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वर्तमान समय में जब निहित स्वार्थों से प्रेरित होकर राजनेता से लेकर अपने को धर्म के ठेकेदार बताने वाले मजहब के नाम पर लोगों में फूट डालने के साथ ही उन्हें आपस में लड़वाने की नई-नई साजिशें रच रहे हैं। ऐसे में पाक़ नगरी अजमेर शरीफ स्थित गरीब नवाज ख्‍वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के गद्दीनशीन व खादिमों ने भगवान जगन्नाथ की यात्रा का पुरजोर स्वागत कर सांप्रदायिक सौहार्द व आपसी भाईचारे की नई मिसाल कायम की है।
भगवान जगन्नाथ की यात्रा की स्वागत करते हुए दरगाह के गद्दीनशीन ने यह कहा कि उन्होंने सदियों पुरानी हमारी गंगा-जमुनी सマयता को निभाते हुए ही ऐसा किया है। जब यात्रा दरगाह के मुख्‍य द्वार के सामने से गुजर रही थी, तो उसका इस्तकबाल करना हमारा फर्ज था। उन्होंने यह भी कहा कि गरीब नवाज की दरगाह पर अपनी अकीकत के फूल चढ़ाने सभी मजहब के लोग आते हैं और उनमें पूरी श्रद्घा रखते हैं। जब गरीब नवाज अपनी दरगाह पर आने वाले इंसानों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बरतते तो उनके खिदमतगार भला ऐसा कैसे कर सकते हैं। उनके इस कथन से ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा’ जैसी प्रसिद्घ नज्म लिखने वाले शायर इकबाल की यह पंक्‍तियां बरबस याद जाती है, ‘मजबह नही सिखाता आपस में बैर रखना।’
ख्‍वाजा गरीब नवाज के गद्दीनशीन व खिदमतगारों का यह जज्‍बा देखकर जहां हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो गया वहीं इस मामले में तमाम लोकप्रिय टी.वी. चैनल की भूमिका की देखकर शर्मसार भी हुए। मानवता, आपसी भाईचारे व सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने वाली इतनी बड़ी घटना के बारे में किसी भी चैनल ने छोटा सा समाचार भी प्रसारित करना उचित नहीं समझा। ऐसा लगता है कि इन चैनल वालों के लिए यह बात शायद समाचार लायक ही नहीं थी। ग़र दुर्भाग्य से भगवान जगन्नाथ की यात्रा के दौरान कोई अप्रिय घटना घटित हो जाती तो तमाम टीवी चैनल 24 घंटे उस घटना को लाइव दिखाते हुए आसमान सिर पर उठा लेते।
खबरों के मामले में अपने को दूसरे चैनलों से आगे बताने और टीआरपी के मामले में अव्वल दर्शाने वाले टीवी चैनलों ने राष्ट्रीय हितों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है। अजमेर की घटना को कोई महत्व न देना इसका जीता जागता उदाहरण है। इन टीवी चैनलों के संचालकों को लगा होगा कि सांप्रदायिक सद्भाव देने वाली घटना को दिखाने से न तो उनके विज्ञापनों में इजाफा होगा और न ही उनकी टीआरपी बढ़ेगी। यही वजह है कि वह ऐसी बातों की ओर कोई ध्यान नहीं देते।
टीवी चैनल वालों की दृष्टिस्न् में विदेशी अभिनेता रिचर्ड गेरे का बालीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी को भावावेश में चूम लेने, पॉप गायक मिका व आयटम गर्ल राखी सावंत का चुंबन लेने की घटनाएं इतनी महत्वपूर्ण हो जाती हैं कि वह दिन में कई-कई घंटों तक इन्हीं घटनाओं को दिखाते रहते हैं। इतना ही नहीं समाज में तंत्र-मंत्र करने वाले बाबाओं के विशेष कार्यक्रम दिखाने के साथ ही उटपटांग घटनाओं पर विशेष कार्यक्रम प्रसारित करते रहते हैं। हद तो तब हो जाती है कि यह सामाजिक बुराइयां दिखाने के नाम पर अश्लीलता परोसने से भी बाज नहीं आते हैं।
इन टीवी चैनल के कार्यक्रम को देखते हुए ऐसा लगता है कि इस देश में पति-पत्नी के रिश्ते व बाबाओं के चमत्कार से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। तब ही हर चैनल 24 घंटे इन्हीं बातों से संबंधित कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहा है तो इन चैनलों के लिए दूसरे सभी मुद्दे गौण हो जाते हैं।
टीवी चैनल समाज में अराजकता फैलाने वाले नकारात्मक मुद्दों को प्रमुखता दे रहे हैं। ऐसा करते समय वह यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि जो समाज में घटित हो रहा है वह वही दिखा रहे हैं। हमारा मक़सद तो ऐसी चीजों का दिखाकर जनता को उनके प्रति आगाह करना है। अपने को लोकतंत्र का सजग पहरेदार बताने वाले टीवी चैनल वास्तव में इसे ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। गलत एग्जिट पोल और चुनाव पूर्व सर्वेक्षण दिखाकर मतदाताओं को गुमराह करना, विभिन्न मुद्दों पर लोगों की भावनाएं भड़का उन्हें व्यवस्था के विरूद्व उकसाना या करना जैसे काम टीवी चैनल वाले कर रहे हैं। ऐसा करते समय यह न केवल पत्रकारिता के मापदंडो की धज्जियां उड़ा रहे हैं बल्कि भारतीय प्रेस परिषद की आचार संहिता को भी तार-तार कर रहे हैं।
टीवी चैनल बाजारवाद को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम बनाते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि उनका अस्तित्व ही बाजार पर आश्रित है। यही वजह है कि वे बाजारवाद को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। ऐसा करते समय उन्हें इस बात का ध्यान भी नहीं रहता है कि समाज के प्रति उनका क्‍या कर्तव्य है।
टीवी चैनल हमारी संस्कृति के साथ ही हमारी भाषा से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। इन चैनलों पर बोली जाने वाली भाषा को न हिंदी कहा जा सकता है न इंग्लिश। वह इन दोनों भाषाओं का विकृत रूप हिंग्लिश है। यही वजह है कि उनकी नजर में राष्ट्रभाषा हिंदी का कोई महत्व नहीं है। यही कारण है कि वह न्यूयार्क में संपन्न हुए अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्‍मेलन के बारे में छोटा सा समाचर दिखाना भी गंवारा नहीं करते हैं।

भारतीय मुस्लिम समाज और खासकर इसकी महिलाओं का सबसे बड़ा कोई दुश्मन है तो वह उलेमा ही हैं। यह उलेमा गाहे-बगाहे इस्लाम के नाम पर ऐसे फतवे जारी कर देते हैं, जिससे मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के लिए तरक्‍की के सारे रास्ते बंद हो जाएं। दरअसल सदियों से औरत को पैर की जूती समझने और उसका भोग्या की तरह इस्तेमाल करने वाले कठमुल्ले व उलेमा की नजरों में औरतों की तरक्‍की कांटे की तरह खटक रही है। वह चाहते हैं कि आज के आधुनिक युग में महिलाएं अशिक्षित व घर की चारदीवारी में कैद रहें।
दारूल उलूम की ओर से जारी किया हालिया फतवा भी इसी चेष्टा का एक हिस्सा लगता है। इस फतवे में सह-शिक्षा को गैर इस्लामी, गैर शरई और गैर कानूनी करार दिया गया है यह तो माना जा सकता है कि उलेमा किसी भी व्यवस्था को इस्लाम व शरीयत की कसौटी पर कसने के बाद उस बारे में अपनी राय देने के लिए स्वतंत्र हैं। मगर उन्हें किसी भी व्यवस्था को अपने नजरिए से गैर कानूनी बताने का कोई अधिकार नहीं है। यदि उलेमा ही कानून संबंधी फैसले लेने लगेंगे तो फिर अदालतों की जरूरत ही क्‍या रह जायेगी?
यह सही है कि उलेमाओं ने मुस्लिम समुदाय पर अपने मनमाने फैसले थोपने के प्रयासों पर कड़ी आपात्ति जताई है। बावजूद इसके उलेमा गाहे-बगाहे ऐसे फतवे जारी कर देते हैं जिसकी वजह से दुविधापूर्ण स्थिति पैदा हो जाती है। जिसे देखते हुए ऐसी व्यवस्था कायम करना बेहद जरूरी हो गया है, जिसके तहत कोई भी उलेमा बिना आवश्यकता के कोई भी फतवा जारी न करे। इसके लिए मुस्लिम समुदाय को भी गैर वाजिब व गैर जरूरी फतवों के विरोध में खुलकर सामने आना होगा।
दुखद बात तो यह है कि अभी तक तो अधिकांश मुस्लिम समाज उल-जलूल फतवों पर भी खामोशी अख्‍तियार किए रहता है। थोड़े से शिक्षित लोग कभी-कभी ऐसे फतवों के खिलाफ विरोध के स्वर उठाते नजर आते हैं, मगर ऐसे लोगों की संख्‍या कम होने के कारण उनकी आवाज नक्‍कारखाने की तूती बनकर रह जाती है। यही वजह है कि उलेमा जब चाहे तब फतवा जारी कर देते हैं। फतवा जारी करते समय वह सोचने की जहमत उठाना तक गवारा नहीं करते हैं कि इससे उनके अपने समाज का कितना बड़ा अहित होगा। उन्हें तो फतवा जारी कर अपना महत्व जतवाने से ही मतलब है।
यह सब जानते हैं कि मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा ही है। जिसे देखते हुए अब इस समुदाय के लोगों ने भी अपने अंधेर घरों को शिक्षा से रोशन करने का फैसला ले लिया है और वह लड़कों के समान लड़कियों को भी स्कूल भेजने लगे हैं। यह सब जानते हुए कि बेहतर शिक्षा व उज्ज्वल भविष्य के लिए पब्‍लिक स्कूल से बेहतर विकल्प दूसरा नहीं है और ऐसे स्कूलों में सह-शिक्षा की व्यवस्था है। पब्‍लिक स्कूल व राज्य सरकार के प्रतिभा विकास व माडल स्कूलों में भी सह-शिक्षा की व्यवस्था है।
जाहिर सी बात है कि अगर दारूल उलूम की ओर से जारी फतवे पर अमल किया जाए तो लड़कियों को ऐसे स्कूलों से निकालना होगा, क्‍योंकि स्कूल तो लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शिष्‍ट लगाने का प्रबंध करेंगे। हालांकि इस फतवे में उलेमा ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि सह-शिक्षा वाले स्कूलों में से लड़कों को निकालने के हिमायती हैं या लड़कियों के। वैसे अभी तक जारी होने वाले फतवे महिलाओं के ही विरोधी रहे हैं। इस नाते यह फतवा भी लड़कियों को ही सह-शिक्षा स्कूलों से बाहर निकालने के संबंध ही होगा। इस बारे में किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दारूल उलूम के इस फतवे को देवबंदी के अनेक उलेमा भी जायज मान रहे हैं।
अगर इस फतवे का व्यापक तौर पर सहमति दे दी गई तो इससे लड़कियों के बेहतर तालिम हासिल कर जीवन में कुछ बनने के तमाम रास्ते बंद हो सकते हैं। मुस्लिम समाज का नजरिया महिलाओं के प्रति आज भी नहीं बदला है। उन्हें महिलाओं का घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर किसी भी क्षेत्र में उंचाईयां छूना पसंद नहीं है। इससे उनके अहंम को चोट पहुंचती है और ऐसा होने पर वह तिलमिला उठते हैं। अपने समाज की महिलाओं की तरक्‍की और कामयाबी से प्रेरित होकर उनसे भी आगे निकलने की कोशिश करने की बजाय वह महिलाओं की राह मुश्किल करने में जुट जाते हैं। उलेमा व मौलानाओं के फतवे उनकी इसी मानसिकता को प्रकट करते हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि जब मुस्लिम समाज की महिला पुरुषों के अत्याचार व अन्याय के पति आवाज उठाती हैं या अपने हक की मांग कर रही हैं तब उलेमा और मौलाना उसका समर्थन करने की बजाय उसके खिलाफ ही फतवा जारी कर देते हैं। महिलाओं के अपने पति को तलाक देने की बात भी उन्हें शरीयत के खिलाफ लगती है।
उनकी नजर में तो अपनी बेटी को समान पुत्र वधु के साथ ससुर के बलात्कार करने जैसे मामलों में भी कुछ गलत नजर नहीं आता है। तब भी इस मामले को तूल देने के लिए पीडि़त महिला को ही दोषी ठहराते हुए उसके खिलाफ फतवा जारी कर देते हैं। ऐसा लगता है कि उलेमा और मौलानाओं को सारी फिक्र केवल पुरुषों के हकों को सुरक्षित रखने तक ही सीमित है।
विडम्‍बना तो यह है कि उलेमा और मौलानाओं द्वारा जारी किए गए ऊल जलूल किस्म के फतवों को मुस्लिम समाज का कोई न कोई वर्ग समर्थन दे देता है, जिसकी वजह से फतवा देने वालों का हौंसला बढ़ जाता है। अगर मुस्लिम समाज ऐसे फतवों की ओर ध्यान देने की बजाय उनका खुलकर विरोध करने लगेगा तो उलेमा भी ऐसे फतवे जारी करने से पहले कई बार सोचने लगेंगे।
फतवा जारी करने वाले उलेमा और मौलाना शरीयत की अपने ढंग से व्यख्‍या करते हैं, जिसकी वजह से अधिकांश लोग उनका विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। क्‍योंकि अगर उन्होंने ऐसा किया तो उन्हें धर्म विरोधी करार देने के साथ ही उनका सामाजिक बहिष्कार भी किया जा सकता है। जिसकी वजह से वह खामोश रह जाते हैं। उनकी इसी खामोशी का फायदा उलेमा और मौलाना उठा रहे हैं। ऐसा लगता है कि उलेमा और मौलानाओं के बेतुके फतवों के पीछे कहीं न कहीं मुस्लिम समाज के पुरूषों की सदियों पुरानी उस मानसिकता का भी हाथ है, जिसमें महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मान कर उनके साथ इसी प्रकार से व्यवहार करने पर जोर दिया जाता है। यही वजह है कि इन फतवों को उनकी मौन स्वीकृति मिल जाती है। जबकि होना तो यह चाहिए कि इस प्रकार के फतवों का पुरजोर विरोध करने के साथ ही इन्हें जारी करने वाले उलेमा और मौलानाओं का सामाजिक बहिष्कार किया जाए ताकि वह भविष्य में इस प्रकार के फतवे जारी करने से पहले कई बार सोंचें।

जम्मू कश्मीर की सरकार खास तौर पर अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने अपनी अपराधपूर्ण लापरवाही के कारण लगातार दूसरे वर्ष लाखों श्रद्घालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के साथ ही उनकी आस्था से खिलवाड़ किया है।
अमरनाथ की पवित्र गुफा में हर साल बर्ड्ड के प्राकृतिक रूप से बने शिवलिंग के दर्शन करने की आस लेकर लाखों यात्री सैंकड़ो मील दूर से और दुर्गम पहाड़ी रास्तों को पार कर वहां पहुंचते हैं। मगर इस बार अधिकृत यात्रा शुरू होने से पहले ही शिवलिंग पिघल गया। जिस कारण लाखों श्रद्घालुओं की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंची है। अमरनाथ श्राइन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ग्लोबल वार्मिंग और इसे प्राकृतिक प्रक्रिया बताकर अपना पल्ला झाड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
जबकि भूगर्भ वैज्ञानिकों का स्पष्ट रूप से मानना है कि शिवलिंग मौसम की गड़बड़ी के कारण नहीं पिघला है बल्कि अधिकारिक रूप से यात्रा शुरू होने के डेढ़ महीने पहले से वहां हजारों यात्रियों के अनधिकृत रूप से पहुंच जाने और वातावरण में गर्मी पैदा करने वाले उपकरण इस्तेमाल करने के कारण ही अमरनाथ गुफा के आसपास का वातावरण गर्म हो गया जिसकी वजह से बर्फानी बाबा का शिवलिंग पिघल गया।
इस बार अपै्रल व मई के दौरान शिवलिंग की उंचाई 12 फुट से भी अधिक थी। इस बार अमरनाथ की यात्रा अधिकृत रूप से शुरू करने की तिथि 30 जून निर्धारित की गई थी। मगर यात्रा शुरू होने से पहले ही शिवलिंग पूरी तरह से पिघल चुका था।
जम्मू टूरिस्ट ट्रेड एंप्लायीज फेडरेशन का कहना है कि यात्रा शुरू होने से पहले ही 500 अनिवासी भारतीयों ने गुफा की यात्रा की। यह लोग गुफा के पास चार दिन तक डेरा डाले रहे। इस दौरान उन्होंने रोशनी के लिए जेनरेटर और खाना बनाने के लिए रसोई गैंस का इस्तेमाल किया। जिसकी वजह से पवित्र गुफा के पास का तापमान बढ़ गया। यह भी शिवलिंग पिघलने का एक प्रमुख सबब बना। इसके अलावा अति विशिष्ट लोगों को लाने-ले जाने के लिए हेलीकोप्टर की उड़ानों का भी वातावरण पर काफी प्रतिकूल असर पड़ा।
निजी चैनलों द्वारा दिखाई गई सीडी में फेडरेशन के आरोपो की पुष्टि होती है। इस सीडी में दिखाया गया है कि सुरक्षा कर्मियों समेत अनेक लोग शिवलिंग को नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह लोग सभी व्यवस्थाओं को धात्त बताते हुए न केवल शिवलिंग पर चढ़ गए थे बल्कि उन्होंने बार-बार उसे अपनी बाहों में जकड़ने के साथ ही उसे खरोच भी रहे थे।
इतना ही इन लोगों ने शिवलिंग के पास धूप-बात्ती, अगरबत्ती व दिए भी जलाए, जिसका वातावरण पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। जिसकी वजह से शिवलिंग समय से काफी पहले ही पिघल गया। जिससे हिम शिवलिंग के दर्शन करने आने वाले लाखों लोग निराश हो गए। इस सीडी में एक व्यक्ति को यह कहते दिखाया गया है कि वह पिछले कई साल से यात्रा शुरू होने से पहले ही अपने साथियों के साथ अवैध रूप से यहां पहुंचकर शिवलिंग के दर्शन करता रहा है। उसका यह भी कहना है कि यात्रा शुरू होने से पहले शिवलिंग के दर्शन करने की एवज में होटल वालों को ज्यादा पैसे देने के अलावा सुरक्षा कर्मियों को भी रिश्वत देनी पड़ती है। यदि पहलगाम के होटल वालों की बात पर विश्वास करें तो इस बार यात्रा शुरू होने से पहले ही हजारो लोग अवैध रूप से अमरनाथ की पवित्र गुफा में पहुंचकर शिवलिंग के दर्शन कर चुके थे। उनका कहना है कि पैसे वाले कुछ भी कर सकते हैं। इन अवैध यात्रियों की सुविधा के लिए मई-जून के दौरान हेलीकॉप्टर सेवा भी संचालित की गई।
जाहिर सी बात है कि इस गोरख धंधे में अमरनाथ श्राइन बोर्ड के अधिकारियों से लेकर दलाल व सुरक्षाकर्मियों तक की मिलीभगत रही है। यह बात दीगर है कि उनकी चंद पैसे कमाने की इस फितरत के कारण लाखों श्रद्घालुओं की आस्था पर कुठाराघात हुआ है।
देहरादून की एकेञ्डमी फॉर माउंटेन एन्वायरमेंट के निदेशक आर. श्रीधर शिवलिंग पिघलने के संबंध में अमरनाथ श्राइन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरूण कुमार की ओर से पेश की गई दलीलों को सिरे से नकारते हैं।
उनका कहना है कि शिवलिंग पिघलने का असली कारण अव्यवस्था व बोर्ड की पैसा कमाने की लालसा जिम्मेदार है। उनका कहना है कि दलाल व सुरक्षाकर्मी की मिलीभगत से अवैध यात्रियों को पैसा लेकर पवित्र गुफा में प्रवेश की अनुमति दे दी जाती है। जिसका भी वहां के वातावरण पर विपरीत असर पड़ता है।
उल्लेखनीय है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने पिछले कुछ से समय से इस यात्रा की अवधि एक माह से बढ़ाकर दो माह कर दी है। इतना ही नही उसने गुफा तक दुकाने लगाने की अनुमति भी दे दी है। इसी प्रकार पहलगाम व बालटाल दोनों ही मार्गों पर अनवरत चलने वाले लंगरों की संख्या भी कई गुना बढ़ गई है। एक-एक लंगर शिविर में भोज्य सामग्री बनाने के लिए प्रतिदिन रसाई गैंस के कई-कई सिलेंडरों का इस्तेमाल होता है। इससे भी अमरनाथ की पवित्र गुफा के आसपास वातावरण में गर्मी बढ़ रही है।
हालांकि अमरनाथ श्राइन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अरूण कुमार का कहना है कि यात्रा की अवधि बढ़ाने का शिवलिंग पिघलने की घटना के साथ कोई संबंध नहीं है। उनका ऐसा कहना सरासर गलत है क्योंकि वर्षों से अमरनाथ की यात्रा केवल श्रावण माह में करने की अनुमति दी जाती थी तब शिवलिंग के दर्शन भी रक्षाबंधन के दिन तक होते थे।
दरअसल अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने इस यात्रा को पर्यटन का रूञ्प देने के साथ ही पैसा कमाने का एक जरिया बना लिया है। जिसके चलते उसने यात्रा मार्ग पर लगने वाली दुकानों की संख्या काफी अधिक बढ़ाने के साथ ही दिन में हेलिकॉप्टर की कई-कई उड़ाने संचालित करने की अनुमति भी दी है। हेलीकॉप्टर की लैंडिग व टेकऑफ के लिए हेलीपेड पवित्र गुफा के एकदम करीब बनाया गया है। हेलीकॉप्टर के दिन में कई कई बार आने-जाने का पूरे वातावरण पर काफी विपरीत असर पड़ रहा है। मगर अमरनाथ श्राइन बोर्ड इस ओर से आंखे मूंदे हुए है।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष हिम शिवलिंग बना ही नहीं था। शिवलिंग न बनने की खबर से यात्रा का रजिस्ट्रेशन कराने वाले यात्री अपनी यात्रा रद्द कर सकते हैं जिससे बोर्ड को लाखों रुपये की आमदनी से हाथ धोना पड सकता है।
इस आंशका के मद्देनजर श्राइन बोर्ड ने टनों बर्फ मंगवा कर कृत्रम शिवलिंग बनाने का प्रयास किया था। इसका खुलासा हो जाने पर श्रद्घालुओं में काफी तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। जिसे देखते हुए जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने इस सारे मामले की जांच करा दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा की थी।
इस घोषणा को एक साल बीत गया है मगर इस संबंध में एक भी दोषी के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की जानकारी नहीं मिली है। अगर राज्यपाल और राज्य सरकार ने लोगों को धार्मिक ठेस पहुंचाने वाली इस घटना को गंभीरता से लिया होता तो आज अमरनाथ की पवित्र गुफा के हालात इतने खराब नहीं होते। राज्य सरकार को यह सोचना चाहिए कि अगर इसी तरह से बार-बार श्रद्घालुओं की भावनाओं से खिलवाड़ होता रहा तो फिर भला कौन सा यात्री सैंकड़ों मील दूर से यहां की दुर्गम यात्रा पर आएगा। जब यात्री ही नहीं आयेंगे तो फिर भला सरकार और अमरनाथ श्राइन बोर्ड का राजस्व कैसे बढ़ेगा?
ऐसा लगता है कि जम्मू कश्मीर सरकार भोले बाबा के भक्तों के सब्र का इम्तिहान ले रही है। अगर भक्तों के सब्र का पैमाना छलक गया तो यह न तो राज्य सरकार और न ही अमरनाथ श्राइन बोर्ड के हक में होगा।

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद (राष्ट्रपति) को पूरी तरह से दलगत राजनीति से मुक्त रखने की व्यवस्था की है। बावजूद इसके देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के चयन के बाद से इस पद पर नियुक्ति पूरी तरह से राजनीतिक आधार पर होती रही है। मगर इस बार देश के अगले राष्ट्रपति को लेकर तीनों प्रमुख राजनीतिक गठबंधन जिस प्रकार से बिसात बिछाकर एक-दूसरे को मात देने की चाले चल रहे हैं उससे राष्ट्रपति चुनाव राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गया है। इस बार राष्ट्रपति पद के लिए केंद्र में सात्ताधारी कांग्रेस प्रतिभा पाटिल व भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जन तांत्रिक गठबंधन के समर्थित निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने वाले भैरोसिंह शेखावत के बीच सीधी टタकर है, जिसमें वोटों के गणित के आधार प्रतिभा पाटिल का पलड़ा निश्चित रूप से काफी भारी है।
हालांकि अपने-अपने राज्यों के मतदाताओं द्वारा ठुकरा देने के कारण वहां की राजनीति के हाशिए पर पहुंच गए आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला उत्तर-प्रदेश के पूर्व मुチयमंत्री मुलायम सिंह यादव व अन्य ने अगले राष्ट्रपति के रूप में वर्तमान राष्ट्रपति डॉ ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का नाम उछालकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास किया है। अपनी निश्चित पराजय सामने देखकर भैरोसिंह शेखावत ने भी कह दिया कि अगर श्री कलाम चुनाव लड़ते हैं तो वह उनके समर्थन में मैदान से हट सकते हैं ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने यह कहकर इन सभी के मंसूबों पर पानी फेर दिया कि जीत सुनिश्चित होने पर ही वह चुनाव मैदान में उतरेंगे। जाहिर सी बात है कि कलाम साहब यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कांग्रेस एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों व उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा प्रतिभा पाटिल की उम्मीदवारी के नामांकन पत्र हस्ताक्षर करने के बाद अब इस मामले में उनका पीछे हटने का सवाल ही नहीं पैदा होता है।
गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख सहयोगी दल शिवसेना ने ही सबसे पहले डॉ.ए.पी.जे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप मे दूसरी पारी का मौका दिए जाने का प्रबल विरोध किया था जिसकी वजह से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दूसरे घटक दलों ने भी इस मामले पर मौन साध लिया था। विभिन्न मुद्दों पर मतभेद होने की वजह से वाममोर्चा भी अब्दुल कलाम को दूसरी बार राष्ट्रपति के पद पर बिठाने के पक्ष में नहीं हैं। इस तथ्य के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी की ओर से श्री कलाम को दुबारा राष्ट्रपति पद पर बिठाने की मांग करने के पीछे एक ही कारण नजर आता है वह कि अपनी पराजय सामने देखकर भारतीय जनता पार्टी के नेता उससे बच निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं राष्ट्रपति के रूप में डॉ कलाम की योग्यता पर किसी को शक नहीं होना चाहिए।
इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि अगर वह चुनाव लड़ने का फैसला ले लेते हैं तो सभी राजनैतिक दलों के नेता दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनका समर्थन करेंगे। मगर श्री कलाम ने अभी तक अपने आचरण से जिस प्रकार से संवैधानिक प्रमुख के पद को जो गरिमा प्रदान की है और देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सミमान अर्जित किया है उसे देखते हुए यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह ऐसा कोई कदम उठायेंगे, जिससे लोगों को यह महसूस होने लगे कि डॉ. कलाम भी सात्तालोलुप राजनेताओं की तरह कुर्सी के भूखे हैं। यह सही है कि डॉ. कलाम ने एक गैर राजनीतिक व्यक्ति होने के बावजूद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और एस. राधाकृष्णन जैसे चिंतक व विचारकों की तरह राष्ट्रपति पद को शोभित कर उसे गरिमा प्रदान की है।
उन्होंने इस पर रहते जिस प्रकार का उदाहरण पेश किया है वह अपने आप में एक मिसाल है। उनकी परंपरा को आगे बढ़ाना अगले राष्ट्रपति के लिए न केवल चुनौती पूर्ण होगा बल्कि लोग उसके कामों की भी डॉ. कलाम की उपलब्धियों से तुलना करेंगे। होना तो यह चाहिए कि राष्ट्रपति के रूप में इनके द्वारा किए गए कार्यों को देखते हुए सभी राजनीतिक दल डॉ कलाम को दुबारा से राष्ट्रपति बनाने का फैसला लेते मगर अपने-अपने राजनीतिक कारणों से उन्होंने ऐसा नहीं किया। दिलचस्प बात तो यह है किदेश की पहली महिला राष्ट्रपति देने पर अपनी पीठ थपथपाने और अपने मास्टर स्ट्रोक से विपक्ष को धराशायी करने वाली कांग्रेस की भी पहली पसंद प्रतिभा पाटिल नहीं थी बल्कि इस पद के लिए उसकी झोली में गृहमंत्री शिवराज पाटिल से लेकर प्रणव मुखर्जी, डा. कर्ण सिंह से लेकर अन्य तमाम नेताओं के नाम मौजूद थे।
मगर वाममोर्चा नेताओं इन सभी नामों को सिरे से खारिज करने के बाद उसने प्रतिभा पाटिल का नाम निकाला जिस पर वामदलों के नेता भी सहमत हो गए। इस प्रकार से देश में पहली बार किसी महिला के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचने के लिए रास्ता साफ हो गया। कहा यह जा रहा है कि प्रतिभा पाटिल की उनकी अन्य योग्यताओं के बावजूद इसलिए प्रत्याशी बनाया गया है क्योंकि वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उनके परिवार के प्रति वफादार रही हैं। उम्मीदवारों के चयन के समय सोनिया गांधी ने व्यक्तिगत वफादारी और निष्ठा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। बावजूद इसके सोनिया गांधी को इस श्रेय से वंचित नहीं किया जा सकता कि एक महिला को राष्ट्रपति पद तक पहुंचा कर भारतीय लोकतंत्र व महिलाओं को गर्व करने लायक अवसर उपलब्ध कराया है।
यह सही है कि सोनिया गांधी के सामने इस बात की मजबूरी थी कि देश का अगला राष्ट्रपति ऐसा होना चाहिए जो कि न केवल इस पद के योग्य हो बल्कि वह उनके प्रति पूरी तरह से वफादार भी हो। क्योंकि देश में 2009 में आम चुनाव होने हैं और पार्टी यह अच्छी तरह से समझ चुकी है कि केंद्र और राज्यों में किसी एक दल के पूर्ण बहुमत हासिल करने के दिन कब के लद चुके हैं। अब केंद्र व राज्यों में गठबंधन सरकारों का जमाना है जिनके गठन में राष्ट्रपति अहम भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह है कि जहां कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति के धर्म की पसंद नापसंद का ध्यान है, वही व्यक्तिगत वफादारी को पैमाना बनाया है।
खंडित जनादेश व गठबंधन की राजनीति के वर्तमान दौर में राष्ट्रपति पद पर बैठा व्यक्ति सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अगर राष्ट्रपति अपना है तो उस पार्टी का काम काफी आसान हो जाता है। यही वजह है कि जहां कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए अपनी ओर से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है, वहीं प्रतिभा पाटिल का नाम सामने आने से पहले उम्मीवार के बारे में कांग्रेस व वामदलों के बीच पैदा हुए मतभेद का लाभ उठाने के लिए भाजपा ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लंबा राजनीतिक अनुभव रखने वाले भैरों सिंह शेखावत को मैदान में उतारने का फैसला लिया था तब उम्मीद यह की जा रही थी कि अपनी छवि व व्यक्तिगत संपर्को के बल पर श्री शेखावत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के घटक दलों के वोटों में सेंध लगाकर अप्रत्याशित चुनाव परिणाम देने में सफल हो जाएंगे।
मगर कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को उम्मीदवार बनाकर इन सभी उममीदों पर पानी फैर दिया है। वैसे होना तो यह चाहिए था कि संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए सभी राजनीतिक दल राष्ट्रपति के चुनाव को दलगत राजनीति के दांव पेंच का अखाड़ा बनाने के बजाय आम सहमति से केवल योग्यता को ध्यान में रखकर ही देश के संवैधानिक मुखिया का चुनाव करते।
ताकि वह भी निष्पक्ष ढंग से अपने संवैधानिक र्काव्य व दायित्व का निर्वाह करता। जब राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का चयन राजनीतिक दल और वोट के गणित के आधार पर होगा तो फिर वह अपने दल के हितों का ध्यान तो रखेगा ही। अगर देश का अगला राष्ट्रपति ऐसा ही करे तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

देश की सर्वाधिक सुरक्षित तिहाड़ जेल और चर्चाओं का चोली दामन जैसा संबंध है। कभी चार्ल्स शोभराज के अपने साथियों सहित अभेद समझी जाने वाली जेल में सेंध लगाकर फरार हो जाने की वजह से तिहाड़ की चर्चा होती है तो कभी इसकी महानिरीक्षक किरण बेदी द्वारा लागू किए गए सुधार कार्यक्रमों को अंतराष्ट्र्रीय स्तर पर मान्यता मिलने और उन्हें सミमान से नवाजे जाने के कारण तिहाड़ के नाम की गूंज सुनाई देती है।
किरण बेदी के तिहाड़ से जाने के बाद उनके द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रमों को वहां जारी रखा गया। समय-समय पर तिहाड़ में आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रम व समारोह में चर्चित हस्तियों को शिकरत करने की वजह से भी तिहाड़ जेल का नाम सुर्खियों में बना रहता है। इन दिनों भी तिहाड़ जेल का नाम मीडिया में जबदस्त तरीके से छाया हुआ है। यह बात दीगर है कि चर्चा का विषय इस इस बार वहां नए सुधार कार्यक्रम शुरू करना नहीं बल्कि वहां आए दिन कैदियों की हो रही मौते हैं।
इन मौतों के मामले को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्र्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम ने जेल का दौरा किया है और दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की है। यह समिति जेल के हालात का जायजा लेने के बाद अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। तिहाड़ जेल में एक के बाद कैदियों की मौत के बारे में जेल प्रशासन ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ने का प्रयास किया है कि कैदियों की मौत गर्मी व बीमारी के कारण हुई हैं जबकि वास्तविकता कुछ और ही कह रही है। सबसे बड़ा कारण तो इस जेल में क्षमता से ज्यादा संख्‍या में कैदियों का रखा जाना है। इस जेल की क्षमता 6200 कैदियों की है जबकि वहां 13725 कैदी रखे गए हैं। जिसका असर जेल में उपलホध सुविधाओं पर पड़ रहा है। चीफ मेट्रोपोलिटिन मैजिस्ट्रेट डॉ. कामिनी ला ने उच्च न्यायालय को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कहा है कि तिहाड़ जेल में कैदियों की मौतों का कारण वहां मौजूद अव्यवस्था और उनके साथ अमानवीय व्यवहार करना है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि तिहाड़ जेल में कैदियों के साथ मारपीट करना, कैदियों से अवैध वसूली और उन्हें प्रताडि़त करना आम बात है। जेल में पेयजल की स्थिति ठीक नहीं है। इतना ही नहीं जेल में जो जलापूर्ति की जा रही है वह भी स्वास्थ्य की दृष्टि से सही नहीं है। जेल में कैदियों को लू व भीषण गर्मी से बचाने के भी पुख्‍ता इंतजाम नहीं किए गए हैं। जेल में मादक पदार्थों की आपूर्ति भी धड़ल्ले से हो रही है।
हालांकि हर बार की तरह जेल प्रशासन इन बातों को सिरे से नकार रहा है और कैदियों की मौत का कारण गर्मी व बीमारी को बता रहा है। मगर उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जेल में बंद कैदियों के शरीर पर चोटों के निशान कैसे मिले हैं और गंभीर रूप से बीमार कैदियों को समय रहते चिकित्सा सुविधाएं क्‍यों मुहैया नहीं कराई गई। इससे विडंबना ही कहेंगे कि साधारण कैदी तो सुविधाओं के अभाव में जेल में दम तोड़ रहे हैं जबकि प्रभावशाली कैदी तिहाड़ जेल में ही हर किस्म की सुविधाएं भोगते हुए सेटेलाइट फोन के जरिए जेल से ही अपना धंधा चला रहे हैं।
इतना ही नहीं इन लोगों केञ् लिए शराब से लेकर मुर्गे तक का जेल के भीतर ही आसानी से इंतजाम हो जाता है। हां इस काम के लिए पैसे अवश्य खर्च होते हैं और पैसे की ऐसे कैदियों के पास कोई कमी नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तिहाड़ के हालात का जायजा लेने के लिए जो उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की है उम्‍मीद की जानी चाहिए कि उसकी रिपोर्ट से तिहाड़ की सही तस्वीर उभर कर सामने आएगी और अदालत उसी के आधार पर दिल्ली सरकार व जेल प्रशासन को उचित व्यवस्था करने के निर्देश देगी।
साथ ही यह आशंका भी है कि इस समिति की रिपोर्ट का हश्र भी दूसरी समितियों की रिपोर्ट जैसा ही हो और तिहाड़ जेल में कैदियों की मौतों का सिलसिला ऐसे ही चलता रहे। हमारे यहां हर बड़े हादसे के बाद उसकी जांच के लिए समिति गठित कर दी जाती है और उसकी रिपोर्ट पर क्‍या कार्रवाई हुई इसका किसी को भी पता नहीं चलता है। कहीं तिहाड़ के मामले में ऐसा ही न हो।
कैदियों को वैसे तो तिहाड़ जेल में सुविधाएं मुहैया कराने और उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की वकालत करने का पुराने कायदे कानून से बंधे लोग विरोध कर सकते हैं क्‍योंकि उनकी नजर में कानून तोड़ने के आरोप में सजा पाने वाले कैदियों को सजा के दौरान कष्टों का सामना करना ही चाहिए। ताकि जेल से बाहर निकलने पर ऐसे लोग दुबारा से अपराध की दुनियां में कदम रखने की हिम्‍मत न जुटा सकें। ऐसे लोगों की नजर में सजा पाने वाले अपराधी या विचाराधीन कैदियों के मन में जेल के प्रति ऐसा खौफ बिठा दिया जाए जिससे वह यहां आने के नाम से कांपने लगे।
कैदियों के साथ इस तरह का व्यवहार करने की सिफारिश करने वाले यह भूल जाते हैं कि इस व्यवस्था पर छोटे-मोटे अपराध की वजह से सजा भुगतने के लिए जेल आने वाला व्यक्‍ति वहां की हालात देखकर व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना से भर उठता है।
इतना ही नहीं वह जेल से बंद पड़े और खुंखार किस्म के अपराधियों के संपर्क में आकर वहां से अपराधों का पूरा प्रशिक्षिण लेकर लौटता है और बहार आते ही आदी मुजरिम की तरह काम करने लगता है।
इसे देखते हुए मनोचिकित्सकों ने कैदियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने और जेलों को सजाघर के बजाय सुधारगृह बनाने पर बल दिया था। जिस पर अमल करते हुए तिहाड़ में कैदियों को सुविधा मुहैया कराने और उनका ध्यान रचनात्मक कार्यो की ओर लगाने के लिए अनेक कदम उठाऐ थे। जिनके बेहतर परिणाम सामने आए थे। जेल प्रशासन और दिल्ली सरकार को चाहिए कि वह तिहाड़ जेल के कैदियों की मौतों के मामले को गंभीरता से लेते हुए बिना लीपापोती के वहां हालात सुधारने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए। कहीं ऐसा न हो कि उनके हाथ पर हाथ धर कर बैठने की वजह से और भी कैदी असमय काल कलपित हो जाएं।

अपने मुवकिल को बचाने के लिए वकील कानूनी दावपेच के अलावा तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वह जिरह के दौरान गवाह को झूठा साबित करने से लेकर उसके द्वारा दी गई जानकारी और तथ्यों को गलत साबित करने का भी प्रयास करते हैं। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। जिस प्रकार से डॉक्‍टर का कर्तव्य अपने मरीज के प्राणों की रक्षा करना है। ठीक उसी प्रकार वकील का कर्तव्य अपने मुवकिल को अभियोजन पक्ष की ओर से बनाए गए गलत मामले के कानूनी फंसे से निजात दिलाना है। मगर जब वकील अपने प्रभावशाली मुवकिल को बचाने के लिए कानून के साथ खिलवाड़ करने और उसकी मूल भावना को ही ठेस पहुंचाने लगे तो उनके इस कृत्‍य को पेशेगत कर्तव्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायिक तंत्र की मूल धारणा को चोट पहुंचाने और जनता का कानून के प्रति भरोसा तोड़ने का काम करने पर वकील भी आम आदमी जितने ही नहीं बल्कि इससे भी ज्यादा दोषी हैं क्‍योंकि वह कानून के जानकार होते हैं। इस नाते वह भलि भांति जानते हैं कि उनके गलत आचरण करने का किसी भी मुकदमे पर क्‍या असर पड़ सकता है। बहुचर्चित बी.एम. डब्‍ल्यू. हादसे के मामले, जिसमें छह निर्दोष व्यक्‍तियों की मौत हो गई थी और इतने ही घायल हो गए थे के मुख्‍य आरोपी संजीव नंदा को बचाने के लिए बचाव पक्ष के वकील आर.के. आनंद और अभियोजन पक्ष के वकील आई.यू. खान ने जिस तरह की जुगलबंदी दिखाई है उसने आम आदमी के विश्वास को पूरी तरह से हिला दिया है। संजीव नंदा को कानून के फंदे से बचाने के लिए अभियोजन पक्ष के वकील आई.यू. खान ने बचाव पक्ष के वकील आर.के.आनंद के साथ मिलकर इस मामले के एकमात्र चश्मदीद गवाह को खरीदने का प्रयास किया। ऐसा करते समय शायद आई यू.खान यह भूल गए कि अभियोजन पक्ष का वकील होने के नाते उनका कर्तव्य मामले के आरोपी के खिलाफ इस प्रकार के पुख्‍ता सबूत पैदा करना था, जिससे वह कानून के शिकंजे से बचने न पाए और पीडि़तों को पूरा इंसाफ मिले। मगर उन्होंने ऐसा करने के बजाय चश्मदीद गवाह को इस बात के लिए तैयार करने का प्रयास किया जिससे वह अदालत में गलत बयानी करे और मुख्‍य आरोपी साफ बच जाए। इस मामले का सनसनीखेज खुलासा खुद चश्मदीद गवाह ने एक स्टिंग ऑप्रेशन के दौरान किया है। हालांकि बार-बार बयान बदलने के कारण उसकी खुद की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में है। बावजूद इसके उसने खुफिया कैमरे के जरिए बचाव पक्ष व अभियोजन पक्ष की मिली-भगत का जिस तरह से पर्दाफाश किया है, उसके बारे में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं रह जाता है। यह मामला प्रकाश में आने के बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने आर.के. आनंद व आई.यू. खान को एसोसिएशन की सदस्यता से निलंबित कर दिया है। मगर उनके वकालत करने और केस लड़ने पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया है। हो सकता है कि एसोसिएशन को कानूनी रूप से ऐसा करने में अड़चन आ रही होगी। फिर भी वह इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्‍य न्यायधीश और रजिस्ट्रार को आर.के. आनंद और आई.यू. खान के वकील को खरीदने की कोशिश करने की जानकारी देने के साथ ही उनके मुकदमा लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की संस्तुति करनी चाहिए थी। ऐसा करने से एसोसिएशन की गरिमा और भी बढ़ जाती और लोग भी वकीलों को इज्जत की नजरों से देखते। एसोसिएशन ने अगर आर.के. आनंद और आई.यू. खान के रुतबे को देखते हुए ऐसा नहीं किया तो सर्वोच्च न्यायालय को इस मामले में स्व-विवेक के आधार पर संज्ञान लेते हुए इन दोनों वकीलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी। ताकि भविष्य में कोई दूसरा वकील पेशे को कलंकित करने जैसा कदम उठाने की हिम्‍मत न कर सके। वैसे भी कार्यपालिका व विधायिका के साथ ही आज न्यायपालिका पर भ्रष्टचार के आरोप लगते जा रहे हैं। इन अरोपों को प्रभावशाली व्यक्‍तियों से जुड़े मामले में वकील से लेकर न्यायधीश की संदिग्ध भूमिका ने और भी पुख्‍ता किया है। इतना ही नहीं केन्‍द्रीय विधि मंत्री और भारत के मुख्‍य न्यायधीश ने भी यह स्वीकार किया है कि न्याय तंत्र में भ्रष्टाचार है। मगर विडंबना तो यह है कि इन दोनों ने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए स्वायतशासी तंत्र बनाने से इंकार किया है। पिछले कुछ अर्से के दौरान नागरिक सुविधा, कानून का पालन न होने, अवैध निर्माण, सार्वजनिक स्थल पर हुए अतिक्रमण व जन स्वरूप से जुड़े मामलों में संज्ञान लेकर जनता को राहत पहुंचाने वाले आदेश जारी किए हैं। जिससे कार्यपालिका व विधायिका के उपेक्षापूर्ण रवैये से निराश आम आदमी को यह आस बंधी थी कि न्यायपालिका तो उसके अधिकारों की रक्षा करने के लिए है। जागरूक और सक्रिय न्यायपालिका के हाथ में आम आदमी के हित व अधिकार सुरक्षित हैं। इससे आम आदमी के मन में न्याय के मंदिर रूपी अदालतों में विश्वास पुख्‍ता हुआ और पीडि़त लोग यह समझने लगे कि अदालत में तो उनके साथ अवश्य इंसाफ होगा। मगर आर.केञ्. आनंद व आई.यू. खान जैसे वकील की आपसी साठगांठ से अभियुक्‍त को बचाने के प्रयासों का खुलासा हो जाने के बाद आम आदमी के विश्वास को ठेस पहुंचती है और वह सोचने लगता है कि न्याय तंत्र भी कार्यपालिका व विधायिका के मार्ग का अनुसरण कर रहा है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि आम आदमी के विश्वास को बहाल करने और न्यायपालिका के प्रति उसकी आस्था की भावना को मजबूती प्रदान करने के लिए न्यायपालिका गलत हथकंडे अपनाने व अभियुक्‍त को सजा से बचाने का प्रयास करने वाले वकीलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे।

राजस्थान की मुख्‍यमंत्री महारानी वसुंधरा राजे और महाराष्ट्र के मुख्‍यमंत्री विलासराव देशमुख के बीच वैसे तो कोई समानता नहीं है। दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग है और राजनीतिक विचारधारा भी। वसुंधरा राजे का जन्म व लालन-पालन राजघराने में हुआ। वह भारतीय जनता पार्टी की नेत्री हैं। जबकि विलासराव देशमुख का जन्म आम परिवार में हुआ है और वह भाजपा की धुरविरोधी कांग्रेस के नेता हैं। मगर एक मामले में दोनों के बीच जबरदस्त समानता है। दोनों के ही समर्थकों ने उन्हें भगवान के रूप में दर्शाया है। जिस पर दोनों ने ही कोई आपति प्रकट नहीं की है। यह बात दीगर है कि उनके इस रूप को देखकर राजनीतिक बवाल पैदा हो गया है। मगर दोनों के कद को ही देखकर उनकी पार्टियां उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने में फिलहाल अपने को असमर्थ पा रही हैं।ऐसा लगता है कि वसुंधरा राजे और विवादों का चोली दामन का साथ बन गया है। वह विवादों में पड़ना नहीं चाहती है जबकि विवाद है कि उनके पीछे-पीछे चल आते हैं। वह विवादों से बचने के लिए राजस्थान छोड़कर बैंगलूर जाती हैं और दिल बहलाने के लिए ‘फैशनन-शो’ के रैंप पर उतरती हैं, तब भी उनके विरोधी इसे मुख्‍यमंत्री की मर्यादा के विरुद्घ आचरण बताते हुए बखेड़ा कर देते हैं। हालांकि रैंप पर उतरने को वसुंधरा राजे बिलकुल भी गलत नहीं मानतीं बल्कि इसे व्यक्‍तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मसला बताती हैं।अभी यह मामला ठंडा नहीं पड़ा था कि एक विदेशी मेहमान को राजस्थान की मुख्‍यमंत्री ने जादू की झप्पी देकर अपने विरोधियों को आस्तीनें चढ़ाने का एक और मौका दे दिया। पिछली बार की तरह वसुंधरा राजे ने इस बार भी अपनी हरकत को गलत नहीं माना। उनका कहना था कि उन्होंने विदेशी पर्यटन और निवेश को बढ़ावा देने के लिए विदेशी मेहमानों को राज्य में आमंत्रित किया था। विदेशी मेहमान का उन्हीं के तौर तरीके के अनुसार स्वागत करना बुरी बात नहीं है। विदेशी संस्कृति के रंग में रंग जाने और भारतीयता का मखौल उड़ाने का आरोप लगाने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे ने इस बार अपने समर्थकों के जरिए ऐसा कलेंडर छपवाया है, जिसमें मुख्‍यमंत्री को देवी के रूप में दर्शाया गया है। इस बार भी उनके विरोधियों की भृकुटि तन गई है। इस बार तो भाजपा प्रवक्‍ता ने भी इनके समर्थकों के इस कृत्‍य की आलोचना की है। मगर उनके खिलाफ कार्रवाई करने की संभावना के बारे में वह भी चुप्पी साध गए हैं। अगर राजस्थान में मुख्‍यमंत्री के समर्थकों ने उन्हें देवी के रूप में दर्शाया है, तो महाराष्ट्र के मुख्‍यमंत्री विलासराव देशमुख के समर्थक भी उनके प्रति अपनी निष्ठ व भक्‍ति प्रकट करने के मामले में पीछे नहीं हैं। उन्होंने तो मुंबई में जो पोस्टर लगाया है उसमें विलासराव देशमुख को कृष्ण के रूप में दिखाया है। इस पोस्टर में मुख्‍यमंत्री ने महाराष्ट्रवासियों की रक्षा के लिए अपने हाथ में गोवर्धन पर्वत उठा रखा है। इस तरह का पोस्टर बनवाने वाले शायद जुलाई 2005 में मुंबई में वर्षा के कारण हुई उस तबाही को भूल गए हैं, जिसमें सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो गई थी और हजारों बेघर हो गए थे। उस प्रलयंकारी वर्षा के दौरान राज्य सरकार और खासकर मुख्‍यमंत्री पूरी तरह से असहाय नजर आए थे।कृष्‍ण रूपी मुख्‍यमंत्री विलासराव देशमुख को गोवर्धन पर्वत उठाते हुए पोस्टर बनाने वालों ने एक तरह से मुंबईवासियों के जख्‍मों को हरा करने के साथ ही उन पर नमक छिड़कने का काम किया है। अगर विलासराव देशमुख ने मुख्‍यमंत्री के रूप ने ऐसे कदम उठाए होते जिससे मुंबईवासियों को जुलाई 2005 की तबाही का सामना न करना पड़ता तो एक पल के लिए उनकेञ् कृष्‍ण का रूप धारण करने को शायद पचाया जा सकता था। यह पहला अवसर नहीं है कि जब राजनेताओं के समर्थकों ने उन्हें साक्षात भगवान बताने का प्रयास किया है। राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लिए यह नई बात जरूर है। अभी तक तो दक्षिण भारत के राज्यों की जनता खासकर तमिलनाडू व आंध्र प्रदेश के लोग ही अपने प्रिय अभिनेता द्वारा फिल्मों में उनकी भूमिकाओं के कारण न केवल उन्हें भगवान की तरह पूजते थे बल्कि उन्हें इसी श्रेणी में रखते थे। ऐसे राजनेताओं में तमिलनाडू के मुख्‍यमंत्री स्व. एम.जी.रामचंद्रन व आंध्र प्रदेश के मुख्‍यमंत्री स्व. एन.टी. रामाराव का नाम सर्वोपरि है। खास बात यह है कि उन दोनों ने ही न केवल फिल्मों में बुराई का अंत करने वाले पात्र की भूमिकाएं निभाई बल्कि इन्होंने फिल्मों में भगवान के स्वरूप को भी साकार किया। राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय होने के बाद भी इन नेताओं ने जनहित संबंधी कार्य कर और अपने-अपने राज्य की जनता के हितों की रक्षा के मामले को लेकर केन्‍द्र सरकार के साथ टकराव का रास्ता अक्‍तियार कर अपनी छवि को न केवल बरकरार रखा बल्कि उसे निखारने का काम भी किया। इन दोनों ने ही समय-समय पर यह भी साबित किया कि अपने-अपने राज्य की जनता के हितों की रक्षा के लिए वह मुख्‍यमंत्री की गद्दी को भी कुर्बान कर सकते हैं। उनकी जनता के बीच हितैषी की छवि और उनके कार्यों की वजह से उनके विरोधी भी उनको भगवान का अवतार घोषित करने का विरोध नहीं कर पाए। मुख्‍यमंत्री के तौर पर एम.जी. रामचंद्रन व एन.टी.रामराव ने जो काम किये थे उनकी वजह से तमिलनाडू व आंध्र प्रदेश की जनता आज तक भी उन्हें नहीं भूली है। इन दोनों राज्यों में राजनीति में आने वाला व्यक्‍ति एम.जी. रामचंद्रन व एन.टी. रामराव के नाम का सहारा लेकर ही चुनाव की वैतरणी पार कर सकता है। इन दोनों के जिक्र के बिना उनके राज्यों में राजनीतिक चर्चा कर पाना लगभग असंभव है। अगर इन्हीं की तरह वसुंधरा राजे व विलासराव देशमुख अपने-अपने राज्य की जनता के दिलों पर राज करना चाहते हैं तो उन्हें भी एम.जी.रामचंद्रन व एम.टी. रानाराव का अनुसरण करते हुए जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए स्वार्थों से ऊपर उठकर काम करने होंगे। वरना पोस्टर चिपकवाने या कलैंडर छपवाने मात्र से कोई इन्हें भगवान नहीं मान लेगा।

विद्वान अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केन्‍द्र की संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के तीन साल का कार्यकाल पूरा होते-होते प्रधानमंत्री और कांग्रेस दोनों का ही रंग उतरने लगा है। हाल ही में हुए राज्य विधानसभाओं के चुनाव और संप्रग सरकार की कार्यशैली व लोकप्रियता के बारे में आम जनता की राय जानने के लिए कराए गए सर्वेक्षण तक में यह बात साबित कर दी है। यह सही है कि आर्थिक विकास की दर में अपेक्षित बढ़ोतोरी हुई है। मगर इससे न तो बेतहाशा बढ़ती महंगाई पर अंकुश लग पाया और न ही आम आदमी तक इसका लाभ पहुंचा है। ऐसे में मनमोहन सिंह सरकार के खेल एवं पंचायतीराज मंत्री मणिशंकर अय्यर की यह चिंता अस्वाभाविक नहीं है कि अगर केन्‍द्र सरकार ने महंगाई पर काबू पाने के लिए अपनी आर्थिक नीतियों में परिवर्तन नहीं किया तो आदमी के मन में उनके प्रति आक्रोश बढ़ता ही जाएगा। जिसका खामियाजा कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान भुगतना पड़ सकता है। वैसे भी यदि हम केन्‍द्र सरकार के तीन साल के कार्यकाल पर नजर डालें तो उसके खाते में उपलब्धियों की तुलना में नाकामियां अधिक नजर आती हैं। सरकार अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार को अपनी महानतम उपलब्धि बता रही थी। मगर इस पर अभी संदेह के बादल बरकरार हैं। अमेरिका कभी भारत के ईरान के साथ संबंधों को लेकर इस करार की आड़ में उसकी संप्रभुता को चुनौती देता नजर आता है तो कभी वह भारत के शांतिपूर्ण परमाणु की राह में अड़ंगा डालने का प्रयास कर रहा है। जिसकी वजह से ऐसा लगता है कि अमेरिका के साथ करार कर भारत विचित्र सी स्थिति में फंस गया है। इस समझौते की वजह से प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को विपक्ष के साथ-साथ संप्रग में शामिल दलों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ रहा है। कुशल एवं योग्य अर्थशास्त्री के नेतृत्व वाली सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण महंगाई पूरी तरह से बेकाबू हो गई है। महंगाई के बोझ से कराह रही जनता अब अपनी नाराजगी चुनावों में सार्वजनिक तौर पर जाहिर करने लगी है।हैरानी की बात तो यह है कि काबिल अर्थशास्त्री होने और पी. चिदंबरम व मौंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे योग्य सिपहसालार होने के बावजूद प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह महंगाई को थामने में सक्षम नीतियां बनाने में असमर्थ साबित हुए हैं। इतना ही नहीं वह आर्थिक सुधारों को गति देने और उनका लाभ आम जनता तक पहुंचा पाने में भी विफल साबित हुए हैं। यह वास्तव में एक गंभीर चिंता का विषय लगता है।वैसे देखा जाए तो मणिशंकर अय्यर ने इन्हीं मुद्दों को लेकर अपनी सरकार को चेताया है। पर लगता है कि ऐसा करते समय वह इस कहावत को भूल गए कि शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारा करते। मणिशंकर अय्यर तो खुद ही शीशे के इस घर में रह रहे हैं, जिस पर पत्थर मारकर वह घर के मुखिया (प्रधानमंत्री) पर निशाना साध रहे हैं। वैसे भी केन्‍द्रीय मंत्री होने के नाते मणिशंकर अय्यर भी संप्रग सरकार की नाकामी का अपयश लेने और सामूहिक दायित्व की जवाबदेही से बच नहीं सकते। अगर वह मनमोहन सिंह सरकार से वास्तव में इस कदर खफा हैं कि उसकी सार्वजनिक तौर पर आलोचना करना उनकी मजबूरी बन गया है तो उन्हें नैतिकता केञ् तकाजे केञ् मद्देनजर पहले केन्‍द्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था और इसके बाद सरकार पर निशाना साधना चाहिए था।इससे ऐसा लगता है कि संप्रग सरकार और खास कर प्रधानमंत्री पर आक्रमण भले ही मणिशंकर अय्यर ने किया है। मगर उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करने वाला कोई और ही है। कांग्रेस के जानकारों पर भरोसा करें तो मणिशंकर अय्यर ने ऐसा पार्टी सुप्रीमों सोनिया गांधी के इशारे पर ही किया है। पार्टी सुप्रीमों के वरदहस्त के बिना मणिशंकर अय्यर सरीखा राजनीति का मंजा हुआ खिलाड़ी इस प्रकार का कदम उठाने की भूल नहीं कर सकता था। दरअसल सोनिया गांधी के ऐसा करवाने के पीछे भी दो वजह हैं एक तो वह पार्टीजनों को यह संदेश देना चाहती थी कि देश की जनता में कांग्रेस के प्रति नाराजगी पैदा हुई है उसका प्रमुख कारण संप्रग सरकार की गलत आर्थिक नीतियां हैं। इसका प्रमुख कारण है जनता को यह संदेश देना कि प्रधानमंत्री अक्षम साबित हुए हैं। इसलिए अब समय की मांग है कि नेहरु गांधी परिवार के हाथ में ही एक बार फिर से देश की बागडोर सौंप दी जाए। देखने वाले तो इसे उत्‍तर-प्रदेश चुनावों के दौरान कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी द्वारा दिए गए इस बयान से भी जोड़ रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं है। क्‍योंकि उस वタत इस तरह का बयान देने की कोई जरुरत नहीं थी। ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी केञ् प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की राह में आने वाली अड़चनों को दूर करने की नीयत से ही मणिशंकर अय्यर के जरिए संप्रग सरकार और इसके मुखिया डा. मनमोहन सिंह पर वाक्‍य बाण छुड़वाए हैं। अगर यह मान लिया जाए कि राहुल गांधी उम्र के लिहाज से अभी प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हैं तो भी सोनिया यह साबित करने में सफल तो रही ही है कि मनमोहन सिंह न केवल कमजोर प्रधानमंत्री है बल्कि पार्टी के साथ-साथ सरकार की बागडोर भी सोनिया जी के हाथ में है। इसका जीता जागता प्रमाण है मणिशंकर अय्यर का मंत्री पद पर बने रहना। डा. मनमोहन सिंह के स्थान पर अगर कोई दूसरा व्यक्ति इस पद पर होता तो सरकार के खिलाफ विपक्ष की भाषा बोलने वाले को कभी का मंत्रिपरिषद से बाहर का रास्ता दिखा देता। इससे न केवल डा. सिंह की कमजोर प्रधानमंत्री की छवि मजबूत हुई है बल्कि इस बात को भी बल मिलता है कि मणिशंकर अय्यर ने जो भी कहा है वह पार्टी सुप्रीमो के इशारे पर ही कहा है।वैसे भी कांग्रेस खास कर नेहरु गांधी परिवार की यह रणनीति रही है कि किसी भी कद्दावर नेता पर अपने खास सिपहसालार के जरिए हमला कराया जाए। अगर वह मामला तूल पकड़े तो सार्वजनिक तौर पर सिपहसालार से जवाब-तलब कर लिया जाए और अकेले में इसकी पीठ थपथपा कर हौंसला अफजाई कर दी जाए ताकि जरुरत पड़ने पर उसका दुबारा से इस्तेमाल किया जाए।यदि इन सब तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया जाए तो भी हकीकत तो यही है कि अगर सरकार ने वोट बैंक केञ् मद्देनजर दलित व मुस्लिम तुष्टीकरण पर सारा ध्यान केन्द्रित करने के बजाय महंगाई को रोकने के उपाय नहीं किए गए तो उसके लिए अगले दो साल का समय पूरा कर पाना मुश्किल हो जाएगा। सरकार की नीतियों से खफा होकर तेलंगाना राष्टीय अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एएमडीएमकेञ्) व समाजवादी पार्टी संप्रग का साथ छोड़ चुकी है। सरकार के प्रमुख सहयोगी वामदल खासकर भारतीय कम्‍यूनिस्ट पार्टी के नेता भी आए दिन समर्थन वापिस लेने पर विचार करने की धमकी देते रहते हैं। इतना ही नहीं संप्रग के सबसे बड़े हितैषी लालू प्रसाद यादव भी सरकार को बढ़ती महंगाई व मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के प्रति आगाह कर चुके हैं। अब देखना यह है कि खेल एवं पंचायतीराज मंत्री मणिशंकर अय्यर की चेतावनी को गंभीरता से लेते हुए केन्‍द्र सरकार महंगाई रोकने व आम आदमी को राहत पहुंचाने के लिए तुरंत ही प्रभावशाली कदम उठाती है या फिर अपने पुराने ढर्रे पर ही चलती रहेगी।