एक और काला शनिवार (वर्ष-6, अंक 8)
Oct 13th, 2008 by admin
शनिवार को फिर बम फट गया। शुक्र है इस बार यह सीरियल बलास्ट का रूप नहीं लिया। महरौली में यह वारदात हुई जिसमें कई लोगों के मरने एवं दर्जन भर से अधिक लोगों के घायल होने की खबर है। ठीक पंद्रह दिन पहले शनिवार को ही दिल्ली में सीरियल बलास्ट हुआ था और पूरी दिल्ली दहल उठी थी, दिल्ली में बम का धुआं अभी तैर ही रहा था कि गत शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के मैरियट होटल में विस्फोट हो गया।
29 अकटूबर 2005 को दीपावली से ठीक दो दिन पहले यानी कि धनतेरस को दिल्ली में सीरियल बलास्ट हुआ था और वह काला दिन भी शनिवार ही था। तो क्या हम यह मान लेंगे कि भारत या दिल्ली के ऊपर शनि की काली छाया मंडरा रही है। क्या शनि की कुद्रष्टि से बम विस्फोट हो रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है। असल में बम विस्फोट का यह सिलसिला शनि नहीं आतंकवाद की काली छाया का नतीजा है, यह महज एक संयोग है। हां, इस बात से कोई गुरेज नहीं कि शनिवार की शाम को दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की सड़कों पर अधिक भीड़ होती है। लोग मौज-मस्ती के मूड में होते हैं, इसलिए आतंकियों को लगता है कि इस दिन विस्फोट करने से अधिक से अधिक लोगों को निशाना बनाया जा सकता है।
लेकिन विस्फोट के लिए सिर्फ और सिर्फ देश में पनपता आतंकवाद ही जिममेदार है। एक ऐसा आतंकवाद जिसका न तो कोई ईमान होता है और न ही कोई धर्म। यह अलग बात है कि आतंकवाद को आज भारत में एक धर्म विशेष से जोड़ा जा रहा है जो कहीं से न्यायपूर्ण नहीं है। हालांकि उस धर्म के कुछ लोग कहीं न कहीं आतंकवाद की भर्त्सना करने से पहले आतंकवादियों केञ् खिलाफ हुई कार्रवाई की भर्त्सना भी करते हैं जो देश की अखंडता के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इंडियन मुजाहिदीन के जन्म केञ् लिए लोग अतीत की गलतियों को जिममेदार मान रहे हैं लेकिन किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि आतंक के रास्ते पर चलने वाले उस इंडियन मुजाहिदीन के सदस्यों को उस अतीत की गलती से कोई मतलब नहीं है, वे तो रास्ते से भटके हुए नौजवान है जो मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार हैं और लश्करे तयैबा, हूजी, अलकायदा और दाऊद जैसे संगठनों का नाम उन्हें अपनी ओर खींचता है।
भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। भारत के बंटवारे केञ् दौरान भी दंगे हुए थे और धर्म के नाम पर उससे बड़ी लड़ाई कभी नहीं हुई थी। लेकिन उसके बाद तो किसी प्रकार के आतंकवाद का जन्म नहीं हुआ। लोग उसे हादसा समझकर भूल गए। उस दंगे पर कई किताबें लिखी गईं। मजहब के नाम पर आपसी मनमुटाव हुआ लेकिन वकत के साथ हम एक हो गए। हमारा जो संस्कार है वह सहिष्णु है। हमारे देश में दुख के समय में मदद के लिए उठने वाले हाथ यह कभी नहीं देखते कि वह किस मजहब का है। अतीत में भी जो गलतियां हुई हैं उसके लिए महज चंद लोग ही जिममेदार हैं अधिकतर हाथ तो मदद या गले लगने के लिए उठे हैं।
असल में यह आतंकवाद आयात हो रहा है। यह हमारा अपना उत्पाद नहीं है। तभी तो हर विस्फोट के बाद कहीं न कहीं से उसमें विदेशी बू आती है। जड़ कहीं और है। कभी आपने देखा है कि विस्फोट करने वाले की उम्र पचास साल की या पैतालीस साल की हो। ऐसा इसलिए नहीं कि इस उम्र के लोग परिपकव हो जाते हैं, उन्हें विदेशी अपने झांसे में नहीं ले पाते हैं। इसलिए आतंकवाद की लड़ाई किसी मजहब विशेष की लड़ाई नहीं है इसके खात्मे के लिए हमें इसको जड़ से खत्म करना होगा। यह तभी संभव है जब हम आतंकवाद की काली परछाई को अपने-अपने घरों से दूर रखने की शपथ लेंगे। जब कोई धमाके के सिलसिले में पकड़ा जाता है तो उसके घरवालों को इस बात का भरोसा नहीं होता है, उन्हें लगता है कि मजहब के नाम पर पुलिस और प्रशासन उनके साथ सौतेला बर्ताव कर रहा है। जबकि ऐसा होता नहीं है। हमें इन्हीं कारणों को खोजना होगा कि ऐसी क्या मजबूरी थी जो घर के चिराग आतंकवाद को रोशन करने निकल पड़े।