महंगाई की मार (अंक 31)
Mar 11th, 2008 by admin
चुनावी बजट, नया पे-कमीशन, महंगाई भत्तों में बढोत्तरी, इन लोकलुभावन घोषणाओं के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार इन दिनों चिंतित हो गई है। कारण साफ है लगातार बढ़ती महंगाई। खासकर के ऐसे समय में जब परमाणु करार को लेकर वामपंथी दलों ने सरकार से अपना नाता तोड़ने की धमकी दे डाली है। जाहिर है आम चुनाव कभी भी हो सकते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि दिल्ली में भी इसी साल चुनाव होने हैं। सरकार को इस बात की उम्मीद थी कि चुनावी बजट पेश कर व किसानों की ऋण माफी की घोषणा के बाद वे चुनाव मैदान में जा सकते हैं। क्योंकि माहौल उनके अनुकूल होगा। लेकिन महंगाई की दर काबू से बाहर होने के कारण जनता के साथ सरकार भी परेशान नजर आ रही है। खाद्य पदार्थों की कीमत चाहे वह सब्जी हो या फिर अनाज सभी की कीमतों में आग लगी हुई है। महंगाई की दर ने 5.02 पर पहुंच कर पिछले 10 महीने के रिकॉड को तोड़ दिया है। शेयर बाजार और जिंस बाजार रोजाना हिचकोले खा रहे हैं। असल में सरकार चाहे जितने राग अलाप ले महंगाई पर काबू पाना अब आसान नहीं रहा। बजट में भले ही पेट्रोल के दामों में बढोत्तरी नहीं की लेकिन गत 14 फरवरी को ही पेट्रोल के दाम दो रुपये और डीजल के दाम एक रुपये बढ़ा दिए थे। महंगाई अभी और बढ़ेगी क्योंकि कच्चे तेल के दाम 106 डॉलर प्रति बैरल की उंचाई को छू चुके हैं और इसमें और बढोत्तरी की संभावना है। पेट्रोल और डीजल तो छोडि़ए आटा, चावल, खाद्य, तेल सबके भाव आसमान पर हैं। सोना रोज महंगा होता जा रहा है। देखा जाए तो सरकार आर्थिक क्षेत्र के हर सेंटर में नाकाम साबित हो चुकी है। आखिर कब तक महंगाई की रफतार जारी रहेगी, इस पर कब लगेगी लगाम? सरकार चिल्ला रही है कि चिंता की बात नहीं है सब ठीक हो जाएगा लेकिन कैसे ठीक हो जाएगा। जरा खुद सोचिए। मामूली 6 फीसदी महंगाई भत्त बढ़ाने से सरकार पर तीन हजार करोड़ रुपेय का अतिरिक्त भार पड़ेगा और छठे वेतन आयोग की सिफारिश को लागू करने पर सरकार को कम से कम 25 से 30 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा। 60000, करोड़ किसानों के हित में माफ कर दिया गया। यानीकि वो पैसा भी बैंक को सरकार चुकाएगी। आखिर ये भरभाई कहां से होगी। सरकारी खचाने में से पैसा निकलेगा तो उसे भरने के लिए सरकार कहीं न कहीं से यह भार आम जनता पर ही डालेगी। दूसरी ओर विपक्ष भी यह चाहेगा कि महंगाई चुनाव होने तक बढ़ती रहे ताकि वे चिल्ला-चिल्लाकर कह सकें कि देखों सरकार ने क्या किया। जो भी हो भुगतना तो जनता को ही पड़ता है।