असली रावण को मारो (वर्ष-6, अंक 9)
Oct 13th, 2008 by admin
अच्छाई पर बुराई की जीत के रुप में हम हर साल दशहरे को मनाते हैं। रावण, कुंभकर्ण व अन्य राक्षसों के पुतले को जलाते हैं। पटाखे फोड़ते हैं। लाखों रुपये खर्च कर मेले का आयोजन होता है। दस दिनों तक रामलीला का मंचन होता है। शाम से देर रात तक हर गली-नुककड़ पर रामलीला के मंच व उसके दर्शक नजर आ जाते हैं। दशमी वाले दिन तो हर बच्चे को उसका बाप कहता है कि चलो बेटा रावण दहन देखकर आएं। दशहरे के मैदान में रावण जलता है। बच्चे ताली बजाते हैं। पिता पूछता है, चाट-पकौड़ी खाओगे। बेटा अगर हां में जवाब देता है तो ठीक नहीं तो वह अपने पिता के साथ घर चला आता है।
कल होकर अपने दोस्तों के बीच रावण दहन की चर्चा करता है। एक दोस्त दूसरे को बोलता है, मैंने तो बहुत बड़ा रावण देखा था। दूसरा बोलता है, मैंने तो उससे भी बड़ा रावण देखा था वो तो बहुत देर तक जल रहा था। आवाज भी बहुत आ रही थी। बच्चे भले ही नादानी में इन बातों को बोल रहे थे। लेकिन सही पूछें तो अब रावणों का कद हर साल बढ़ रहा है।
हर गली-चौराहों पर रावणों की भरमार हो गई है। कोई भी ऐसी गली नहीं जहां दो चार रावण न हों। उन्हें कौन जलाएगा? उनकी बुराइयों को कौन खत्म करेगा? इन बच्चों को कौन बताएगा कि जिस रावण के पुतले को जलते हुए देखने के लिये वे जाते हैं, उसे तो कब का मार दिया गया है। यह बात तो त्रेता युग की है। हमें तो इस युग के रावण से लड़ना है। उनकी लंका में आग लगाना है। उनकी बढ़ती हुई संक्या को रोकना है। वरना वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश में रावणों की संक्या बहुत अधिक हो जाएगी और राम सरीखे लोगों के पुतले जलाए जाएंगे।
इस बात को याद रखना चाहिए कि बुराई हम पर जल्दी हावी होती है। रावण के अवगुणों को अपनाने में हमें समय नहीं लगेगा लेकिन राम जैसा बनने में काफी वक्त लग सकता है। इसके लिए तपस्या की आवश्यकता होगी। आने वाली पीढ़ी को भी राम व रावण में फर्क बताना हमारा कर्तव्य है। इन बच्चों को सिर्फ रावण को जलते हुए दिखाने से ही हमारा काम समाप्त नहीं हो जाता है। हमें यह भी बताना होगा कि राम व रावण में क्या फर्क है और आने वाले दिनों में वे अपने ही गली-मोहल्ले के रावणों से कैसे लड़ेंगे। जिस दिन हर गली के रावणों पर हम विजय प्राप्त कर लेंगे हमारे देश के लिए असली विजयदशमी वही होगी। यह सब तो सिर्फ दिल बहलाने के लिए आयोजित हो रहा है। रावणों पर अपनी विजय पताका लहराने के लिए हमें खुद भी तैयार रहना होगा और आने वाले भविष्य को भी इसके लिए तैयार करना होगा तभी हम सचमुच विजयदशमी के अर्थ को साकार कर सकेंगे।