भ्रष्टाचार को रोकने में अक्षम सरकार को भ्रष्टाचार करने की मान्यता दे देनी चाहिए (अंक - 32)
Mar 18th, 2007 by admin
लोकतंत्र के सशक्त स्तंभ न्यायपालिका को भ्रष्टाचार धीरे-धीरे खोखला करता जा रहा है। सरकार यह तो मानती है कि न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की उसे रिपोर्ट मिल रही है। मगर वह भ्रष्ट न्यायपालिका की जांच के लिए कोई आयोग या समिति बनाने में अक्षम बता रही है। विधि एवं न्यायमंत्री हंसराज भारद्वाज के लोकसभा में दिए गए इस आशय के बयान से सरकार की लाचारी प्रकट होती है। ऐसा लगता है कि सरकार भ्रष्टाचार को सामाजिक मान्यता दिलाने का काम कर रही है।यह सही है कि भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें हमारी व्यवस्था में घुस चुकी है। जिन्हें आसानी से काटना संभव नहीं है। मगर सरकार ही जब इस समस्या का समाधान खोजने के बजाय अपनी अक्षमता का बहाना बनाने लगेगी तो सवाल यह उठता है कि फिर ऐसी सरकार का काम ही क्या है?विधि एवं न्यायमंत्री हंसराज भारद्वाज के इस बयान से लगता है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के उस बयान के आगे झुक गई है, जिसमें यह कहा गया था कि अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने से न्यायधीशों के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचेगी। उनका यह भी कहना था कि न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार मामलों की जांच करने का अधिकार किसी ऐरे-गैरे व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए। एक प्रकार से देखा जाए तो मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार का बचाव करने के साथ ही इस मामले में अपनी मंशा जाहिर कर दी थी। गौरतलब है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों ही भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे हैं। जिसकी वजह से लोगों में इन दोनों के प्रति इज्जत कम हुई है। आम जनता यह मानने लगी है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों ही पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुकी हैं। ऐसे में सरकार का यह कर्तव्य बनता था कि वह न्यायपालिका को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए ठोस कदम उठाती। जिससे न्यायपालिका की गरिमा व सम्मान की रक्षा की जा सकती। इसके विपरीत विधि एवं न्याय मंत्री ने अपनी लाचारी जता कर यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार रूपी हमाम में सब नंगे हैं। हालांकि अपनी सफाई में हंसराज भारद्वाज कह सकते हैं कि उनकी सरकार न्यायपालिका से किसी प्रकार टकराव मोल नहीं लेना चाहती। इसलिए वह भ्रष्ट न्यायपालिका की जांच के लिए किसी प्रकार का आयोग या समिति गठित करने का कोई इरादा नहीं रखती है। मगर उनकी इस सफाई से भी यही संदेश जाएगा कि भ्रष्टाचार के मामले में सरकार न्यायपालिका के साथ एक प्रकार की सौदेबाजी करना चाहती है। जिसके तहत वह न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की एवज में यह चाहती है कि न्यायपालिका भी जन प्रतिनिधियों से संबंधित भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर ज्यादा तूल न दें। उल्लेखनीय है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के अनेक मंत्री दागी हैं। हंसराज भारद्वाज के इस तरह के बयान से ऐसा लगता है कि सरकार देर-सबेर नगर निगम से लेकर हर तरह के सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी मान्यता दे देगी। इससे आम नागरिकों में तो बेचैनी फैल जाएगी मगर भ्रष्टाचारियों के हौंसले बुलंद हो जाएंगे। वैसे भी जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार हाथ खड़े करती आ रही है। उससे तो बेहतर यह होगा कि सरकार भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहना दे और भ्रष्ट तरीके से अवैध कमाई करने वालों को कर के दायरे में ले आए। इससे सरकारी राजस्व भी बढ़ेगा और सरकार भ्रष्टाचारियों पर नजर रखने के लिए कामकाज जुटाने के झंझट से भी बच जाएगी। ऐसी स्थिति में उसे भ्रष्टाचार निरोधक शाखा और ऐसे ही अन्य विभागों का खर्चा भी वहन नहीं करना पड़ेगा। इतना ही नहीं इससे सरकार भी भ्रष्टाचार के मामलों पर अंकुश लगा पाने में अपनी असमर्थता जताने की शर्मिंदगी से भी बच जाएगी और लोग भी ऐसे मामलों को लेकर ज्यादा व्यथित नहीं होंगे। यदि हमें अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली को बचाना है तो इसके सभी प्रमुख स्तंभों को भ्रष्टाचार रूपी दीमक से बचाने के प्रयास करने होंगे। वैसे भी अगर न्यायपालिका भ्रष्ट हो जाएगी तो लोगों को न्याय मिलने की बची-खुची सभी उम्मीदें भी खत्म हो जाएंगी।