हर देश की राष्ट्र भाषा होती है और उस देश की सरकार व जनता अपनी राष्ट्र भाषा सममान करती है। लेकिन इसे हिन्दुस्तान का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि संविधान में भले ही हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया गया हो लेकिन इसके सममान को लेकर न तो आज तक कोई भी केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और न ही यहां के नेता गंभीर रहे हों। हाल ही में सपा सांसद एवं अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री जया बच्चन ने मुम्बई के एक समारोह में हिन्दी में भाषण क्या दे दिया कि वहां की राजनीति में तूफान खड़ा हो गया।
यह तूफान किसी और ने नहीं बल्कि अपने आपको सबसे ज्यादा राष्ट्र भक्त बताने वाली महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने खड़ा किया। वैसे तो महाराष्ट्र में अपने वजूद को बचाए रखने के लिए मनसे सुप्रिमो राज ठाकरे आए दिन कोई न कोई ऐसी बयानबाजी करते रहते हैं जिससे मुम्बई व महाराष्ट्र में तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है।
इस मामले में सबसे ज्यादा गंभीर व चिंता की बात यह है कि एक हिन्दुस्तानी अपने ही देश में अपनी राष्ट्र भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकता। यह बात अलग है कि हर प्रदेश की अपनी कोई न कोई मातृ भाषा है और वहां का हर नागरिक उस राज्य की मातृ भाषा का मान-सम्मान करता है। राज ठाकरे यदि महाराष्ट्र में रहने वाले लोगों को मराठी भाषा का इस्तेमाल करने पर जोर देते हैं तो किसी को भी इस बात पर एतराज नहीं होना चाहिए क्योकि देश के अधिकांश राज्यों में अपनी मातृ भाषा को न केवल पाठ्य क्रम में आवश्यक किया गया है बल्कि बोलचाल में भी अधिक से अधिक मातृ भाषा का प्रयोग करने की चेष्टा की गई है। इस मामले में यदि राज ठाकरे यह कह कर जया का विरोध कर रहे हैं कि उन्होंने यूपी को अपना घर व हिन्दी को मातृ भाषा बताया, तो भी यह विरोध किसी भी तरीके से उचित नहीं माना जा सकता।
कयोंकि हिन्दी यूपी की मातृ भाषा बाद में है पहले भारत की राष्ट्र भाषा है। इसके अलावा किसी भी राज्य में भले ही वहां की मातृ भाषा का प्रयोग किया जाता हो, लेकिन राष्ट्र भाषा होने के कारण हिन्दी का प्रयोग करने में किसी भी राज्य की सरकार को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। राज ठाकरे ने यह सब बबाल भले ही मनसे को राजनीतिक संजीवनी देने के लिए खड़ा किया हो लेकिन इस सारे प्रकरण में केन्द्र सरकार की चुप्पी बेहद शर्मनाक है।
जिस राष्ट्र भाषा को बोलने के बाद किसी व्यक्ति को सार्वजनिक माफी मांगनी पड़े ऐसी राष्ट्र भाषा का सम्मान कब तक और कितना रह पाएगा, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन यदि केन्द्र सरकार ने राष्ट्र भाषा हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में जीवित रखने के लिए गंभीरता से जन-जागरण अभियान नहीं चलाया तो आने वाले कुछ वर्षों में हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी अतीत का इतिहास बन कर रह जाएगी।
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बिहार में बाढ़ की विपदा कोई नई बात नहीं है। उत्तरी- बिहार में हर साल बाढ़ आती है और करोड़ों रुपये का नुकसान होता है। कोसी नदी का कहर भी कोई पहली बार नहीं बरपा है। करीब बीस साल पहले कोसी नदी की धार से बचने के लिए नेपाल सीमा पर बांध बनाया गया। पर इस बार कोसी की धार के आगे बूढ़े बांध की कुछ नहीं चली और बिहार के लगभग 11 जिलों में प्रलय जैसी स्थिति बन गई। रातों रात लोग बेघर हो गए, भिखमंगे हो गए। बिहार के छह जिलों में तो ऐसा लग रहा है जैसे यहां कभी कोई रहता ही नहीं था। यहां सिर्फ पानी ही पानी है। पहले से ही गरीबी में जी रहे बिहार वासियों को इस बाढ़ ने ऐसा डुबोया है कि उन्हें होश संभालने में कम से कम तीन साल लगेंगे। घर-द्वार, गाय-बैल न जाने क्या-क्या बाढ़ में बह गए।
भोले-भोले गांववासियों को यह पता तक नहीं चला कि कब बिहार की अभिशाप कोसी ने अपना रास्ता बदल लिया। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रशासन को भी इस बात की पूरी खबर नहीं लगी। असल में कोसी बांध की खबर कई सालों से नहीं ली गई। पानी का रिसाव शुरु हो चुका था लेकिन उस बांध तक जाने की जहमत बिहार सरकार के अधिकारियों ने नहीं उठायी। जब लोग डूबने लगे, मरने लगे तब जाकर उन्हें लगा कि यह तो प्रलय आ गया। राहत कार्य भी शुरु हुआ तो देर से। तब तक कई मां अपने बेटों से बिछड़ चुकी थीं, कई बच्चे अनाथ हो चुके थे तो कईयों की मांग उजड़ चुकी थी, बची थी तो सिर्फ उनके पेट की आग जो उन्हें भी जलाने को तैयार बैठी थी। लेकिन देर से ही सही राहत कार्यों ने लोगों को जिंदा रखा है।
प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रीय विपदा बताया और क् करोड़ रुपये देने की घोषणा भी की और न जाने किन-किन लोगों ने प्रधानमंत्री राहत कोष से लेकर मुखयमंत्री राहत कोष तक में पैसे देने की बात कही है। लेकिन सवाल है कि इस राहत के पहुंचने तक क्या वे बच पाएंगे। उन्हें तो फौरी राहत चाहिए थी जिसके लिए बिहार प्रशासन तैयार नहीं था। प्रशासन पिछले साल बाढ़ में किए गए अपने कार्यों को अपनी उपलホधि मानता है। उसे इस बात का इल्म था कि ऐसा भी हो सकता है, लेकिन इसकी तैयारी पहले से नहीं की गई। 30 लाख लोगों को राहत देना कोई आसान काम भी नहीं है। असली मदद वहां के स्थानीय लोग ही कर रहे हैं। शिविर लगाए गए हैं और हजारों लोग अपनी नई जिंदगी की उममीद में किसी तरीके से एक शाम मिलने वाली खिचड़ी खाकर अपना गुजर बसर कर रहे हैं। कई बच्चों ने तो इसी राहत शिविर में जन्म भी ले लिया है जिन्हें दूध की जगह बाढ़ का पानी पीना पड़ रहा है। सबसे बड़ी बात है कि राहत के लिए हाथ बढ़ाने में देश केञ् लोगों ने थोड़ी देरी जरूर की है। मुखयमंत्री नीतिश कुमार को भी प्रधानमंत्री से इसके लिए गुहार लगानी पड़ी।
किसी भी बड़े फिल्म स्टार या उद्योगपति ने प्रलयकारी बाढ़ की बात सुनने के बाद भी अपनी तरफ से मदद की कोई घोषणा नहीं की। नेता भी ईमानदारी से मदद करने की जगह बाढ़ पर अपनी राजनीति करते ज्यादा दिखे। सबको पता है जहां बाढ़ आती है वहां बीमारियां भी बहुत ज्यादा होती हैं और काबू नहीं पाने पर यह महामारी का रूप ले लेती हैं।
बिहार में डॉकटरों की कमी पहले से ही है। अगर दस प्रांतों से सौ-सौ डॉकटर इस दुख की घड़ी में वहां भेज दिए जाएं तो बहुत बड़ी मदद मिल सकती है। लेकिन ऐसा कियो किया जाएगा? हर प्रांत की सरकार यह देखती है वहां सरकार किस पार्टी की है। भाजपा समर्थित सरकार है तो अन्य प्रांत की भाजपा सरकार ही इस प्रकार की पहल करेगी। दिल्ली नगर निगम ने चिकित्सा सेवा के 100 लोगों के दल को बिहार रवाना किया है जिसमें 30 डॉकटर हैं। अब जरा दिल्ली में रह रहे बिहारियों की बात करें। दिल्ली में 40 लाख से अधिक बिहारीवासी हैं। इनमें से पांच लाख लोग तो ऐसे जरूर हैं जो बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए पांच रुपये दे सकते हैं। ऐसे में यह रकम 25 लाख हो जाती है। लेकिन इस प्रकार की कोई पहल नहीं की गई। छठ पूजा के नाम पर बिहार के लोग मुमबई से लेकर दिल्ली तक रात में आर्केस्तरा करवाते हैं, नौटंकी करवाते हैं और लाखों रुपये फान्द देते हैं, लेकिन बिहार के बेबस लोगों के लिए इन लोगों ने कोई पहल नहीं की। दिल्ली में तथाकथित बिहारी नेता ने बड़े पैमाने पर ऐसा कियों नहीं किया? गरीबी झेल रहा बिहार भी भारत का ही अंग है और देश का विकास भी बिहार के विकास से जुड़ा है। बिहार को सोमालिया बनाकर हम भारत को पेरिस नहीं बना सकते हैं। परिवार में कम कमाने वाले सदस्य के बीमार पड़ने पर अमीर भाई के छोड़ देने पर उस परिवार का एक सदस्य चला जाता है, परिवार छोटा हो जाता है, एक सदस्य का योगदान खत्म हो जाता है। भारत की संस्कृति सबको साथ लेकर चलने की है और हमें अकेले नहीं बांट कर खाना सिखाया जाता है। जो भी हो विपाति की इस घड़ी में बिहार को सहारे की जरूरत है। देश के सक्षम हर हाथ को इस घड़ी में मदद के लिए आगे आने चाहिए। यह भी नहीं देखा जाना चाहिए कि बिहार में सरकार किसकी है। सरकार वहां किसी पार्टी की हो मुसीबत में फन्से लोगों की एक ही पार्टी होती है एक ही मजहब होता है और वह है बेबसी। उनकी आंखों में बस मदद की गुहार दिखती है। भारत इतना विशाल देश है और मुसीबत में हम तमाम दीवारों को तोड़ते हुए एक दूसरे के काम आए हैं और यही हमारी पहचान है, इसी से हम आज एक हैं। आओ हम सब मिल कर प्रतिज्ञा करें कि इस बार भी हम बिहार को डूबने के लिए नहीं छोड़ेंगे।
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दिल्लीवासी आजकल सड़कों पर जाम की समस्या से खासे त्रस्त हैं। वैसे तो दिल्ली के विभिन्न मार्गों पर ट्रेफिक जाम रहना दिल्ली की नियति बन चुका है लेकिन बरसातों के कारण ट्रेफिक जाम की समस्या और भी गंभीर हो गई है। हालत यह है कि मात्र 10 से 20 किलोमीटर का रास्ता तय करने के लिए वाहन चालकों को दो से तीन घंटे तक सड़कों पर रेंगना पड़ता है। दिल्ली सरकार द्वारा मुखय मार्गों को सिग्नल फिरि बनाने के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं और विभिन्न मुखय चौराहों पर अंडर पास या ओवर ब्रिज का निर्माण भी करवाया जा रहा है। बावजूद इसके जाम की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। वैसे तो दिल्ली की अधिकांश सड़कों पर ट्रेफिक की स्थिति यह है कि कोई भी वाहन चालक 25 से 30 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफतार से अधिक अपना वाहन नहीं चला पाता है, लेकिन हाल ही में हुई बरसातों ने दिल्ली की अधिकांश सड़कों पर गड्ढ की ऐसी बरसात कर दी है कि अब वाहन चालकों का ध्यान वाहन चलाने से ज्यादा वाहन बचाने में लगा रहता है।
एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में वाहनों की संखया लगभग 60 लाख के आसपास है। इनमें से करीब 98 प्रतिशत वाहन 24 घंटे सड़कों पर ही रहते हैं। दिल्ली की सड़कें जहां दिन में वाहन चलाने के काम आती हैं वहीं रात के समय वाहन पार्क करने के लिए। दिल्ली में वाहन पार्किंग की समस्या एक गंभीर समस्या है। आज एक-एक परिवार के पास दो से चार वाहन हैं लेकिन इनमें से एक भी वाहन खड़ा करने के लिए पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। जिसके चलते अधिकांश वाहन मालिकों को दिन के समय अपनी दुकानों अथवा कार्यालयों के आगे तथा रात के समय अपने घर के आगे बनी सड़क पर अपने वाहन पार्क करने पड़ते हैं।
दिल्ली में ट्रेफिक नियमों की अनदेखी भी ट्रेफिक जाम का एक बहुत बड़ा कारण है। प्रतिबंध के बावजूद भी रिंग रोड अथवा आउटर रिंग रोड पर साईकिल, रिकशा, रेहड़ी वाले बेखौफ होकर सड़क के बीचोंबीच चलते हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह साईकिल अथवा रिकशा चालक लाल बात्ति की भी परवाह नहीं करते हैं और बिना सिग्नल के ही जिधर चाहे, जहां चाहे मुड़ जाते हैं। जिसके चलते वाहनों की गति तो अवरुद्घ होती ही है साथ ही दुर्घटनाएं भी घटती रहती हैं। कहने को इन दोनों मुखय मार्गों के दोनों ओर सर्विस लेन का निर्माण किया गया है लेकिन यह सर्विस लेन अवैध पार्किंग, अवैध पटरी बाजार अथवा अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी हैं।
दिल्ली में अधिकांश चौराहों के चारों ओर रिकशा वालों का जमघट लगा रहता है जिसके चलते कोई भी वाहन चालक बाईं ओर भी मुड़ने में भारी परेशानी महसूस करता है। इस मामले में दिल्ली ट्रेफिक पुलिस की भूमिका भी बेहद चौकाने वाली है। उन्हें लाल बात्ती क्रोस करते हुए अथवा बिना हेलमेट दुपहिया चलाते हुए चालक तो दिखाई दे जाते हैं लेकिन चौराहों पर रिकशा वालों का लगा रहने वाला जमावड़ा दिखाई नहीं देता। बात स्पष्ट है कि वे भी अपनी ड्यूटी से ज्यादा जेब भरने में विश्वास रखते हैं।
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भारत ने ओलंपिक में तीन मेडल जीत लिए हैं, एक स्वर्ण तो दो कांस्य। इतने मेडल पहली बार भारत को ओलंपिक में मिले हैं, बहुत खुशी की बात है। भारतवासियों को भी कहने का मौका मिल गया है कि वे ओलंपिक में मेडल जीत सकते हैं। यह अलग बात है कि मेडल जीतने में चीन की बराबरी तो दूर उसके आस-पास पहुंचने में भी हमें सालों लग जाएंगे। हालांकि जब विकास की बात होती है तो हम अपना मुकाबला चीन से ही करते हैं या दूसरे देश भी चीन के बाद भारत को ही सबसे तेजी से बढ़ता देश मानते हैं।
खैर छोडि़ए इन बातों को, अभिनव ने भारत को शूटिंग में स्वर्ण पदक दिलाया है। बीजिंग आलंपिक में इस कारण भारत के राष्ट्रगान को बजने का मौका मिला। हर देशवासी का सीना फख्र से चौड़ा हो गया। हो भी कयों नहीं, हमारे देश में कोई फेलेप्स तो पैदा होता नहीं है कि इकट्ठे 6-7 स्वर्ण पदक जीत ले। इतने पदक तो हमने 60 साल में नहीं जीते। अगर अभिनव के स्वर्ण पदक को ही देखें तो उसकी चमक में भारत सरकार का कया योगदान है? वैसे उसकी जीत के बाद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर हर बड़े लोगों ने उसे शाबाशी दी और उस पर इनामों की बौछार हो गई। चार-पांच करोड़ रुपये उसे इनाम स्वरूप मिल गए। लेकिन लोगों को यह भी पता होना चाहिए कि अभिनव का कोचिंग पर सालाना खर्च एक करोड़ रुपये से अधिक का था और बीते पांच सालों से वह इस प्रकार की कोचिंग ले रहा था।
अभिनव जन्म-जात संपन्न है। उसकी प्रॉपर्टी क् करोड़ रुपये से अधिक की है। लेकिन हर शूटर अभिनव की हैसियत का नहीं होता। उसे तो सरकार से ही मदद की आस होती है। जिस दिन अभिनव को स्वर्ण पदक मिला उस दिन मिलखा सिंह कह रहे थे कि हर मां को ऐसा बेटा पैदा करना चाहिए। लेकिन होना यह चाहिए कि देश के हर शूटर को अभिनव जैसी सुविधा और कोचिंग मिलनी चाहिए और यह जिममेदारी सरकार की है। चीन के खिलाड़ी अमेरिका को पछाड़ रहे हैं, क्यों? क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग देने की जिममेदारी वहां की सरकार लेती है। हमारे यहां तो क्रिकेट छोड़ किसी भी खेल पर खर्च करने के लिए पैसा ही नहीं है। क्रिकेट पर भी सरकार नहीं बीसीसीआई खर्च करती है। हॉकी का तो यह हाल हो गया है कि ओलंपिक खेलने केञ् लिए हम कवालिफाई ही नहीं कर पाए। कितने दुख की बात है।
ओलंपिक के जिस खेल में हमने स्वर्ण पदक हासिल किया था आज हम उस खेल में हिस्सा लेने के काबिल भी नहीं रहे। बॉकसिंग और कुश्ति के विजेताओं को भी सरकार से कोई खास मदद नहीं मिली है। इन दोनों खेलों में खुराक की बड़ी अहमियत होती है। खुराक में अच्छी खासी रकम खर्च हो जाती है। इसलिए कोई गरीब घर का बच्चा भारत में न तो कुश्ति लड़ सकता है और न ही मुक्केबाजी कर सकता है। क्योंकि भारत में सरकार की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं होती है। गरीब बच्चों की प्रतिभा भूख और अच्छे भोजन के अभाव में दब जाती है। जो लोग इस हैसियत में होते हैं कि रोजाना 5-7 लीटर दूध पी सकें या उस प्रकार का खाना अपने पैसे से खा सकें, वही पहलवान बन सकता है या फिर मुक्केबाज।
आखिर बिहार, उड़ीसा या पूर्वी उत्तर प्रदेश से कोई मुककेञ्बाज या पहलवान पैदा タयों नहीं होता। कयों सिर्फ पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में ही इस प्रकार के खिलाड़ी होते हैं। कयोंकि ये राज्य अपेक्षाकृत संपन्न हैं और यहां के किसान परिवार अपने बच्चों को रोजना काफी मात्रा में दूध, घी, मकखन खिलाने में सक्षम हैं। लेकिन अन्य प्रदेशों में ऐसा नहीं है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मैडल तालिका में देश के नाम को चमकाने के लिए वहां की सरकार को भारी मशककत करनी पड़ती है। कोई बच्चा पेट से ही शूटर, मुककेञ्बाज या तीरंदाज पैदा नहीं होता। यह सब उसकी प्रेकटिस या उसे मिलने वाली सुविधा पर निर्भर करता है। सरकार से मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर करता है। जिस देश के नेता और अफसर इन बातों को समझते हुए भी न समझें और खिलाडि़यों को प्रोत्साहित करने की जगह खुद को प्रोत्साहित करने में लगे रहें, उस देश से कया उम्मीद की जा सकती है।
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इसे देश चलाने वाली सरकार की नाकामी कहें या फिर विभिन्न राजनीतिक दलों की महत्वकांक्षा कि आज देश के दुश्मनों पर गोली चलाने वाले जवानों को अपने ही देशवासियों पर गोली चलानी पड़ रही है। आज पूरा जममू-कश्मीर जल रहा है, लेकिन सभी राजनीतिक दल जममू-कश्मीर में लगी आग बुझाने का प्रयास करने की बजाय उसी आग पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में मश्गूल हैं। भूमि के एक छोटे से टुकड़े ने एक बार फिर दो समुदायों के बीच नफरत का बीज बो दिया है। कश्मीर के कुछ हिस्से को लेकर भले ही भारत-पाक के बीच आज भी विवाद बना हुआ हो, लेकिन जो हिस्सा भारत के कホजे में है निःसंदेह वह भारत का एक अभिन्न अंग है।
जममू-कश्मीर में भले ही धारा 370 लागू हो लेकिन यह प्रदेश किसी एक जमात अथवा समुदाय की जागीर नहीं है। गत दिनों संसद में विश्वास प्रस्ताव के दौरान बोलते हुए नेशनल कांफेस के नेता उमर अホदुल्ला ने जिस बेशर्मी के साथ चीख-चीख कर कहा ‘यह जमीन हमारी है और कश्मीर का मुसलमान अपनी जमीन के लिए जान भी दे सकता है। हर वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए जो लाखो हिन्दू यहां पहुंचते हैं और दर्शन करते हैं, यह सभी यहां के मुसलमान के बिना कतई संभव नहीं है’। यह वाकय बोलते हुए उनके चेहरे पर जिस प्रकार के भाव उभर रहे थे वह निश्चित रूप से किसी एक वर्ग के खिलाफ जहर उगलते दिखाई दे रहे थे। जमीन और हक की इसी लड़ाई ने पाकिस्तान की नींव रखी और आज देश के हितैषी बनने वाले यह तथाकथित नेता कश्मीर में एक और पाकिस्तान बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
वास्तविकता तो यह है कि अमरनाथ श्राईन बोर्ड को अस्थायी रूप से आवंटित की जाने वाली 100 एकड़ भूमि को लेकर वहां के स्थानीय मुसलमान भाईयों को कोई एतराज नहीं है। यदि एतराज है तो उन राजनीतिक दलों को जो मुसलमानों के सच्चे हितैषी बनने का ढोंग कर हिन्दू-मुस्लिम एकता में दरार डालना चाहते हैं। यदि शीघ्र ही सभी राजनीतिक दलों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर जममू-कश्मीर में लगी आग को शांत करने की कोशिश नहीं की तो आने वाले समय में देश के अन्य भागों में भी जममू-कश्मीर जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है।
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पांच साल पूर्व आपके सहयोग से ‘अपनी दिल्ली’ का जो छोटा सा पौधा लगाया था वह आज एक वृक्ष बन कर आपके सामने खड़ा है। इन पांच वर्षों के दौरान प्रबुद्घ पाठकों व विज्ञापन दाताओं ने जो अपार स्नेह एवं सहयोग हमें दिया उसी का नतीजा है कि आज पत्रका रिता के क्षेत्र में अपनी दिल्ली अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हुआ है। हालांकि समय-समय पर न जाने कितने समाचार पत्रों का प्रकाशन आरंभ होता है और कुछ महीनों अथवा साल दो साल के बाद वे अतीत का हिस्सा बन जाते हैं। लेकिन हमारे प्रबुद्घ पाठकों एवं विज्ञापन दाताओं ने अपनी दिल्ली में जो विश्वास व्यकित किया उसकी का नतीजा है कि पांच साल पूर्व मात्र चार पृष्ठस्न् के श्वेत-श्याम समाचार पत्र के रूप में शुरू हुआ अपनी दिल्ली समाचार पत्र आज रंगीन साज-सज्जा के साथ आठ पृष्ठ के रूप में आपकी सेवा कर रहा है।
कुछ तथाकथित साप्ताहिक समाचार पत्र पत्रकारिता के नाम पर चंद उद्योगपतियों का मुखोटा बन कर पैसे कमाने में जुटे हैं, लेकिन अपनी दिल्ली ने पत्रकारिता के महत्व को समझते हुए हर समाचार को निर्भय होकर प्रकाशित किया है। चाहे जनता की आवाज हो, चाहे विपक्ष की या फिर सरकार की, सभी मामलों में अपनी दिल्ली ने पत्रकारिता के फर्ज को पूरी तरह से निभाया है। इन पांच वर्षों के दौरान कुछ तथाकथित साप्ताहिक समाचार पत्रों ने अपनी दिल्ली की बढ़ती लोकप्रियता से घबरा कर अपनी दिल्ली को तरह-तरह से बदनाम करने का घिनोना प्रयास भी किया, लेकिन हमारे प्रबुद्घ पाठकों एवं विज्ञापन दाताओं ने हर बार अपनी दिल्ली में पूर्ण विश्वास व्यकित करते हुए विरोधियों को मुंह तोड़ जवाब दिया है। जिसके लिए अपनी दिल्ली परिवार के सभी सदस्य हमारे प्रबुद्घ पाठकों एवं विज्ञापन दाताओं के सदैव आभारी रहेंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपका यह सहयोग भविष्य में भी इसी तरह हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा और अपनी दिल्ली पहले से कहीं अधिक मुखर व प्रखर होकर समाज की सेवा करता रहेगा।
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पहले राजस्थान, फिर कर्नाटक और उसके बाद गुजरात में हुए सीरियल बम धमाकों ने सरकार की गुप्तचर एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर सवालिया निशान लगा दिया है। इन धमाकों में सैकड़ों निर्दोष लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और सैकड़ों लोग घायल हो गए। ऐसा नहीं है कि देश में पहली बार आतंकियों ने ऐसे कृत्यो को अन्जाम दिया है। देश में घुसे आतंकी समय-समय पर बम धमाके कर देश की सुरक्षा व्यवस्था को ठेंगा दिखाते रहे हैं। लेकिन सरकार है कि हर बार ऐसी घटनाओं के लिए पड़ोसी देश को जिमेदार ठहरा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है।
देश में रह रहे प्रत्येक नागरिक की जान-माल की सुरक्षा का जिममा सरकार का होता है और देश के भीतर पुख्त सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई सुरक्षा एजेंसियां भी बनाई गई हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से देश में चल रही राजनीतिक उठापटक व राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप को देख कर ऐसा लगता है कि जैसे यह सुरक्षा एजेंसियां देश में सक्रिय आतंकियों को ढूंढने की बजाय नेताओं की मुखबरी करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं। यहां एक बात और ध्यान देने वाली है कि हाल ही में हुए तीनों सीरियल बम ホलास्ट भाजपा शासित राज्यों में ही हुए हैं।
ऐसा भले ही संयोगवश हुआ हो, लेकिन इस मामले में कहीं न कहीं आतंकवादियों की सोची-समझी साजिश भी नजर आ रही है। इसका सीधा कारण केन्द्र में बैठी कांग्रेस सरकार द्वारा आतंकवादियों के खिलाफ अपनाया जा रहा नरम रवैया है। जिस कारण आतंकवादी अपने कृत्य को बेखौफ होकर अंजाम दे रहे हैं। हो सकता है भाजपा शासित प्रदेशों में आतंकियों द्वारा आतंक फेसल कर वहां की जनता को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही हो कि भाजपा के राज में कोई भी नागरिक सुरक्षित नहीं रह सकता है। यदि आतंकियों की यही सोच है तो आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी यह आतंकी अपने काम को अंजाम दे सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो निश्चित रूप से यह आतंकी अपने मकसद में कामयाम हो जाएंगे।
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मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने संसद में भले ही बहुमत की लड़ाई जीत ली हो, लेकिन विश्वास मत के दौरान दो दिनों तक जो कुछ भी घटा उसने भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार कर दिया है। एक जमाना था जब हमारे देश की बागडोर पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान नेताओं के हाथ में थी। उस समय की राजनीति भी उनकी तरह निर्मल व स्वच्छ थी। उस समय का कोई भी नेता अपने उसूलों व चरित्र से समझौता नहीं करता था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश के दूसरे प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी हैं। जिन्होंने रेल मंत्री के रूप में कार्य करते हुए अपने आदर्शों व चरित्र का एक अनूठा उदाहरण पेश किया। शास्त्री जी के समय में एक रेल दुर्घटना की घटना ने उन्हें इतना व्यथित किया कि उन्होंने इस दुर्घटना की नैतिक जिममेदारी अपने ऊपर लेते हुए तुरंत अपने पद से त्याग पत्र दे दिया।
आजादी के बाद 61 वर्षों के सफर में गत तीन दशकों से राजनीति के पतन का जो सिलसिला शुरु हुआ था वह आज भी लगातार जारी है। कल तक जो लोग समाज व देश के लिए महज एक गुंडे या असमाजिक तत्व के रूप में जाने जाते थे वे लोग आज संसद में बैठ कर माननीय व सミमाननीय हो गए हैं और देश का भविष्य तय करते हैं। साथ के लालच ने आज के नेताओं को इस कदर नंगा कर दिया है कि वे अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जाने में कोई संकोच नहीं करते हैं।
सपा के नेता व धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीटने वाले अमर सिंह जिस कांगे्रस पार्टी व प्रधानमंत्री को आज देश का सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं उन्हीं अमर सिंह ने एक समय मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को 84 के दंगों का कातिल करार दिया था। इतना ही नहीं इन्हीं अमर सिंह ने लालू यादव को चारा खाने वाला और सोनिया को तेल पीने वाली बना दिया था। लेकिन साथ के लालच में आज वही अमर सिंह व उनकी पार्टी यूपीए की गोद में बैठ गई है। गुरु जी के नाम से मशहूर शिबु सोरेन को हत्या के आरोप में सजा हो जाने के कारण मंत्रीमण्डल से बाहर होना पड़ा था, हालांकि उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। बावजूद इसके उन्हें दागी करार देते हुए मंत्रीमण्डल में वापस नहीं लिया। लेकिन उसी मनमोहन सरकार ने अपनी कुर्सि बचाने के चककर में न केवल गुरु जी को दोबारा केन्द्र में मंत्री बनाना स्वीकार कर लिया बल्कि उनके एक और नेता को भी राज्यमंत्री बनाने की हामी भर दी। इस सारे प्रकरण में सबसे ज्यादा शर्मनाक बात यह रही कि विभिन्न पार्टियों के जो सांसद किसी न किसी बड़े अपराध की सजा काट रहे हैं, जिसके चलते उनकी पार्टियों ने भी उन सांसदों से किनारा कर लिया था लेकिन बहुमत साबित करने के लिए पूरी सरकार इन दागी सांसदों के आगे नतमस्तक हो गई। यह राजनीति के गिरते चरित्र का ही परिणाम है कि विरोधी पार्टियों के कुछ सांसदों ने भी अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने आपको बिकाऊ माल बना डाला। संसद भवन में तीन सांसदों द्वारा एक करोड़ रुपया ले जाकर यह आरोप लगाना कि सरकार के लोगों में उन्हें खरीदने की कोशिश की, इस बात की ओर इशारा करता है कि आज एक सांसद की हैसियत किसी वैश्या से अधिक नहीं रह गई है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि उसका सौदा करने के लिए कौन कितनी अधिक बोली लगाता है।
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में राजनीति के गिरते चरित्र के लिए यह नेता नहीं बल्कि देश की जनता जिममेदार है। जिसने ऐसे भ्रस्त्त और चरित्रहीन लोगों को अपना नेता चुना। देश की जनता ने यदि अपने वोट रूपि हथियार से ऐसे नेताओं व पार्टीयों को सबक नहीं सिखाया तो वह दिन दूर नहीं जब देश के यही नेता देश के साथ-साथ हमारी बहन-बेटियों की भी बोली लगाने में कोई संकोच नहीं करेंगे।
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राजधानी दिल्ली में गत एक पखवाड़े के दौरान हुई अपराधिक घटनाओं ने दिल्लीवासियों को दहशत के साये में जीने पर मजबूर कर दिया है। अपराधी दिन-दहाड़े कहीं भी, किसी भी बड़ी घटना को अंजाम देकर बड़ी आसानी से निकल जाते हैं और पुलिस हाथ मलती रह जाती है। हालांकि दिल्ली पुलिस आयुक्त का दावा है कि दिल्ली में अपराध का ग्राफ कम हुआ है, लेकिन गत 15 दिनों के भीतर घटी घटनाएं उनके दावे की पोल खोलने के लिए काफी हैं। गत एक जुलाई को नन्द नगरी इलाके में बदमाशों ने एक वृद्घा के गले से सोने की चेन छीनने का विरोध करने वाले दो युवकों को गोली मार दी। इसी दिन बलबीर नगर इलाकेञ् में दिन-दहाड़े पांच हथियारबंद बदमाशों ने एक व्यापारी के घर में घुस कर लाखों रुपये की नकदी व जेवर लूट लिए। पांच जुलाई को देर रात संगम विहार इलाके में कुछ अज्ञात बदमाशों ने एक प्रोपर्टी डीलर को गोलियों से भून दिया। छः जुलाई को अमन विहार इलाके में घर में घुसे लुटेरों ने विरोध करने पर घर के मालिक को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया। सात जुलाई को बल्लीमारान इलाके में पांच हमलावरों ने दो युवकों को गोलियों से छलनी कर दिया। आठ जुलाई को विकास मार्ग पर दो बदमाशों ने मोबाईल शो-रूम के एक कर्मी पर गोलियां चला कर डेढ़ लाख रुपये लूट लिये। नौ जुलाई को न्यू सीलमपुर इलाके में हुई एक गैंगवार में तीन लोगों की हत्या हो गई। इस घटना केञ् बाद मौके से विदेशी पिस्टल व भारी मात्रा में गोलियां भी बरामद हुईं। 11 जुलाई को अमर कॉलोनी मेन मार्किट में दो बाइक सवार बदमाशों ने दो युवकों की गोलियों से हत्या कर बाइक लूट ली। इतना ही नहीं घटना के तत्काल बाद बदमाशों ने एन्ड्रयूजगंज फलाईओवर के समीप एक बाइक लूटने की कोशिश की। विरोध करने पर बाइक सवार की गोली मार कर हत्या कर दी। 12 जुलाई को मदनगीर इलाके में बाइक सवार बदमाशों ने दो व्यवसायियों को गोली मार कर दुकान से पांच लाख रुपये लूट लिये। 13 जुलाई को बवाना इलाके में एक घर में घुस कर दीपक नामक एक छात्र को गोली मार दी।
14 जुलाई को कोंडली इलाके में तीन बदमाशों ने एक ज्वैलरी शॉप तथा एक क्लीनिक में लूटपाट की। 15 जुलाई को बाइक पर सवार पांच बदमाशों ने मयूर विहार इलाके में हथियारों के दम पर एक फर्नीचर व्यवसायी से पल्सर बाइक लूट ली तथा शाम को प्रीत विहार मार्किट में दो दुकानों से नकदी लूट ली। 16 जुलाई को अशोक विहार औद्योगिक क्षेत्र के वजीरपुर इलाकेञ् में रात के समय मोटर साइकल पर सवार तीन अज्ञात बदमाशों ने एक व्यापारी को गोली मार कर नकदी छीन ली और फरार हो गए। एक पखवाड़े के भीतर हुई एक दर्जन से भी अधिक इन घटनाओं में मात्र तीन मामलों में पुलिस अपराधियों तक पहुंचने में सफल रही है, जबकि बाकी सभी मामले पुलिस के लिए अनबूझ पहले बने हुए हैं।
भारत की राजधानी दिल्ली जैसे शहर में घटी यह घटनाएं निश्चित रूप से पुलिस की विफलता और बदमाशों के बढ़ते हौसले का प्रमाण है। यह बात सही है कि दिल्ली में आबादी के लिहाज से पुलिसकर्मियों की संख्या काफी कम है, लेकिन यह बात भी सही है कि दिन भर बैरिकेटर लगा कर दुपहिया वाहन चालकों से उगाही करने वाले पुलिसकर्मी वारदात के समय दूर-दूर तक भी नजर नहीं आते हैं। दिल्ली की हर कालोनी व हर मुख्य मार्ग पर पुलिस बीट बॉक्स बनाए गए हैं लेकिन इनमें से अधिकांश बीट बॉक्सों पर या तो ताला लटका रहता है या फिर अवारा पशु अपना डेरा जमाए रहते हैं। राजधानी में तेजी से बढ़ रही अपराधिक वारदातों पर अंकुश लगाने के लिए यदि दिल्ली पुलिस ने जल्द ही कड़े कदम नहीं उठाए तो वह दिन दूर नहीं जनता का पुलिस पर रहा-तहा विश्वास भी पूरी तरह से उठ जाएगा।
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चार साल से अधिक समय तक यूपीए गठबंधन का प्रमुख घटक दल रह चुके वाम मोर्चा ने आखिरकार केन्द्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले ही लिया। कल तक सरकार के समर्थक रहे वाम मोर्चा के नेता आज कांग्रेस को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं और उस पर विश्वासघात करने का आरोप लगा रहे हैं। परमाणु करार को लेकर यूपीए गठबंधन व वाम मोर्चा के बीच आई दरार को भरने का जिम्मा समाजवादी पार्टी ने उठा लिया है। हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है इस बात का प्रमाण जहां चार साल पहले कांग्रेस के धुर विरोधी वाम मोर्चा ने सरकार को समर्थन देकर दिया था वहीं कल तक सोनिया गांधी को विदेशी बहु और कांग्रेस को भ्रष्टस्नचारियों पार्टी कहने वाले सपा सुप्रिमो मुलायम सिंह यादव व उनके ‘हनुमान’ अमर सिंह ने आज कांग्रेस की गोद में बैठ कर एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र की सही परिभाषा केवल भारत के नेता ही जानते हैं।
यह बात अलग है कि इस ‘मधुर मिलन’ के पीछे दोनों ही पार्टियों का अपना-अपना स्वार्थ है। लगातार बढ़ती महंगाई से परेशान कांग्रेस फिलहाल इस स्थिति में नहीं है कि वह जल्द ही चुनावों का सामना कर सके। कमोवेश कुछ ऐसी ही स्थिति सपा की भी है। क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रदेश की सबसे ताकतवर माने जाने वाली पार्टी सपा को माया ने जो पटखनी दी है उसे मुलायम व अमर सिंह अभी तक भूले नहीं हैं। उन्हें भी इस बात का अंदाजा है कि यदि वर्तमान परिस्थितियों में लोकसभा चुनाव होते हैं तो विधानसभा चुनाव की तरह लोकसभा चुनाव में भी सपा को मुंह की खानी पड़ सकती है।
ऐसे में कांग्रेस को समर्थन देकर सपा एक ओर जहां लोकसभा चुनाव को फिलहाल टाल सकती है, वहीं अपने नेताओं के खिलाफ आय से अधिक संपात्ति के मामलों की जांच प्रभावित भी करवा सकती है। जाहिर सी बात है कि वाम मोर्चा के समर्थन वापसी के बाद 39 सांसदों वाली सपा का महत्व सबसे ज्यादा हो गया है। अमर सिंह राजनीति की शतरंज के माहिर खिलाड़ी हैं वे किसी भी मौके का लाभ उठाने से नहीं चूकते हैं। जिस बात का इशारा उन्होंने समर्थन के तुरंत बाद विभिन्न मंत्रालयों के आलाधिकारियों से एक बैठक कर दे भी दिया है।
हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में सरकार बचाना कांग्रेस की मजबूरी है लेकिन इतना तय है कि सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक सपा सहित सरकार को बाहर व अन्दर से समर्थन दे रहे छोटे-छोटे दल कांग्रेस को एक ऐसी ‘द्रोपदी’ बना कर रखेंगे जिसका वस्त्र हरण करने वाले तो सभी होंगे लेकिन मदद करने वाला ‘कृष्ण’ कोई नहीं होगा। ऐसी स्थिति कांग्रेस और देश के लिए और भी ज्यादा दुखदायी होगी। जिसका खामियाजा भविष्य में कांग्रेस और देश को भी भुगतना पड़ सकता है।
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