आवेदक भी आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं कि वे इतने महंगे फ्लेटों के लिए आवेदन कर सकें। इस मौके का फायदा भी भूमाफियाओं व भ्रष्ट अधिकारियों ने उठाया। जिसका सबूत राजस्थान में एक ही विशेष जाति के आवेदकों के नाम पर कई फ्लेट आवंटित होना है।
दिलचस्प बात यह है कि इन सभी सफल आवेदकों के नाम के आगे एक ही मोबाइल नミबर दर्ज था, जो इस बात को पूरी तरह से प्रमाणित करता है कि डीडीए द्वारा किये गए ड्रॉ में किसी न किसी रूप में अनियमितता बरती गई है।
यदि डीडीए वास्तव में ही जरूरतमंद लोगों को आशियाना मुहैया कराना चाहता है तो उसे चाहिए कि ड्रॉ से पहले प्राप्त हुए सभी आवेदनों की बारीकी से जांच पड़ताल करे और इस मामले में दोषी लोगों के खिलाफ सखत कार्रवाई करे तभी वह अपने मकसद में कामयाब हो सकता है। अन्यथा भविष्य में भी ऐसे ही घोटाले होते रहेंगे और भ्रष्ट अधिकारी तथा भूमाफिया हमेशा की तरह आगे भी जरूरतमंद लोगों का हक छीन कर करोड़ों की काली कमाई करते रहेंगे।

वर्ष 2008जा रहा है और वर्ष 2009 आ रहा है। वर्ष 2008 में हुई घटनाएं हमारे व हमारे देश के लिए किसी भी रूप में अच्छी नहीं कही जा सकती हैं। जयपुर में सीरियल बम पलास्ट, बैंगलोर में बम धमाके, दिल्ली में सीरियल बम पलास्ट, गुजरात में कई स्थानों पर बम धमाके और वर्ष के जाते-जाते मुमबई में अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले ने देश की जनता को झकझोर कर रख दिया। आतंकवाद की घटनाएं अतीत में शायद ही किसी वर्ष घटी हों। यह बात अलग है कि हर आतंकी घटना के बाद हर भारतवासी पहले से कहीं अधिक मानसिक शक्ति के साथ आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए तैयार खड़ा दिखाई दिया है। महंगाई ने भी इस वर्ष इतनी लमबी छलांग लगाई कि क्या गरीब और क्या अमीर सबको छठी का दूध याद आ गया। कारोबार की दृष्टि से भी यह वर्ष कोई बहुत अच्छा नहीं बीता। 21 हजार का रिकॉर्ड आंकड़ा छूने के बाद शेयर बाजार के सेंसैकस ने ऐसा गोता लगाया कि देखते ही देखते अरबोंपति भी कंगाल हो गए। बड़ी-बड़ी कंपनियों की शेयर पूंजी देखते ही देखते एक चौथाई रह गई। महंगाई व मंदी का असर रियल स्टेट पर भी पड़ा और प्रोपर्टी बजार में भी भारी गिरावट दर्ज की गई।
अगर राजनैतिक दलों की बात करें तो यह साल भाजपा के लिए भी कोई खास नहीं रहा। जहां एक ओर राजस्थान में उसे हार का मुंह देखना पड़ा वहीं दिल्ली में भी भाजपा की हवा निकल गई और सीएम इन वेटिंग प्रो. विजय कुमार मलहोत्रा का मुख्यमंत्री बनने का सपना भी चकना चूर हो गया। करीब सवा साल पहले उत्तर प्रदेश में साथ में काबिज होने वाली बसपा को भी इस साल में कई झटके सहने पड़े। पार्टी के एक सांसद व कई विधायक एक-एक कर किसी न किसी आपराधिक मामलों में फेसला फस्ता चले गए। कुल मिला कर कहा जाए तो वर्ष 2008 ने देश व जनता को खुशहाली कम और परेशानी ज्यादा दी।
इस साल की समाप्ति केञ् समय देश व जनता के सामने कई ऐसी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं जिनका सामना देश व जनता को वर्ष 2009 में भी करना पड़ेगा। वर्ष 2009 देश व जनता के लिए खुशहाली व नई खुशियां लेकर आए, इसी कामना के साथ मैं एक कवि की यह पंक्तिया दोहराना चाहता हूं ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे हम मिल कर नई कहानी’।

अभी दिल्ली के बाटला हाऊस में उग्रवादियों के एन्काउंटर के दौरान शहीद हुए पुलिस अधिकारी महेश चंद शर्मा की शहादत पर सपा नेता अमर सिंह द्वारा दिये गए बयान का बवाल थमा भी नहीं था कि अब केन्द्र में अल्पसंखयक मामलों के केन्द्रिय मंत्री अबदुल रहमान अंतुले ने मुमबई में हुए आतंकी हमले के दौरान महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की शहादत पर सवाल खड़े करने वाले बयान देकर राजनीतिक हलकों में तूफान पैदा कर दिया है। उन्होंने अपने बयान के माध्यम से करकरे की हत्या को साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मामले से जोड़कर अल्पसंखयकों का सच्चा हितैषी बनने की जो कोशिश की है वह किसी भी मायने में राष्ट्र हित में नहीं है। मुमबई में हुए आतंकी हमले के लिए जहां एक ओर भारत सरकार व सुरक्षा एजेंसियां पाकिस्तान को इस बात का सबूत दे रही है कि इस हमले में मारे गए आतंकी व पकड़ा गया आतंकी कसाब पाकिस्तानी है वहीं दूसरी ओर अंतुले का यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं पाकिस्तान का बचाव कर रहा है। न तो आतंकवाद का कोई धर्म होता है और न ही कोई मजहब लेकिन हमारे देश के सात्तलोलुप नेता देश में फेले आतंकवाद को भी धर्म व मजहब के नाम पर बांट कर अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने में मश्गूल हैं। किसी एक विशेष धर्म या मजहब के वोट हासिल करने के लिए हमारे देश के नेता जिस ढंग से आए दिन बयान बाजी कर रहे हैं वह किसी भी तरीके से देश व जनता के हित में नहीं है। ऐसे में अब जनता का फर्ज बनता है कि समय आने पर इन सात्तलोलुप नेताओं को इनके अंजाम तक पहुंचा दे।

हाल ही में देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा लगातार कमजोर हो रही है और कमजोर मानी जाने वाली कांग्रेस धीरे-धीरे मजबूती की ओर बढ़ रही है। पांच राज्यों के चुनावों को लोकसभा चुनाव का सैमिफाइनल माना जा रहा था और यह माना जा रहा था कि इन राज्यों के चुनाव में भाजपा न केवल अपनी शक्ति को बढ़ाएगी बल्कि दिल्ली में दस साल पुरानी कांग्रेस सरकार को भी साथ से बेदखल कर देगी। लेकिन भाजपा नेताओं के मुताबिक इस बार के परिणाम चौंकाने वाले आए हैं। दिल्ली में सरकार बनाने का सपना तो अधूरा रह ही गया साथ ही राजस्थान में भी साथ से बेदखल होना पड़ा। यह तो शुक्र है कि मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छात्तिसगढ़ में डॉ. रमन सिंह ने अपनी लोकप्रियता के बल पर भाजपा सरकार को बचाने में कामयाबी हासिल कर ली वरना वहां भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ सकती थी।
दोनों राज्यों में से केवल छत्तिसगढ़ ही एक ऐसा राज्य है जहां भाजपा पहले की तरह मजबूत स्थिति में बनी हुई है। जबकि मध्य प्रदेश में भाजपा भले ही अपने सरकार बचाने में कामयाब रही हो लेकिन प्रदेश में उसकी लोकप्रियता व शक्ति का ग्राफ पिछले चुनाव की अपेक्षा काफी कम हुआ है। जबकि कांग्रेस ने अपनी स्थिति काफी मजबूत की है। गत विधानसभा चुनाव में राजस्थान में प्रचण्ड बहुमत के साथ मुख्यमंत्री की कुर्सि पर काबिज़ हुई महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया के अडि़यल रवैये, गूर्जर आन्दोलन ने मात्र मांच वर्षों के भीतर ही भाजपा को लगभग पुरानी स्थिति में ला खड़ा किया है। भाजपा की कमजोर हुई इस स्थिति पर भाजपा दिग्गजों को गहन मंथन करने की आवश्यकता है वरना आगामी लोकसभा चुनाव में आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने का सपना, सपना ही रह जाएगा।

दिल्ली में सभी चुनावी विश्लेषणों को झुठलाते हुए कांग्रेस एक बार फिर शानदार जीत के साथ साथ में आ गई है। शीला ने अपनी व पार्टी की जीत की हैट्रिक बना कर न केवल पार्टी में ही अपने विरोधियों को आइना दिखा दिया है बल्कि भाजपा को भी उसकी औकात बता दी है। दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सि पर गत क् वर्षों से काबिज़ श्रीमती शीला दीक्षित को अपने मुख्यमंत्रीत्व काल में समय-समय पर न केवल अपनी ही पार्टी के नेताओं का विरोध झेलना पड़ा बल्कि मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के आरोपों को भी सहन करना पड़ा। बावजूद इसके उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति को कभी कमजोर नहीं होने दिया। उन पर बिजली के निजीकरण में करोड़ों रुपये का घोटाला किये जाने केञ् आरोप भी पक्ष व विपक्ष के नेताओं द्वारा लगाए गए।
बी.आर.टी. व बल्यू लाईन बसों के मामलों में भी विपक्षियों ने उन्हें घेरने की कोशिश की लेकिन श्रीमती शीला दीक्षित इन सब आरोपों से बेपरवाह होकर दिल्ली के विकास में जुटी रहीं। हालांकि चुनाव के समय भाजपा ने महंगाई, आतंकवाद जैसे जनता से जुड़े मुद्दों को उछाल कर दिल्ली के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की, लेकिन दिल्ली के विकास का मुद्दा भाजपा पर भारी पड़ा और जनता ने एक बार फिर शीला व कांग्रेस में विश्वास व्यक्ति करते हुए भाजपा को नकार दिया। दिल्ली में भाजपा की यह हार केवल भाजपा की ही नहीं बल्कि भाजपा के सी.एम. इन वेटिंग विजय कुमार मल्होत्रा की भी हार है। क्योकि दिल्ली के मतदाताओं ने एक तरह से भाजपा के नहीं बल्कि विजय कुमार मल्होत्रा के नेतृत्व को नकार दिया है।

दीपावली आ गई है। लेकिन घरों में पावर कट जारी है। सड़कों पर भी अंधेरा ही अंधेरा है और दिल तो पहले से ही काला हुआ पड़ा है। यहां तो रोशनी के लिए कोई जगह ही नहीं है। अगर किसी के दिल में दीये जल भी रहे हैं तो लोग उसे बुझाने पर तुले हैं। यानी कि हम सब भीतर से अंधकार में जी रहे हैं। दीपावली को पूरी दिल्ली रोशनी से नहा जाएगी। हर जगह बम फतेगे, पटाखे बजेंगे, कैंडल लाइट से लेकर दूधिया बल्ब अपनी जगमगाती रोशनी के आगोश में दिल्ली को समा लेंगे। ऐसा लगेगा जैसे कितना खुशहाल है यह शहर। कहीं किसी बात की कोई दिक्कत ही नहीं। लेकिन असलियत कुछ और ही है। यहां तो हर आदमी एक-दूसरे की बात्ति गुल करने पर लगा है। उन्हें लगता है कि अगर वे सामने वाले की बात्ति बुझा देंगे तो उनके यहां ज्यादा रोशनी हो जाएगी। उनके घर में ज्यादा खुशी आ जाएगी। पर ऐसा करने से उनके यहां कृतिम रोशनी ज्यादा हो जाती है लेकिन उनके भीतर की रोशनी बुझती जाती है और वे प्रकाश में रहते हुए भी कुछ देख नहीं पाते हैं। यानी कि जगमगाती रोशनी में भी वे अंधे के माफिक हो जाते हैं।
इन दिनों इसी प्रकार के अंधों की भरमार हो गई है। ऐसे लोगों को यह समझना होगा कि मर्यादा पुरुषात्तम प्रभु श्रीराम जी जब रावण (बुराई) को मार कर अयोध्या लौटे थे तो उनके स्वागत में दीये जलाए गए थे, खुशियां मनाई गई थीं और तब से दीपावली मनाने का सिलसिला जारी है। रामजी ने ऐसा काम किया था जिससे सारी सृष्टि को खुशी मिली थी। उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को मार गिराया था जिसने समस्त लोगों के जीवन में अंधकार कर रखा था। रावण के मरते ही अंधकारकालीन एक युग का अंत हुआ था इसलिए दीपावली मनाई गई थी। अब फिर से इस बात की जरूरत आ पड़ी है कि हम रावण का नाश करें।
राम केयुग में एक रावण था लेकिन इस युग में तो हर आदमी के भीतर रावण छिपा है। हमारे आपके दिल में भी। असली दीवाली तो तभी मनाई जा सकती है जब हम अपने अंदर के अंधकार को समाप्त कर लें और दिल के अंदर ज्योत जलाएं। ऐसा तभी संभव है जब हमारे दिल में एक-दूसरे के प्रति उपजने वाला द्वेष समाप्त हो जाएगा। जो आसान काम नहीं है। इसके लिए तप की जरूरत है। तप का मतलब यह नहीं है कि हम पहाड़ या गुफा में जाकर तपस्या करें। हमें करना सिर्फ यही है कि हम दूसरे की बात्ति गुल करने की फिराक में न रहें। हमारी नीयत ऐसी होनी चाहिए कि अगर किसी केञ् घर की रोशनी चली जाए तो हम उसके घर में भी रोशनी करने को तत्पर रहें तभी तो असली दीया जलेगा। इस दीवाली पर हमें इसी बात की शपथ लेनी चाहिए कि हम दिखावे की दीपावली की जगह अंदर की दीपावली मनाएंगे। किया हम ऐसे युग की शुरुआत नहीं कर सकते हैं जहां हर घर में रोशनी हो, हर घर खुशहाल हो, हर दिल जगमग हो। इस साल से हम ऐसे ही दीये जलाकर एक नए युग की शुरुआत करेंगे।

अमेरिका डूब गया, अब भारत की बारी है। दशहरा एवं दीपावली की मस्ती में डूबे देशवासियों को अब यह अहसास हो जाना चाहिए कि देश मंदी की चपेट में आ चुका है। शेयर बाजार से लेकर प्रॉपर्टी बाजार या फिर औद्योगिक बाजार, सबके सब धड़ाम हो चुकेञ् हैं। इन्हें तो इतनी चोट लगी है कि साल दो साल तक तो ये बिस्तर से उठने के काबिल भी नहीं रहेंगे। हालत इतनी नाजुक हो चुकी है कि बाजार को भरोसा दिलाने के लिए वित्त मंत्री को पिछले तीन दिनों से रोजना बयान जारी करना पड़ रहा है। दो महीने पहले रिजर्व बैंक ने जिस सीआरआर को बढ़ा दिया था उसमें कटौती कर दी गई है। नकदी आरक्षित अनुपात को सीआरआर कहते हैं और रिजर्व बैंक जो सीआरआर तय करती है उतनी मात्रा में हर बैंक को नकदी रिजर्व बैंक में जमा करनी पड़ती है। दो माह पहले महंगाई पर काबू पाने के लिए रिजर्व बैंक ने सीआरआर को बढ़ा कर 9 फीसदी कर दिया था लेकिन इस एक सप्ताह में बाजार में नकदी उपलबध कराने के उद्देश्य से इसमें 1.5 फीसदी की कटौती कर दी गई। आने वाले समय में इसमें और कटौती की संभावना है। वित्ता मंत्री पिछले तीन दिनों से यह कह रहे हैं कि लोगों का पैसा बैंक में सुरक्षित है। घबराने की कोई बात नहीं है। आखिर कौन सी ऐसी आफत आ गई है कि सरकार को यह बयान देना पड़ रहा है। असल में अमेरिका का सबसे बड़ा निवेशक बैंक लीमैन ब्रदर्स दिवालिया हो गया और मेरिन लींच बिक गया। लीमैन एवं मेरिन लींच में हमारे देश के सार्वजनिक एवं निजी दोनों ही क्षेत्रों के प्रमुख बैंकों ने पैसा लगाया हुआ था।
ऐसे में इस बात की आशंका जाहिर होना कि भारतीय बैंकों की हालत ठीक नहीं है, लाजिमी है। यूरोप के देशों की स्थिति भी उतनी ही खराब है। अमेरिका एवं यूरोप के निवेशकों द्वारा हाथ खींचने के कारण भारत में डॉलर की कमी हो गई जिससे हमारे रुपये का मूल्य रोजाना गिर रहा है। दो महीने पहले एक डॉलर का मूल्य 40 रुपये था जो अब 50 रुपये हो गया। ऐसे में आयात करने में हमारी लागत काफी बढ़ गई। जिससे हर आयातित चीज अब महंगी हो जाएगी। औद्योगिक उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले नौ फीसदी की गिरावट आ चुकी है। पिछले साल अगस्त महीने में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 10.3 फीसदी पर था जो इस साल की समान अविधि में 1.3 रह गया है। जाहिर है कि उद्यमी कितने परेशान हैं। किसी भी चीज का उत्पादन तभी गिरता है जब उसकी मांग में कमी होती है या फिर लागत बहुत अधिक हो जाती है। औद्योगिक उत्पादन में जो कमी आई है उसके लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार की मांग में आई गिरावट एक प्रमुख कारण है और जब उत्पादन में कमी आती है तो रोजगार का सृजन कम होता है और जब रोजगार कम होता है तो नई मांग नहीं निकलती है। फिलहाल देश इसी दुष्चक्र में फन्स चुका है। सरकार देश को इसी दुष्चक्र से उबारने के लिए बाजार में अधिक से अधिक नकदी का प्रवाह करना चाहती है ताकि उत्पादन की क्रिय जारी रह सके। लेकिन यह संकट इतनी आसानी से जाने वाला भी नहीं है। अमेरिका एंव यूरोप में संकट के कारण देश में आधे से अधिक बीपीओ (कॉल सेंटर) बंद हो चुके हैं जिससे हजारों लोगों की नौकरी जा चुकी है या जाने वाली है। दूसरी बात यह है कि बैंक की बयाज दर इतनी अधिक है कि कारोबारी नया निवेश करना नहीं चाहेंगे और निवेश में कमी से उत्पादन बढ़ाना संभव नहीं है।
प्रॉपर्टी बाजार की हालत तो सबसे अधिक खराब नजर आ रही है। बाजार में खरीदारों की एकाएक कमी हो गई है। बाजार तभी तक बूम कर रहा था जब तक नए खरीदार आ रहे थे। लोन की दिककत के साथ नौकरी एवं वेतन बढ़ात्तरी के संकट के कारण कोई भी व्यक्ति प्रॉपर्टी खरीदना नहीं चाहेगा। ऐसे में प्रॉपर्टी के कारोबार से जुड़े लोगों को घाटा होना निश्चित है। प्रॉपर्टी व्यवसायी बहुत दिनों तक अपनी प्रापर्टी को नहीं रख सकते हैं कयोंकि उन्हें भी बैंकों को बयाज अदा करना पड़ता है और बेचने जाने पर खरीदारों की कमी के कारण उन्हें घाटे में ही सोदा करना पड़ेगा। शेयर बाजार पहले ही लुढ़क चुका है। वहां के निवेशकों की हालत इतनी पतली हो चुकी है कि वे किसी अन्य क्षेत्र में पैसा लगाने की सोच भी नहीं सकते हैं। इधर महंगाई भी कम होती नहीं दिख रही है। सबजी, फल से लेकर दाल तक की कीमत रोजाना बढ़ रही है। कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था इस समय चारों तरफ से घिर चुकी है। सरकार चाहे लाख दावा कर ले कि सब ठीक चल रहा है पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है। ऐसे में संभल-संभल कर चलने में ही बुद्घिमानी है।

अच्छाई पर बुराई की जीत के रुप में हम हर साल दशहरे को मनाते हैं। रावण, कुंभकर्ण व अन्य राक्षसों के पुतले को जलाते हैं। पटाखे फोड़ते हैं। लाखों रुपये खर्च कर मेले का आयोजन होता है। दस दिनों तक रामलीला का मंचन होता है। शाम से देर रात तक हर गली-नुककड़ पर रामलीला के मंच व उसके दर्शक नजर आ जाते हैं। दशमी वाले दिन तो हर बच्चे को उसका बाप कहता है कि चलो बेटा रावण दहन देखकर आएं। दशहरे के मैदान में रावण जलता है। बच्चे ताली बजाते हैं। पिता पूछता है, चाट-पकौड़ी खाओगे। बेटा अगर हां में जवाब देता है तो ठीक नहीं तो वह अपने पिता के साथ घर चला आता है।
कल होकर अपने दोस्तों के बीच रावण दहन की चर्चा करता है। एक दोस्त दूसरे को बोलता है, मैंने तो बहुत बड़ा रावण देखा था। दूसरा बोलता है, मैंने तो उससे भी बड़ा रावण देखा था वो तो बहुत देर तक जल रहा था। आवाज भी बहुत आ रही थी। बच्चे भले ही नादानी में इन बातों को बोल रहे थे। लेकिन सही पूछें तो अब रावणों का कद हर साल बढ़ रहा है।
हर गली-चौराहों पर रावणों की भरमार हो गई है। कोई भी ऐसी गली नहीं जहां दो चार रावण न हों। उन्हें कौन जलाएगा? उनकी बुराइयों को कौन खत्म करेगा? इन बच्चों को कौन बताएगा कि जिस रावण के पुतले को जलते हुए देखने के लिये वे जाते हैं, उसे तो कब का मार दिया गया है। यह बात तो त्रेता युग की है। हमें तो इस युग के रावण से लड़ना है। उनकी लंका में आग लगाना है। उनकी बढ़ती हुई संक्या को रोकना है। वरना वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश में रावणों की संक्या बहुत अधिक हो जाएगी और राम सरीखे लोगों के पुतले जलाए जाएंगे।
इस बात को याद रखना चाहिए कि बुराई हम पर जल्दी हावी होती है। रावण के अवगुणों को अपनाने में हमें समय नहीं लगेगा लेकिन राम जैसा बनने में काफी वक्त लग सकता है। इसके लिए तपस्या की आवश्यकता होगी। आने वाली पीढ़ी को भी राम व रावण में फर्क बताना हमारा कर्तव्य है। इन बच्चों को सिर्फ रावण को जलते हुए दिखाने से ही हमारा काम समाप्त नहीं हो जाता है। हमें यह भी बताना होगा कि राम व रावण में क्या फर्क है और आने वाले दिनों में वे अपने ही गली-मोहल्ले के रावणों से कैसे लड़ेंगे। जिस दिन हर गली के रावणों पर हम विजय प्राप्त कर लेंगे हमारे देश के लिए असली विजयदशमी वही होगी। यह सब तो सिर्फ दिल बहलाने के लिए आयोजित हो रहा है। रावणों पर अपनी विजय पताका लहराने के लिए हमें खुद भी तैयार रहना होगा और आने वाले भविष्य को भी इसके लिए तैयार करना होगा तभी हम सचमुच विजयदशमी के अर्थ को साकार कर सकेंगे।

शनिवार को फिर बम फट गया। शुक्र है इस बार यह सीरियल बलास्ट का रूप नहीं लिया। महरौली में यह वारदात हुई जिसमें कई लोगों के मरने एवं दर्जन भर से अधिक लोगों के घायल होने की खबर है। ठीक पंद्रह दिन पहले शनिवार को ही दिल्ली में सीरियल बलास्ट हुआ था और पूरी दिल्ली दहल उठी थी, दिल्ली में बम का धुआं अभी तैर ही रहा था कि गत शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के मैरियट होटल में विस्फोट हो गया।
29 अकटूबर 2005 को दीपावली से ठीक दो दिन पहले यानी कि धनतेरस को दिल्ली में सीरियल बलास्ट हुआ था और वह काला दिन भी शनिवार ही था। तो क्या हम यह मान लेंगे कि भारत या दिल्ली के ऊपर शनि की काली छाया मंडरा रही है। क्या शनि की कुद्रष्टि से बम विस्फोट हो रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है। असल में बम विस्फोट का यह सिलसिला शनि नहीं आतंकवाद की काली छाया का नतीजा है, यह महज एक संयोग है। हां, इस बात से कोई गुरेज नहीं कि शनिवार की शाम को दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की सड़कों पर अधिक भीड़ होती है। लोग मौज-मस्ती के मूड में होते हैं, इसलिए आतंकियों को लगता है कि इस दिन विस्फोट करने से अधिक से अधिक लोगों को निशाना बनाया जा सकता है।
लेकिन विस्फोट के लिए सिर्फ और सिर्फ देश में पनपता आतंकवाद ही जिममेदार है। एक ऐसा आतंकवाद जिसका न तो कोई ईमान होता है और न ही कोई धर्म। यह अलग बात है कि आतंकवाद को आज भारत में एक धर्म विशेष से जोड़ा जा रहा है जो कहीं से न्यायपूर्ण नहीं है। हालांकि उस धर्म के कुछ लोग कहीं न कहीं आतंकवाद की भर्त्सना करने से पहले आतंकवादियों केञ् खिलाफ हुई कार्रवाई की भर्त्सना भी करते हैं जो देश की अखंडता के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इंडियन मुजाहिदीन के जन्म केञ् लिए लोग अतीत की गलतियों को जिममेदार मान रहे हैं लेकिन किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि आतंक के रास्ते पर चलने वाले उस इंडियन मुजाहिदीन के सदस्यों को उस अतीत की गलती से कोई मतलब नहीं है, वे तो रास्ते से भटके हुए नौजवान है जो मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार हैं और लश्करे तयैबा, हूजी, अलकायदा और दाऊद जैसे संगठनों का नाम उन्हें अपनी ओर खींचता है।
भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। भारत के बंटवारे केञ् दौरान भी दंगे हुए थे और धर्म के नाम पर उससे बड़ी लड़ाई कभी नहीं हुई थी। लेकिन उसके बाद तो किसी प्रकार के आतंकवाद का जन्म नहीं हुआ। लोग उसे हादसा समझकर भूल गए। उस दंगे पर कई किताबें लिखी गईं। मजहब के नाम पर आपसी मनमुटाव हुआ लेकिन वकत के साथ हम एक हो गए। हमारा जो संस्कार है वह सहिष्णु है। हमारे देश में दुख के समय में मदद के लिए उठने वाले हाथ यह कभी नहीं देखते कि वह किस मजहब का है। अतीत में भी जो गलतियां हुई हैं उसके लिए महज चंद लोग ही जिममेदार हैं अधिकतर हाथ तो मदद या गले लगने के लिए उठे हैं।
असल में यह आतंकवाद आयात हो रहा है। यह हमारा अपना उत्पाद नहीं है। तभी तो हर विस्फोट के बाद कहीं न कहीं से उसमें विदेशी बू आती है। जड़ कहीं और है। कभी आपने देखा है कि विस्फोट करने वाले की उम्र पचास साल की या पैतालीस साल की हो। ऐसा इसलिए नहीं कि इस उम्र के लोग परिपकव हो जाते हैं, उन्हें विदेशी अपने झांसे में नहीं ले पाते हैं। इसलिए आतंकवाद की लड़ाई किसी मजहब विशेष की लड़ाई नहीं है इसके खात्मे के लिए हमें इसको जड़ से खत्म करना होगा। यह तभी संभव है जब हम आतंकवाद की काली परछाई को अपने-अपने घरों से दूर रखने की शपथ लेंगे। जब कोई धमाके के सिलसिले में पकड़ा जाता है तो उसके घरवालों को इस बात का भरोसा नहीं होता है, उन्हें लगता है कि मजहब के नाम पर पुलिस और प्रशासन उनके साथ सौतेला बर्ताव कर रहा है। जबकि ऐसा होता नहीं है। हमें इन्हीं कारणों को खोजना होगा कि ऐसी क्या मजबूरी थी जो घर के चिराग आतंकवाद को रोशन करने निकल पड़े।

देश में फेलता आतंकवाद सुरक्षा ऐजेंसियों के लिए किसी नासूर से कम नहीं है। कभी जम्मु-कश्मीर, आसाम जैसे सीमावर्ती राज्यों तक सीमित रहने वाली आतंकवादी गतिविधियां अब देश के हर राज्य में आम हो गई हैं। आतंकवादी किसी भी राज्य, किसी भी शहर में बेखौफ होकर सीरियल बलास्ट जैसी घटनाओं को अन्जाम देकर साफ बच निकलते हैं और सुरक्षा ऐजेंसियां घटनाओं की जांच पड़ताल करती रह जाती हैं। इस आतंकवाद ने अब तक न जाने कितने मासूम लोगों की जान ले ली है और न जाने कितने जवान इसका मुकाबला करते हुए शहीद हो गए हैं। बावजूद इसके सरकार अभी तक आतंकवाद के सफाए के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है। इसी का नतीजा है कि गत 19 सितमबर शुक्रवर 2008 को एक और जांबाज आतंकवाद के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गया। वर्षों तक दिल्ली पुलिस की सेवा में रहे पुलिस इंस्पेकटर मोहन चंद शर्मा की गिनती न केवल जांबाज पुलिसकर्मियों में होती थी बल्कि उन्हें अपराधियों का दुश्मन माना जाता था। यह उनकी देशभकति और बहादुरी का ही नमूना है कि अपने बेटे को डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी से जूझता हुआ छोड़ कर वे आतंकवादियों से लोहा लेने जामिया नगर इलाके में पहुंच गए। श्री शर्मा के नेतृत्व में पुलिस टीम ने इस इलाके के एक फलैट में छिपे दो आतंकवादियों को तो ढेर कर दिया लेकिन इसकी कीमत उन्हें श्री शर्मा के बलिदान से चुकानी पड़ी।
श्री शर्मा की मौत पर पक्ष विपक्ष के छोटे बड़े नेताओं ने मगरमछी आंसू बहाते हुए उनकी शहादत को नमन किया और आतंकवाद के खिलाफ डट कर मुकाबला करने का आह्वन किया। ऐसा आह्वन हमारे नेता हर आतंकी घटना के बाद करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि देश में फेल रहे आतंकवाद की असली जड़ हमारे यह नेता ही हैं। वोटों की राजनीति और विशेष वर्ग को खुश रखने के चक्कर में हमारी केन्दर सरकार अभी तक कोई भी ऐसा कड़ा कानून नहीं बना पाई है जिसके बल पर आतंकवाद का सफाया किया जा सके। यदि कुच राजनैतिक दल अथवा विपक्षी पार्टियां आतंकवाद के खिलाफ पोटा जैसे कड़े कानून की मांग करती भी हैं तो कांग्रेस सरकार व मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले उनके सहयोगी दल यह कह कर इस मांग को ठुकरा देती हैं कि पोटा जैसे कानून की आड़ में मुस्लिम समुदाय के लोगों को बेवजह परेशान किया जाएगा।
सवाल यह उठता है कि जब पोटा जैसा कानून आतंकवाद से लड़ने के लिए बनाया जाएगा न कि किसी धर्म विशेष के लोगों को तंग करने के लिए, तो फिर यह नेता ऐसा कियों सोचते हैं कि इस कानून का इस्तेमाल केवल मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ही होगा। यह बात अलग है कि देश में होने वाली अधिकांश आतंकवादी गतिविधियों में मुस्लिम समुदाय से जुड़े आतंकियों का ही हाथ होता है, जिन्हें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की खुफिया ऐजेंसी आईएसआई का समर्थन मिला हुआ है। इस बात को नए कानून का विरोध करने वाले नेता भी भली भांति जानते हैं।

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