दिल्ली का चुनावी बजट (अंक 34)
Mar 31st, 2008 by admin
दिल्ली सरकार ने भी अपने बजट में दिल्ली की जनता को खुश करने की पूरी कोशिश की है। उसने भी केंद्र सरकार की राह पर चलते हुए चुनावी बजट पेश कर दिया। जनता को खुश करने के लिए किसी प्रकार का कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं लगाया गया। उल्टा कई जगहों पर जहां से सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती थी वहां वैट को कम कर दिया गया है या पूर्ण रूप से खत्म कर दिया गया है। कमजोर वर्गों के लिए कई नई घोषणाओं का ऐलान कर दिया गया। सीनियर सिटिजन, विकलांग और विधवाओं को मिलने वाली पेंशन राशि को बढ़ाकर 600 रुपये की जगह 1000 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया। आंगनवाड़ी वर्करों की देयराशि में भी 500 रुपये की बढोत्तरी कर दी गई। इसी तरह स्कूली बच्चों की पोशाक के लिए राशि को बढ़ाकर 300 रुपये से 500 रुपये कर दिया गया। व्यापारी वर्ग को लुभाने के लिए तालों, सीएफएल लैंप, नमकीन व मिठाइयों पर लगने वाले 12.5 फीसदी वैट को कम करके 4 फीसदी कर दिया गया। दिल्ली के बजट में अवैध बस्तियों के लाखों वोटरों का भी ध्यान रखा गया। अनधिकृत कालोनियों के विकास कार्यों और स्वच्छता सेवाओं के लिए आगमी वित्त वर्ष में 743 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। दिल्ली सरकार ने अपने बजट में लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के लिए भी पूरी कोशिश की है।
पिछले चुनाव में मिली कामयाबी को देखते हुए शीला सरकार ने फिर से नुस्खों को आजमाने की कोशिश की है। यही वजह है कि इस बजट में जहां रियायत पर जोर दिया गया है वहीं सरकार ने विकास कार्यों से जुड़ी योजनाओं पर दिल खोलकर पैसा खर्चने का ऐलान किया है। इसकी वजह भी साफ है। सरकार इस बार फिर चुनाव में विकास का कार्ड खेलने की तैयारी में है और उम्मीद के मुताबिक दिल्ली सरकार ने अपने आखिरी बजट में हर तरीके से जनता को खुश करने की कोशिश की है। कारोबारी समुदाय से लेकर गरीब तबके तक को बजट के रूप में चुनावी रेवडि़यां बांटी गई हैं। सरकार यह भी जानती है कि यह उसका आखिरी बजट है और लोक लुभावन बजट लोगों को खुश करने का सबसे आसान तरीका है।
सरकार भी जानती है कि कम से कम चुनावी दंगल में वह इस लोक लुभावन बजट का सहारा ले सकती है। अगर जीत मिल जाती है तो वह इस बजट में संशोधन कर सकती है या अगले साल के बजट से इसकी भरपाई कर लेगी। अगर हार गई तो उसके फैसले को आने वाली नई सरकार को झेलना होगा। सरकार ने सिर्फ अपने खर्चे को बढ़ाने की कोशिश की है और खर्च करना सबसे आसान काम है। लेकिन उम्दा भविष्य के लिए आय का होना भी उतना ही जरूरी है। दिल्ली सरकार का राजकोषीय घाटा भी बढ़ता जा रहा है। सरकार ने भी माना है कि यह चिंता का विषय है। राजकोषीय घाटा बढ़ने का मतलब है सरकार की गैर योजना मद खर्च में बढोत्तरी। इस खर्च पर अंकुश लगाने की जरूरत है। लेकिन सरकर ने यह साफ नहीं किया कि वह इस राजकोषीय घाटे को कम कैसे करेगी। जो भी हो वित्त मंत्री के इस बजट से लोगों को भले ही खुशी मिली हो लेकिन असलियत का खुलासा तो आने वाले समय में होगा।