डाक्टरों की हड़ताल गैर मुनासिब है (अंक - 36)
Apr 15th, 2007 by admin
एक ही बिस्तर पर दो-दो, तीन-तीन मरीज इलाज व देखभाल के अभाव में दर्द से छटपटाते गंभीर रूप से जख्मी व बीमारों की चीख- पुकार और अपने मरीज की चीखें बर्दाश्त न कर पाने से उनके तिमारदारों की डाक्टर व नर्सों से दया की भीख मांगते हुए गिड़गिड़ाने के दृश्य किसी भी सरकारी अस्पताल में आम हैं। ऐसे में जब किसी अस्पताल के डाक्टर, नर्स व अन्य कर्मचारी हड़ताल पर चले जाएंगे तब वहां आने वाले मरीज और उनके तिमारदारों की क्या हालत होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। पिछले कुछ समय से छोटी-छोटी बातों को लेकर डाक्टर व नर्सों का अचानक हड़ताल पर चले जाने की घटनाएं आम हो गर्ई हैं। जिसकी वजह चिकित्सा सुविधाओं की कमी से जूझ रहे सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पूरी तरह से गड़बड़ा जाती है। लोकनायक अस्पताल के डाक्टरों ने अस्पताल में भर्ती एक मरीज के परिजनों के साथ हुई कहा सुनी के बाद अपनी सुरक्षा के प्रबंध करने की मांग को लेकर पिछले दिनों अचानक हड़ताल कर दी। आमतौर पर डाक्टरों केञ् रवैये की आलोचना करने वाली नर्सें व अस्पताल के कर्मचारी भी इस मुद्दे पर हड़ताल में शामिल हो गए। जिसके परिणामस्वरूप लोकनायक अस्पताल के साथ ही मौलाना आजाद मेडीकल कॉलेज, गुरू नानक नेत्र चिकित्सालय व सुश्रुत ट्रामा केंद्र की स्वास्थ्य व्यवस्था भी चरमरा गई। जिसकी वजह से सैकड़ों मरीज व उनके हजारों तिमारदारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। डाक्टरों का श्रमिक नेताओं की तरह हड़ताल पर जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। क्योंकि उनके इस कदम से अनेक जिंदगियां खतरे में पड़ जाती हैं। किसी को दूसरे व्यक्ति की जिंदगी से खिलवाड़ करने का कोई हक नहीं है। डाक्टरों को यह भी सोचना चाहिए कि लोग उनमें भगवान का ही रूप देखते हैं। यही वजह है कि अपने परिजन को अस्पताल में लाते समय इलाज करने वाले डाक्टर में पूरी आस्था प्रकट करते हुए यह भरोसा जताते हैं कि वह मरीज के प्राण बचा लेगा। मगर जब डाक्टर ही प्राणरक्षक की बजाय प्राणभक्षक की भूमिका निभाने लगेंगे तो फिर भला मरीज और डाक्टर के रिश्ते ही भावना का क्या होगा?
डाक्टरी का पेशा न केवल सम्मानित है बल्कि एक डाक्टर बनाने पर सरकार को जनता से करों के रूप में प्राप्त लाखों रुपए भी खर्च करने पड़ते हैं। इस नाते भी डाक्टरों का समाज के प्रति जो कर्तव्य बनता है, उससे वह मुंह नहीं मोड़ सकते हैं। अस्पताल में आए मरीज को प्राणरक्षा व स्वस्थ समाज की रचना में योगदान देना डाक्टरों का कर्तव्य ही बल्कि उनके जीवन का उद्देश्य भी होना चाहिए। मगर ऐसा लगता है आज डाक्टर डिग्री के साथ ली गई उस शपथ को भूल गए, जिसमें उन्होंने सभी मरीजों का इलाज और उनके प्राणों की रक्षा करने में कोई कोर-कसर न रखने का प्राण लिया था। यह सही है कि अस्पताल में आने वाले मरीज के तीमारदारों को भी संयम से काम लेना चाहिए। उन्हें हर बात के लिए डाक्टरों से उलझने और हर बात के लिए उन पर दोषारोपण करने के बजाय उनकी बात समझने का प्रयास करना चाहिए। अगर उन्हें लगता है कि वास्तव में कोई डाक्टर इलाज में जान-बूझकर लापरवाही बरत रहा है तो वह इसकी शिकायत चिकित्सा अधीक्षक से कर सकते हैं। मरीज के परिजन का डाक्टर से सीधा भिड़ना या किसी भी दृष्टि से उलझना ठीक नहीं। खासकर यह देखते हुए कि उनके इस प्रकार के व्यवहार का खामियाजा दूसरे मरीजों को भुगतना पड़ सकता है। यह सही है कि सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों की बढ़ती संख्या की वजह से डाक्टरों को अतिरिक्त दबाव में काम करना पड़ता है। जिसकी वजह से अपने मरीज का विशेष ध्यान रखने वाले परिजन के साथ उनकी तकरार होना स्वाभाविक ही है। फिर भी डाक्टरों को भी संयम रखना चाहिए। उन्हें जीवन और मृत्यु के बीच झूलते अपने प्रियजन की दशा को देखकर परिजनों की जो दशा होती है उसे भी समझने का प्रयास करना चाहिए। वैसे भी किसी अनपढ़ व्यक्ति की बजाय एक डाक्टर से यह अपेक्षा करना गलत भी नहीं है कि वह अपने पास आने वाले व्यक्ति की मनोदशा भांपकर उसकी भावनाओं को शांत कर देगा। सरकारी अस्पतालों में दवा की कमी न होने, जरूरी जांच उपकरणों को सही रखने के साथ-साथ डाक्टर, नर्स व कर्मचारियों की पुख्ता व्यवस्था करना भी सरकार का दायित्व है। मगर ऐसा लगता है कि सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। उसकी चूक का खामियाजा मरीज, उनके परिजन व डाक्टर सभी को भुगतना पड़ रहा है। मगर दिल्ली सरकार और खासकर चिकित्सा विभाग ने सूझबूझ से काम लिया होता तो लोकनायक अस्पताल प्रकरण को टाला जा सकता था। अतीत में भी लोकनायक अस्पताल में मरीज के परिजनों व डाक्टरों के बीच मारपीट होने की घटनाएं घट चुकी हैं। डाक्टरों ने अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियों की ओर सरकार का ध्यान कई बार आकृष्ट कराया मगर सरकार ने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अगर सरकार ने समय रहते उचित कदम उठाए होते तो अस्पताल में घटी घटना को टाला जा सकता था। सही बात तो यह है कि अस्पताल में दवा की कमी होने से लेकर उपकरण खराब पड़े होने और वहां बुनियादी सुविधाओं के अभाव तक के लिए मरीज और उनके परिजन डाक्टरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। जबकि इन सबकी व्यवस्था करना सरकार का दायित्व होता है। लोकनायक अस्पताल में डाक्टर, नर्स व कर्मचारियों की हड़ताल के मामले में सरकार ने कितनी लापरवाही से काम लिया इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब प्रधान सचिव (स्वास्थ्य) यह मान रहे थे कि डाक्टरों की मांगे सही हैं तो फिर उन्हें पूरा करने में 48 घंटे से भी ज्यादा का समय क्यों लगाया गया। अगर सरकार ने इस मामले में संवेदनशील रवैया अपनाया होता तो डॉक्टरों, नर्सों व कर्मचारियों के हड़ताल पर जाने की नौबत ही नहीं आती और न ही मरीजों को परेशानी उठानी पड़ती। जब हम हड़ताल के कारण होने वाली मौतों के मामले में डाक्टरों को जिम्मेदार ठहराते हैं तो फिर भला उन्हें हड़ताल पर जाने के लिए मजबूर करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग क्यों नहीं की जानी चाहिए। इसी आधार के मद्देनजर दिल्ली सरकार को इस सारे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराके दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति को रोका जा सके। समय आ गया है कि डाक्टरों का हड़ताल पर जाना कितना उचित है इस विषय पर राष्ट्रीय बहस चलाने के बाद सरकार इस बारे में एक देशव्यापी नीति तैयार करे। जिससे डाक्टरों के बार-बार हड़ताल करने पर रोक लगाकर हजारों मरीजों को असमय काल कल्वित होने से बचाया जा सके। डाक्टरों की हड़ताल का प्रश्न सीधे-साधे मरीजों के जीवन से जुड़ा है। इस संबंध में जल्द ही कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके साथ डाक्टर व मरीज के बीच आपसी विश्वास की भावना को भी पुनर्जीवित किया जाना चाहिए ताकि समाज में सदभाव कायम रह सके।