संकट में भारत (वर्ष-6, अंक 10)
Oct 13th, 2008 by admin
अमेरिका डूब गया, अब भारत की बारी है। दशहरा एवं दीपावली की मस्ती में डूबे देशवासियों को अब यह अहसास हो जाना चाहिए कि देश मंदी की चपेट में आ चुका है। शेयर बाजार से लेकर प्रॉपर्टी बाजार या फिर औद्योगिक बाजार, सबके सब धड़ाम हो चुकेञ् हैं। इन्हें तो इतनी चोट लगी है कि साल दो साल तक तो ये बिस्तर से उठने के काबिल भी नहीं रहेंगे। हालत इतनी नाजुक हो चुकी है कि बाजार को भरोसा दिलाने के लिए वित्त मंत्री को पिछले तीन दिनों से रोजना बयान जारी करना पड़ रहा है। दो महीने पहले रिजर्व बैंक ने जिस सीआरआर को बढ़ा दिया था उसमें कटौती कर दी गई है। नकदी आरक्षित अनुपात को सीआरआर कहते हैं और रिजर्व बैंक जो सीआरआर तय करती है उतनी मात्रा में हर बैंक को नकदी रिजर्व बैंक में जमा करनी पड़ती है। दो माह पहले महंगाई पर काबू पाने के लिए रिजर्व बैंक ने सीआरआर को बढ़ा कर 9 फीसदी कर दिया था लेकिन इस एक सप्ताह में बाजार में नकदी उपलबध कराने के उद्देश्य से इसमें 1.5 फीसदी की कटौती कर दी गई। आने वाले समय में इसमें और कटौती की संभावना है। वित्ता मंत्री पिछले तीन दिनों से यह कह रहे हैं कि लोगों का पैसा बैंक में सुरक्षित है। घबराने की कोई बात नहीं है। आखिर कौन सी ऐसी आफत आ गई है कि सरकार को यह बयान देना पड़ रहा है। असल में अमेरिका का सबसे बड़ा निवेशक बैंक लीमैन ब्रदर्स दिवालिया हो गया और मेरिन लींच बिक गया। लीमैन एवं मेरिन लींच में हमारे देश के सार्वजनिक एवं निजी दोनों ही क्षेत्रों के प्रमुख बैंकों ने पैसा लगाया हुआ था।
ऐसे में इस बात की आशंका जाहिर होना कि भारतीय बैंकों की हालत ठीक नहीं है, लाजिमी है। यूरोप के देशों की स्थिति भी उतनी ही खराब है। अमेरिका एवं यूरोप के निवेशकों द्वारा हाथ खींचने के कारण भारत में डॉलर की कमी हो गई जिससे हमारे रुपये का मूल्य रोजाना गिर रहा है। दो महीने पहले एक डॉलर का मूल्य 40 रुपये था जो अब 50 रुपये हो गया। ऐसे में आयात करने में हमारी लागत काफी बढ़ गई। जिससे हर आयातित चीज अब महंगी हो जाएगी। औद्योगिक उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले नौ फीसदी की गिरावट आ चुकी है। पिछले साल अगस्त महीने में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 10.3 फीसदी पर था जो इस साल की समान अविधि में 1.3 रह गया है। जाहिर है कि उद्यमी कितने परेशान हैं। किसी भी चीज का उत्पादन तभी गिरता है जब उसकी मांग में कमी होती है या फिर लागत बहुत अधिक हो जाती है। औद्योगिक उत्पादन में जो कमी आई है उसके लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार की मांग में आई गिरावट एक प्रमुख कारण है और जब उत्पादन में कमी आती है तो रोजगार का सृजन कम होता है और जब रोजगार कम होता है तो नई मांग नहीं निकलती है। फिलहाल देश इसी दुष्चक्र में फन्स चुका है। सरकार देश को इसी दुष्चक्र से उबारने के लिए बाजार में अधिक से अधिक नकदी का प्रवाह करना चाहती है ताकि उत्पादन की क्रिय जारी रह सके। लेकिन यह संकट इतनी आसानी से जाने वाला भी नहीं है। अमेरिका एंव यूरोप में संकट के कारण देश में आधे से अधिक बीपीओ (कॉल सेंटर) बंद हो चुके हैं जिससे हजारों लोगों की नौकरी जा चुकी है या जाने वाली है। दूसरी बात यह है कि बैंक की बयाज दर इतनी अधिक है कि कारोबारी नया निवेश करना नहीं चाहेंगे और निवेश में कमी से उत्पादन बढ़ाना संभव नहीं है।
प्रॉपर्टी बाजार की हालत तो सबसे अधिक खराब नजर आ रही है। बाजार में खरीदारों की एकाएक कमी हो गई है। बाजार तभी तक बूम कर रहा था जब तक नए खरीदार आ रहे थे। लोन की दिककत के साथ नौकरी एवं वेतन बढ़ात्तरी के संकट के कारण कोई भी व्यक्ति प्रॉपर्टी खरीदना नहीं चाहेगा। ऐसे में प्रॉपर्टी के कारोबार से जुड़े लोगों को घाटा होना निश्चित है। प्रॉपर्टी व्यवसायी बहुत दिनों तक अपनी प्रापर्टी को नहीं रख सकते हैं कयोंकि उन्हें भी बैंकों को बयाज अदा करना पड़ता है और बेचने जाने पर खरीदारों की कमी के कारण उन्हें घाटे में ही सोदा करना पड़ेगा। शेयर बाजार पहले ही लुढ़क चुका है। वहां के निवेशकों की हालत इतनी पतली हो चुकी है कि वे किसी अन्य क्षेत्र में पैसा लगाने की सोच भी नहीं सकते हैं। इधर महंगाई भी कम होती नहीं दिख रही है। सबजी, फल से लेकर दाल तक की कीमत रोजाना बढ़ रही है। कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था इस समय चारों तरफ से घिर चुकी है। सरकार चाहे लाख दावा कर ले कि सब ठीक चल रहा है पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है। ऐसे में संभल-संभल कर चलने में ही बुद्घिमानी है।