चरित्रहीन होती राजनीति (अंक 51)
Sep 2nd, 2008 by admin
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने संसद में भले ही बहुमत की लड़ाई जीत ली हो, लेकिन विश्वास मत के दौरान दो दिनों तक जो कुछ भी घटा उसने भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार कर दिया है। एक जमाना था जब हमारे देश की बागडोर पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान नेताओं के हाथ में थी। उस समय की राजनीति भी उनकी तरह निर्मल व स्वच्छ थी। उस समय का कोई भी नेता अपने उसूलों व चरित्र से समझौता नहीं करता था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश के दूसरे प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी हैं। जिन्होंने रेल मंत्री के रूप में कार्य करते हुए अपने आदर्शों व चरित्र का एक अनूठा उदाहरण पेश किया। शास्त्री जी के समय में एक रेल दुर्घटना की घटना ने उन्हें इतना व्यथित किया कि उन्होंने इस दुर्घटना की नैतिक जिममेदारी अपने ऊपर लेते हुए तुरंत अपने पद से त्याग पत्र दे दिया।
आजादी के बाद 61 वर्षों के सफर में गत तीन दशकों से राजनीति के पतन का जो सिलसिला शुरु हुआ था वह आज भी लगातार जारी है। कल तक जो लोग समाज व देश के लिए महज एक गुंडे या असमाजिक तत्व के रूप में जाने जाते थे वे लोग आज संसद में बैठ कर माननीय व सミमाननीय हो गए हैं और देश का भविष्य तय करते हैं। साथ के लालच ने आज के नेताओं को इस कदर नंगा कर दिया है कि वे अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जाने में कोई संकोच नहीं करते हैं।
सपा के नेता व धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीटने वाले अमर सिंह जिस कांगे्रस पार्टी व प्रधानमंत्री को आज देश का सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं उन्हीं अमर सिंह ने एक समय मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को 84 के दंगों का कातिल करार दिया था। इतना ही नहीं इन्हीं अमर सिंह ने लालू यादव को चारा खाने वाला और सोनिया को तेल पीने वाली बना दिया था। लेकिन साथ के लालच में आज वही अमर सिंह व उनकी पार्टी यूपीए की गोद में बैठ गई है। गुरु जी के नाम से मशहूर शिबु सोरेन को हत्या के आरोप में सजा हो जाने के कारण मंत्रीमण्डल से बाहर होना पड़ा था, हालांकि उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। बावजूद इसके उन्हें दागी करार देते हुए मंत्रीमण्डल में वापस नहीं लिया। लेकिन उसी मनमोहन सरकार ने अपनी कुर्सि बचाने के चककर में न केवल गुरु जी को दोबारा केन्द्र में मंत्री बनाना स्वीकार कर लिया बल्कि उनके एक और नेता को भी राज्यमंत्री बनाने की हामी भर दी। इस सारे प्रकरण में सबसे ज्यादा शर्मनाक बात यह रही कि विभिन्न पार्टियों के जो सांसद किसी न किसी बड़े अपराध की सजा काट रहे हैं, जिसके चलते उनकी पार्टियों ने भी उन सांसदों से किनारा कर लिया था लेकिन बहुमत साबित करने के लिए पूरी सरकार इन दागी सांसदों के आगे नतमस्तक हो गई। यह राजनीति के गिरते चरित्र का ही परिणाम है कि विरोधी पार्टियों के कुछ सांसदों ने भी अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने आपको बिकाऊ माल बना डाला। संसद भवन में तीन सांसदों द्वारा एक करोड़ रुपया ले जाकर यह आरोप लगाना कि सरकार के लोगों में उन्हें खरीदने की कोशिश की, इस बात की ओर इशारा करता है कि आज एक सांसद की हैसियत किसी वैश्या से अधिक नहीं रह गई है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि उसका सौदा करने के लिए कौन कितनी अधिक बोली लगाता है।
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में राजनीति के गिरते चरित्र के लिए यह नेता नहीं बल्कि देश की जनता जिममेदार है। जिसने ऐसे भ्रस्त्त और चरित्रहीन लोगों को अपना नेता चुना। देश की जनता ने यदि अपने वोट रूपि हथियार से ऐसे नेताओं व पार्टीयों को सबक नहीं सिखाया तो वह दिन दूर नहीं जब देश के यही नेता देश के साथ-साथ हमारी बहन-बेटियों की भी बोली लगाने में कोई संकोच नहीं करेंगे।