अपराधों की राजधानी (अंक 38)
Apr 28th, 2008 by admin
दिल्ली फिर से अपराध की राजधानी बनती जा रही है। आए दिन होने वाले अपराध हमें इस बात का अहसास दिलाते हैं कि हम देश की राजधानी में नहीं किसी गांव में रहते हैं। लोग इन दिनों अपने-अपने इलाकों में रात-रात भर जागकर पहरा देते हैं, चोर भगाते हैं और पुलिस चैन की नींद सोती है। लड़कियों के साथ छेड़खानी, उनके साथ झपटमारी तो इस शहर के लिए आम बात है। हर गली, मोहल्ला, चौराहा किसी भी जगह आप सुरक्षित नहीं हैं। चेन स्नेचरों ने तो दहशत पैदा कर दी है। आलम यह है कि लोग पुलिस को इस प्रकार की वारदात की सूचना तक नहीं देते।
उनका कहना होता है कि पुलिस को बुलाने से कोई फायदा नहीं है। पुलिस आती है तो अपराधियों को ढूंढने के बजाए उन्हें परेशान करती है। वारदात की शिकार अगर महिला है तो पुलिस उल्टा उससे ही अनाप-शनाप सवाल करने लगती है। पुलिस इस प्रकार का रवैया जानबूझ कर अक्तियार करती है ताकि उसके खाते में कम से कम केस दर्ज हों। रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर स्नेचिंग बाइक पर सवार लड़के करते हैं। एक जैसे वाहनों की सड़क पर भरमार होती है इसलिए इन स्नेचरों को भागने में आसानी होती है। रेड लाइट पर पैदल लड़के इस प्रकार की वारदात को अंजाम दे रहे हैं। हत्या और डकैती तो और भी आम है। हत्यारे आराम से हत्या करते हैं और चले जाते हैं, पुलिस देखती रहती है। कुछ दिनों बाद पुलिस किसी को पकड़ कर लाती भी है तो उसकी बातों को सुनकर सच्चाई का अहसास नहीं होता। दो दिनों तक मामला गर्म रहता है, अखबरों में छपता है। बाद में पुलिस अपनी रिपोर्ट अदालत में सौंपती है और उसमें क्या कहती है यह कोई नहीं जानता। कुछ दिनों बाद अभियुक्त की जमानत होती है बाद में वह बरी हो जाता है। अब हर केस के पीछे लगना भी संभव नहीं है और जिस केसों पर मीडिया का ध्यान नहीं जाता उस मामले में पुलिस की पूरी मनमानी चलती है। पुलिस कहती है कि लोग सामने नहीं आते। अगर किसी ने एफआईआर लिखायी और अभियुक्त पकड़ा भी गया तो उसकी शिनाख्त करने कोई भी महिला नहीं पहुंचती। 10-20 हजार रुपये की चेन के लिए महिलाएं कोर्ट जाना भी मुनासिब नहीं समझती। ऐसे में वारदात बढ़ेंगी ही, कम नहीं होंगी।