सर्कस का शेर (अंक 36)
Apr 14th, 2008 by admin
दिल्ली का पुजारी एक बार फिर ‘अपने घर’ लौट आया है। यह बात अलग है कि अपने बड़बोलेपन के लिए मशहूर रहे मदन लाल खुराना की वापसी बेहद सादगीपूर्ण तरीके से हुई। उनकी घर वापसी से जहां उनके समर्थकों में एक नए जोश का संचार हुआ है, वहीं उनके विरोधियों के बीच कुछ बेचैनी नजर आने लगी है। हालांकि इस बार खुराना की घर वापसी के पीछे पार्टी की मजबूरी कम और खुराना की मजबूरी ज्यादा दिखाई दे रही है। जिसका कारण स्वयं खुराना ही हैं।
दिल्ली के मुख्यमंत्री से लेकर राजस्थान के राज्यपाल तक का राजनैतिक सफर तय कर चुके मदन लाल खुराना एक जमाने में भाजपा के दिग्गज नेताओं की श्रेणी में शुमार थे। उनके समर्थकों का तो यहां तक भी मानना था कि दिल्ली में भाजपा को स्थापित करने तथा दिल्ली में भाजपा को सत्तासीन करने में केवल और केवल खुराना का ही हाथ रहा है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि दिल्ली की राजनीति में पंजाबी समुदाय के वे सर्वप्रिय नेता थे। लेकिन अपने बड़बोलेपन के कारण वह हमेशा अपने व पार्टी के लिए कोई न कोई संकट पैदा करते रहे। राजनैतिक सफलता के नशे में खुराना इस बात को भूल गए कि कोई भी नेता पार्टी से बड़ा नहीं होता। जिसका खामियाजा उन्हें पार्टी से बाहर होकर भुगतना पड़ा। कहावत है कि बुरे वタत में इन्सान का साया भी साथ छोड़ देता है, ठीक ऐसा ही खुराना जी के साथ भी हुआ। जो नेता उन्हें अपना आधार, गुरु मानते थे, वही नेता एक झटके में खुराना जी से किनारा कर गए। हालांकि पार्टी से बाहर होने के बाद खुराना जी ने पार्टी से ही बाहर हुई एक अन्य दिग्ग्ज नेता उमा भारती का हाथ थाम लिया और भारतीय जनशक्ति पार्टी का झंडा बुलंद करने की ठान ली।
गत निगम चुनाव में खुराना जी ने यह सोच कर बड़े जोर-शोर से भारतीय जनशक्ति पार्टी के झंडे तले अपने समर्थकों को निगम चुनाव में उतार दिया कि वह अपने नाम और व्यक्तित्व के सहारे अपने उम्मीदवारों को जितवा देंगे और भाजपा से अपने अपमान का बदला चुका लेंगे। लेकिन खुराना जी का दाव टांय-टांय फिस हो गया। भाजपा से बाहर होने के बाद निगम चुनाव केञ् परिणामों में खुराना जी को इस बात का एहसास करवा दिया कि उनमें कितना दम-खम बचा है। इसके बाद खुराना जी ने उमा भारती से भी पल्ला झाड़ लिया। तब से लेकर अब तक खुराना जी भाजपा में वापसी केञ् लिए जुगाड़ बनाते रहे, लेकिन उनके बड़बोलेपन व उनके विरोधियों के विरोध के चलते उनकी वापसी संभव नहीं हो पाई। लेकिन अब चूंकि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और साहिब सिंह वर्मा के आकस्मिक निधन के बाद भाजपा को भी एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो दिल्ली की जनता के लिए जाना पहचाना हो। भाजपा की इसी सोच ने खुराना की वापसी का मार्ग प्रसस्त कर दिया। लेकिन यह बात सत्य है कि खुराना की भाजपा में भले ही वापसी हो गई हो मगर खुराना ने अब वह दम खम नहीं बचा है जिसके लिए वे जाने जाते थे। राजनैतिक विशेषज्ञों का कहना है कि खुराना जी जंगल का शेर बन कर पार्टी से बाहर गए थे और सर्कस का शेर बन कर पार्टी में वापिस लौटे।