तमसो मा ज्योतिर्गमय (वर्ष-6, अंक 12)
Oct 31st, 2008 by admin
दीपावली आ गई है। लेकिन घरों में पावर कट जारी है। सड़कों पर भी अंधेरा ही अंधेरा है और दिल तो पहले से ही काला हुआ पड़ा है। यहां तो रोशनी के लिए कोई जगह ही नहीं है। अगर किसी के दिल में दीये जल भी रहे हैं तो लोग उसे बुझाने पर तुले हैं। यानी कि हम सब भीतर से अंधकार में जी रहे हैं। दीपावली को पूरी दिल्ली रोशनी से नहा जाएगी। हर जगह बम फतेगे, पटाखे बजेंगे, कैंडल लाइट से लेकर दूधिया बल्ब अपनी जगमगाती रोशनी के आगोश में दिल्ली को समा लेंगे। ऐसा लगेगा जैसे कितना खुशहाल है यह शहर। कहीं किसी बात की कोई दिक्कत ही नहीं। लेकिन असलियत कुछ और ही है। यहां तो हर आदमी एक-दूसरे की बात्ति गुल करने पर लगा है। उन्हें लगता है कि अगर वे सामने वाले की बात्ति बुझा देंगे तो उनके यहां ज्यादा रोशनी हो जाएगी। उनके घर में ज्यादा खुशी आ जाएगी। पर ऐसा करने से उनके यहां कृतिम रोशनी ज्यादा हो जाती है लेकिन उनके भीतर की रोशनी बुझती जाती है और वे प्रकाश में रहते हुए भी कुछ देख नहीं पाते हैं। यानी कि जगमगाती रोशनी में भी वे अंधे के माफिक हो जाते हैं।
इन दिनों इसी प्रकार के अंधों की भरमार हो गई है। ऐसे लोगों को यह समझना होगा कि मर्यादा पुरुषात्तम प्रभु श्रीराम जी जब रावण (बुराई) को मार कर अयोध्या लौटे थे तो उनके स्वागत में दीये जलाए गए थे, खुशियां मनाई गई थीं और तब से दीपावली मनाने का सिलसिला जारी है। रामजी ने ऐसा काम किया था जिससे सारी सृष्टि को खुशी मिली थी। उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को मार गिराया था जिसने समस्त लोगों के जीवन में अंधकार कर रखा था। रावण के मरते ही अंधकारकालीन एक युग का अंत हुआ था इसलिए दीपावली मनाई गई थी। अब फिर से इस बात की जरूरत आ पड़ी है कि हम रावण का नाश करें।
राम केयुग में एक रावण था लेकिन इस युग में तो हर आदमी के भीतर रावण छिपा है। हमारे आपके दिल में भी। असली दीवाली तो तभी मनाई जा सकती है जब हम अपने अंदर के अंधकार को समाप्त कर लें और दिल के अंदर ज्योत जलाएं। ऐसा तभी संभव है जब हमारे दिल में एक-दूसरे के प्रति उपजने वाला द्वेष समाप्त हो जाएगा। जो आसान काम नहीं है। इसके लिए तप की जरूरत है। तप का मतलब यह नहीं है कि हम पहाड़ या गुफा में जाकर तपस्या करें। हमें करना सिर्फ यही है कि हम दूसरे की बात्ति गुल करने की फिराक में न रहें। हमारी नीयत ऐसी होनी चाहिए कि अगर किसी केञ् घर की रोशनी चली जाए तो हम उसके घर में भी रोशनी करने को तत्पर रहें तभी तो असली दीया जलेगा। इस दीवाली पर हमें इसी बात की शपथ लेनी चाहिए कि हम दिखावे की दीपावली की जगह अंदर की दीपावली मनाएंगे। किया हम ऐसे युग की शुरुआत नहीं कर सकते हैं जहां हर घर में रोशनी हो, हर घर खुशहाल हो, हर दिल जगमग हो। इस साल से हम ऐसे ही दीये जलाकर एक नए युग की शुरुआत करेंगे।