यह कैसी मजबूरी थी (अंक - 35)
Apr 8th, 2007 by admin
केंन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के इस कथन ‘मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल के दौरान उत्तर-प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति चरमरा गई थी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर जुल्मोसितम ढाए गए, बावजूद इसके पार्टी ने उनकी सरकार को समर्थन दिया।’ इसे जायसवाल की साफगोई कहें या उनकी मजबूरी। मगर ऐसा कहते समय वह यह भूल गए कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने और वहां निठारी जैसे नरसंहार सहित हुए सभी भीषण अपराधों के लिए मुलायम सिंह जितने दोषी हैं ठीक उतनी ही दोषी उसे समर्थन देने वाली कांग्रेस पार्टी भी है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री केवल इतना कह देने से ही अपने दायित्व से नहीं बच सकते कि राज्य में जंगलराज कायम होने के बावजूद उनकी पार्टी ने संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक कर्तव्य निर्वाह करने के उद्देश्य से मुलायम सिंह सरकार को दिया समर्थन वापिस नहीं लिया। क्योंकि राज्य की जनता बार-बार होने वाले चुनावों से बुरी तरह से आजिज आ चुकी है। इसी तथ्य के मद्देनजर कांग्रेस के मुलायम सिंह को समर्थन देना जारी रखा। श्री प्रकाश जायसवाल यह वक्तव्य देते समय शायद यह भूल गए कि गृह राज्यमंत्री होने के नाते देश में कानून व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। अगर वास्तव में उनके पास इस प्रकार की सूचनाएं थीं कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं बची और राज्य सरकार आपराधिक तत्वों को संरक्षण दे रही है। तो सवाल यह उठता है कि गृह राज्यमंत्री के नाते उन्होंने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार और कांग्रेस पार्टी का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराते हुए मुलायम सिंह सरकार को बर्खास्त करने का आग्रह क्यों नहीं किया ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि खुद श्री प्रकाश जायसवाल ने इस मामले में मुलायम सिंह सरकार को बर्खास्त करने की दिशा में पहल क्यों नहीं की? राज्य की जनता को भी यह जानने का पूरा-पूरा हक है कि केंद्र सरकार ने उसे ऐसी सरकार के रहमो-करम पर क्यों छोड़ दिया जो उनके जान-माल की रक्षा करने में असमर्थ थी। जैसे ही केंन्द्र सरकार को यह लगा कि उत्तर प्रदेश सरकार अपराधों की रोकथाम और अपराधियों को पकड़ने के अपने दायित्व का पालन नहीं कर रही है उसे तभी बर्खास्त करने की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की गई। सवाल तो ऐसे और भी हैं, जिनके घेरे में गृह राज्यमंत्री और उनकी पार्टी दोनों ही आते हैं। वैसे भी अत्याचारी का साथ देने वाला स्वयं भी उतना ही दोषी होता है, जितना अत्याचार करने वाला। इसलिए मात्र अपनी साफगाई के बल पर गृह राज्यमंत्री और उनकी कांग्रेस पार्टी इस आरोप से मुक्त नहीं हो सकती कि मुलायम सिंह सरकार को समर्थन देकर उन्होंने गलत काम किया है। जहां तक संवैधानिक दायित्व व कर्तव्य पालन की बात है तो केंद्र सरकार और खासकर गृह मंत्रालय इसका पालन करने में विफल रहा है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने मुलायम सिंह सरकार को इसलिए समर्थन दिया था ताकि वह उनकी केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का समर्थन करते रहें। दरअसल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों ही एक हाथ दे दूसरे हाथ ले की नीति पर अमल करने के तहत केंद्र व राज्य में सरकारों का समर्थन कर रहे थे। अब दोनों के रिश्तों में आई खटास आ गई, जिसकी वजह से दोनों दल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को मजबूर हो गए।एक बार फिर से श्रीप्रकाश जायसवाल के कानपुर में एक चुनावी कार्यक्रम में मुलायम सिंह सरकार के ऊपर आरोप लगाने वाले बयान पर लौटते हैं। ऐसा लगता है कि राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर मुलायम सिंह सरकार पर आक्रमण करने की झोंक में आगे बढ़ते समय शायद वह यह भूल गए कि यह मुद्दा बैक फायर भी कर सकता है। लोग राज्य में कानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत पर केंद्र सरकार के मूक रहने पर कांग्रेस से भी जबाव मांग सकते हैं। केवल आरोप लगाकर ही केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अपनी जबावदेही से मुक्त नहीं हो सकते। हां अगर उन्हें चुनाव से ऐन पहले ही इस बात की जानकारी मिली है कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था काफी बिगड़ चुकी है तो बात दीगर है। वैसे तब यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि गृह मंत्रालय के अधीनस्थ खुफिया विभाग व अन्य एजेंसियां पांच साल तक इस बात का पता क्यों नहीं लगा सकीं और क्या ऐसी एजेंसियों पर देश की आंतरिक व बाहरी सुरक्षा के लिए निर्भर रहा जा सकता है।बेहतर होता कि श्रीप्रकाश जायसवाल विकास के मुद्दे को लेकर ही मुलायम सिंह सरकार पर निशाना साधते। क्योंकि कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी और सांसद राहुल गांधी भी विकास के मुद्दे पर ही मुलायम सिंह सरकार की घेराबंदी कर रहे हैं। ऐसा करने पर श्रीप्रकाश जायसवाल का मंत्रालय और कांग्रेस पार्टी दोनों ही किसी भी प्रकार की जवाबदेही से बच सकते थे।