यह आग कब बुझेगी? (वर्ष-6, अंक 2)
Sep 2nd, 2008 by admin
इसे देश चलाने वाली सरकार की नाकामी कहें या फिर विभिन्न राजनीतिक दलों की महत्वकांक्षा कि आज देश के दुश्मनों पर गोली चलाने वाले जवानों को अपने ही देशवासियों पर गोली चलानी पड़ रही है। आज पूरा जममू-कश्मीर जल रहा है, लेकिन सभी राजनीतिक दल जममू-कश्मीर में लगी आग बुझाने का प्रयास करने की बजाय उसी आग पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में मश्गूल हैं। भूमि के एक छोटे से टुकड़े ने एक बार फिर दो समुदायों के बीच नफरत का बीज बो दिया है। कश्मीर के कुछ हिस्से को लेकर भले ही भारत-पाक के बीच आज भी विवाद बना हुआ हो, लेकिन जो हिस्सा भारत के कホजे में है निःसंदेह वह भारत का एक अभिन्न अंग है।
जममू-कश्मीर में भले ही धारा 370 लागू हो लेकिन यह प्रदेश किसी एक जमात अथवा समुदाय की जागीर नहीं है। गत दिनों संसद में विश्वास प्रस्ताव के दौरान बोलते हुए नेशनल कांफेस के नेता उमर अホदुल्ला ने जिस बेशर्मी के साथ चीख-चीख कर कहा ‘यह जमीन हमारी है और कश्मीर का मुसलमान अपनी जमीन के लिए जान भी दे सकता है। हर वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए जो लाखो हिन्दू यहां पहुंचते हैं और दर्शन करते हैं, यह सभी यहां के मुसलमान के बिना कतई संभव नहीं है’। यह वाकय बोलते हुए उनके चेहरे पर जिस प्रकार के भाव उभर रहे थे वह निश्चित रूप से किसी एक वर्ग के खिलाफ जहर उगलते दिखाई दे रहे थे। जमीन और हक की इसी लड़ाई ने पाकिस्तान की नींव रखी और आज देश के हितैषी बनने वाले यह तथाकथित नेता कश्मीर में एक और पाकिस्तान बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
वास्तविकता तो यह है कि अमरनाथ श्राईन बोर्ड को अस्थायी रूप से आवंटित की जाने वाली 100 एकड़ भूमि को लेकर वहां के स्थानीय मुसलमान भाईयों को कोई एतराज नहीं है। यदि एतराज है तो उन राजनीतिक दलों को जो मुसलमानों के सच्चे हितैषी बनने का ढोंग कर हिन्दू-मुस्लिम एकता में दरार डालना चाहते हैं। यदि शीघ्र ही सभी राजनीतिक दलों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर जममू-कश्मीर में लगी आग को शांत करने की कोशिश नहीं की तो आने वाले समय में देश के अन्य भागों में भी जममू-कश्मीर जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है।