कांग्रेस का हाथ महंगाई के साथ (अंक 46)
Jul 15th, 2008 by admin
तारीख 22 मई 2004 वह दिन है जिस दिन कांग्रेस के नेतृत्व में संपरंग सरकार ने केन्द्र में सरकार का गठन किया था। अपने चार साल एक महीने के कार्यकाल में संप्रंग सरकार ने किसी और मामले में भले ही रिकॉर्ड कायम न किया हो, लेकिन महंगाई के मामले में उसने अवश्य पिछले 13 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया। जिस दिन कांग्रेस सरकार ने वाम मोर्चा के समर्थन से केन्द्र में सत्ता संभाली उस दिन देश में गेहूं का भाव 8 रुपये 75 पैसे प्रति किलो तथा आटे का भाव 11 रुपये प्रतिकिलो था। इसी तरह मैंदे का भाव 7 रुपये 40 पैसे, साबुत उड़द का भाव 20 रुपये 50 पैसे, मूंग का भाव 22 रुपये, चने का भाव 14 रुपये 20 पैसे, बेसन का भाव 20 रुपये 80 पैसे, राजमा का भाव 19 रुपये 25 पैसे, काबुली चने का भाव 28 रुपये, देसी घी का भाव 130 रुपये व बादाम गिरी का भाव 112 रुपये प्रतिकिलो था। लेकिन इन चार वर्षों के दौरान महंगाई का आकड़ा लगातार नई उंचाईयों को छूता रहा। नतीजतन आज गेहूं का भाव 16 रुपये, आटे का भाव 18 रुपये, मैदे का भाव 13 रुपये, सूजी का भाव 13 रुपये, साबुत उड़द का भाव 36 रुपये, मूंग का भाव 36 रुपये, चने का भाव 34 रुपये, बेसन का भाव 34 रुपये, राजमा का भाव 36 रुपये, काबुली चने का भाव 40 रुपये, देसी घी का भाव 180 रुपये और बादाम गिरी का भाव 400 रुपये प्रतिकिलो ग्राम तक पहुंच गया है।
खाद्यानों के दामों में हुई बेतहाशा वृद्घि ने गरीब से लेकर अमीर तक हर आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। महंगाई का यह आलम तो तब है जब देश की बागडोर एक जाने-माने अर्थशास्त्री के हाथों में है। कांग्रेस का हमेशा से एक ही नारा रहा है ‘कांग्रेस का हाथ-गरीबों के साथ’। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह नारा अब ‘कांग्रेस का हाथ-महंगाई के साथ’ ज्यादा सच्चा लगने लगा है।
महंगाई एक ऐसा मुद्दा है जिसमें एक से एक अच्छा कार्य करने वाली सरकारों की बलि ले ली है। वर्ष 1998 में दिल्ली के विधानसभा चुनाव में जनता ने सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी को इसीलिए कुर्सी से उठा कर नीचे पटक दिया था, क्योंकि उस समय आलू-प्याज के दामों में बेतहाशा वृद्घि हो गई थी। हालांकि आलू-प्याज को छोड़ कर शेष खाद्यानों में महंगाई का ज्यादा असर दिखाई नहीं दे रहा था। जब केवल आलू-प्याज ही किसी सरकार को उखाड़ फैंक सकते हैं तो सभी खाद्यानों में आई भारी तेजी वर्तमान सरकार का क्या हश्र करेगी, इस बात का अंदाजा संप्रंग सरकार को भी हो गया होगा। यह बात सही है कि महंगाई केवल संप्रंग सरकार की ही देन नहीं है लेकिन यह भी सत्य है कि समय रहते सरकार ने इसके कारणों पर गंभीरता से चिंतन किया होता और महंगाई पर अंकुश लगाने के ठोस प्रयास किये होते तो शायद महंगाई की दर इतनी अधिक न बढ़ती। इसके अलावा लोहा, सीमेंट, पेट्रोलियम पदार्थ, सोना, चांदी के दामों में भी भारी तेजी आई है, जिसका असर समाज के हर वर्ग व हर काम-धंधे पर पड़ा है। ऐसे में परमाणु करार को लेकर वाम मोर्चा द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी ने कांग्रेस की परेशानियों में और इजाफा कर दिया है। यदि वाम दल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेते हैं तो इस साल के अंत तक कई राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ लोकसभा चुनाव होना भी तय है। अब सवाल यह उठता है कि चार वर्षों से जनता को महंगाई की गर्मी से झुलसा रही कांग्रेस क्या चुनाव के समय स्वयं जनता की ‘फुंकार’ से बच पाएगी?