एक और चुनावी स्टंट (अंक-26)
Feb 4th, 2008 by admin
एक बार फिर से दिल्ली की जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है। राजनीति की चासनी में लिपटी जलेबी फिर से दिल्लीवासियों के सामने परोसी जा रही है। चुनाव जो हैं। सरकार ने 1 जनवरी 2006 के पहले बनी सभी अवैध इमारतों को गिराने पर रोक लगा दी है। यहां तक कि सील की गई सभी व्यावसायिक इकाईयों को खोलने के लिए भी कहा गया है। लेकिन जरा गौर कीजिए, सरकार ने अवैध निर्माण करने वालों को हमेशा के लिए माफी नहीं दी है। सरकार ने कहा है कि यह अध्यादेश 31 दिसम्बर 2008 तक प्रभावी रहेगा। यानीकि 1 जनवरी 2009 से एक बार फिर से तोड़फोड का सिलसिला चालू हो जाएगा। ऐसा होगा भी क्यों नहीं, क्योंकि 1 जनवरी 2009 आने से पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव हो जाएंगे और सरकार भी बन जाएगी।
सरकारी नोटीफिकेशन के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र कानून 2007 की धारा 5 के तहत अवैध कालोनी, ग्रामीण आबादी और उसके विस्तारित रूप में बने अनधिकृत निर्माण को नहीं गिराया जाएगा। इस संबंध में पहले से जारी सभी नोटिस को भी निलंबित कर दिया गया है। केन्द्र व दिल्ली विधानसभा में बैठी कांग्रेस की सरकार को पता है कि अभी फरवरी महीना चल रहा है। नवम्बर में चुनाव होना है। 7-8 महीनों में अगर कोई तोड़फोड़ नहीं हुई तो लोगों के दिलोदिमाग से तोड़फोड़ की बातें निकल जाएगी। क्योंकि जनता की याददाश्त कमजोर होती है। इतने अंतराल तक तोड़फोड़ रुक जाने से विपक्ष भी इसे चुनावी मुद्दा नहीं बना पाएगा। सरकार चुनाव जीत जाती हैं तो फिर वह निश्चिंत हो जाएगी। वह बेधड़क होकर तोड़फोड़ करवाएगी, फिर यही रोना रोएगी कि हमारे हाथ में भी कुछ भी नहीं है। सब कुछ कोर्ट के निर्देश पर किया जा रहा है या कहेगी हमारे हाथ में कुछ नहीं है केंद्र सरकार ही सब कुछ कर सकती है।
अगर कांग्रेस दिल्ली के चुनाव हार जाती है, तब तो उसे इस नोटिफिकेशन से कोई मतलब भी नहीं होगा। फिर तो अवैध निर्माण से जुड़ी तोड़फोड़ का ठिकरा भाजपा पर फूटेगा। उस समय कांग्रेसी नेता चीख-चीख कर कहेंगे अगर हम जीतते तो यह दिन नहीं देखना पड़ता। अब दिल्ली की जनता को यह भी सोचना चाहिए कि यही नोटिफिकेशन का अध्यादेश पहले भी जारी किया जा सकता था। दिल्ली की जनता को इस प्रकार की राहत पहले भी दिलवायी जा सकती थी। ऐसा कहीं से नहीं था कि जो निर्देश अभी जारी किए गए हैं, उसे एक साल पहले जारी नहीं किया जा सकता था। एक साल पहले भी यही सरकार थी। असल में सरकार की मंशा जनता को राहत देना है ही नहीं। सरकार को तो खुद राहत लेनी है। पहले अनधिकृत कालोनियों को अधिकृत करने का ऐलान किया अब सीलिंग पर रोक लगा दी।
लेकिन यह सब फौरी राहत है। अनधिकृत कालोनी का मामला भी चुनावी स्टंट है। सरकार तो दो चार कालोनी को अधिकृत करने की कार्रवाही में ही अक्टूबर-नवम्बर पूरा कर देगी और फिर अन्य कालोनीवासियों को कहेगी अगर उन्हें अपनी कालोनी अधिकृत करवानी है तो उन्हें वोट दें। अब फैसला जनता के हाथ में है क्योंकि जनता ही असली नारायण है।