अदालती आदेशों पर ब्ल्यू लाइन व भारी वाहन वाले भारी (अंक 38)
Apr 30th, 2007 by admin
दिल्ली की अव्यवस्थित होती जा रही यातायात व्यवस्था को व्यवस्थित करने व सड़क से मौत को दूर रखने के लिए अदालती आदेश पर शुरु किया यातायात पुलिस का अभियान धीरे-धीरे टांय-टांय फिस्स साबित होता जा रहा है। शुरु में यातायात पुलिस ने चालान काट कर सरकारी खजाना भरने के काम में जो तेजी दिखाई थी, उसकी रफतार थम सी गई है। इसका यह मतलब हर्गिज नहीं है कि दिल्ली के वाहन चालक पूरी तरह से अनुशासित हो गए हैं और ब्ल्यू लाइन बसों ने अराजकता छोड़ दी है। हां इतना अवश्य हुआ है कि चालान काटने से जो रकम सरकारी खजाने में जमा होनी चाहिए थी वह यातायात पुलिस ने अधिकारी व कर्मचारियों की जेब में जा रही है। वैसे अदालत ने जिन ब्ल्यू लाइन बसों व अन्य भारी व्यवसायिक वाहनों के कारण होने वाली सड़क दुर्घटना व मौतों को देखते हुए वाहन चालकों को यातायात नियमों का पाठ पढ़ाने के लिए विभिन्न नियमों का उल्लंघन करने पर 500 रुपए का अतिरिक्त जुर्माना वसूलने का जो आदेश दिया था, उसका इन वाहन चालकों पर तो कोई खास असर होता नजर नहीं आया। आज भी ब्ल्यू लाइन बसों में तेज आवाज पर टेप रिकार्डर पर बजते गाने सुनने के साथ ही ड्राईवर को अपने साथियों के साथ सिगरेट अथवा बीड़ी के छल्ले उड़ाते हुए देखा जा सकता है। ब्ल्यू लाइन बस वाले सवारी को देखकर आज भी सड़क के बीचों बीच और बस स्टैंड के आगे या पीछे गाड़ी खड़ा करना अपना हक समझते हैं। इन के अप्रशिक्षित ड्राइवर यातायात नियम कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए सड़कों पर अराजकता फैलाए हुए हैं। जिनकी वजह से पैदल यात्रियों की बात तो दूर दूसरे वाहन चालकों का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। अगर अदालती आदेश और जुर्माने की रकम में भरकम इजाफा करने मात्र से सड़क दुर्घटनाओं की संख्या कम हो जाती तो फिर अभियान के एक पखवाड़े के भीतर ही लगभग एक दर्जन लोग सड़कों पर दम नहीं तोड़ते। वैसे भी दिल्ली की सड़कों पर हर साल 1800 से 2000 व्यक्ति दुर्घटनाओं का शिकार होने के कारण दम तोड़ देते हैं। हालांकि यातायात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी कह सकते हैं कि दिल्ली की सड़कों पर इस वक्त लगभग 51 लाख वाहन दौड़ रहे हैं इसे देखते हुए सड़क दुर्घटनाओं की संख्या काफी कम है। वह इस संबंध में दूसरे महानगरों में होने वाली सड़क दुर्घटना व इस कारण होने वाली मौतों की संख्या का हवाला देते हुए अपनी यातायात प्रबंधन की काबलियत को बेहतर साबित करने का भी प्रयास कर सकते हैं। मगर इस बात का उनके पास शायद ही कोई जवाब होगा कि 51 लाख वाहन और 3200 से भी अधिक चौराहों को भला चार हजार यातायात पुलिसकर्मी किस प्रकार नियंत्रित कर सकते हैं। जवाब तो उनके पास इस बात का भी नहीं होगा कि कुल 51 लाख वाहन चालकों में से कितनों के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस हैं और कितनों को यातायात के संकेतकों का सटीक ज्ञान है? मात्र 32 कैमरों की मदद से सारे शहर के यातायात पर कैसे नजर रखी जा सकती है। भले ही अदालती आदेश का मकसद यातायात नियमों का सख्ती से पालन कराके चालकों को अनुशासित रखता था। इसके पीछे यह मकसद भी रहा होगा कि यातायात नियम का उल्लंघन करने के लिए अधिक जुर्माना भरने की वजह से वाहन चालक भविष्य में ऐसा करने से तौबा कर लेंगे। मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है। जुर्माना अधिक होने की वजह वाहन चालक चालान कटवाने के बजाय यातायात पुलिसकर्मी की मुट्ठी गर्म कर मामले को रफा-दफा कराने में ही अपनी भलाई समझते हैं। इससे भी गंभीर बात तो यह है कि जिन ब्ल्यू लाइन व अन्य बसों के चालकों को अनुशासन के दायरे में लाने के लिए यह अभियान चलाया जा रहा है उन पर इसका कोई भी असर पड़ता दिखाई नहीं देता है। ब्ल्यू लाइन बसें आज भी तेज रफतार से एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में रेस लगाते हुए दूसरे वाहन चालकों को दहशतजदा करती नजर आती है। दरअसल यह चालक सोचते हैं कि ‘सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का’ क्योंकि यह तो यातायात पुलिस वालों को हर महीने एकमुश्त रकम अदा करते हैं बदले में यातायात पुलिसकर्मी भी इन बसों की ओर से आंखें मूंदे रहते हैं। यदि कभी कभार अधिकारियों के दबाव की वजह से किसी बस को जब्त करने की नौबत आती भी है तो इसे थाने में ही सौदेबाजी कर छोड़ दिया जाता है। इस संबंध में पूर्वी दिल्ली के एक सहायक आयुक्त (यातायात) की टिप्पणी भी कम हैरतअंगेज नहीं है। जिसमें उन्होंने कहा कि यातायात के विभिन्न नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में उन्होंने क्ख् बसों को जब्त करने का आदेश दिया था। उनके इस आदेश के बाद कुछ बसों को थाने में लाकर खड़ा भी किया गया। मगर कुछ दिन बाद जब उन्होंने जांच की तो एक भी बस नहीं मिली। पता चला कि निचले अधिकारियों ने कागजी खानापूर्ति कर सब बसों को छोड़ दिया है। अदालत ने जिन वाहनों पर नियमों की लगाम कसने के लिए अभियान चलाने के आदेश दिए थे उन पर तो इसका कोई असर नहीं हो रहा है मगर अन्य वाहन मालिक इस अभियान की आड़ में यातायात पुलिस के उत्पीड़न का शिकार अवश्य हो रहे हैं। यातायात पुलिसकर्मी मनचाहे तरीके से किसी भी वाहन को रोक लेते हैं फिर छोटी सी छोटी कमी निकालकर उससे पैसे मांगते हैं। पैसे न देने पर वह 600 रुपए का चालान थमा देते हैं। ऐसे में अब हर वाहन चालक को अपने साथ 200-300 रुपए अधिक लेकर चलने पड़ते हैं। पता नहीं कब और कहां कोई यातायात पुलिसकर्मी हाथ का इशारा कर उन्हें रुकने के लिए कह दे। वैसे तो इस तरह के अभियान चलाने से पहले वाहन चालकों में यातायात नियमों के प्रति जागरुकता व स्वअनुशासन की भावना पैदा करना जरूरी है। इसके अभाव में यह उम्मीद करना बेमानी होगी कि केवल अभियान चलाने और लोगों के मन में भारी जुर्माना राशि का भय पैदा करने से ही दिल्ली की यातायात व्यवस्था दुरुस्त हो जाएगी। लोगों में यातायात नियमों केञ् प्रति जागरुकता पैदा करने के लिए उन्हें यातायात नियमों के बारे में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इस काम में समय और मेहनत दोनों की आवश्यकता है। भला यातायात पुलिस वाले इस पचड़े में क्यों पड़े। खासकर यह देखते हुए कि उनकी पांचों उंगलियां घी में हैं अगर चालान काटने से सरकारी खजाना भरता है तो वह कह सकते हैं कि उन्होंने अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ किया है और अगर कहीं वाहन चालक चालान कटवाने के बजाय ले देकर पीछा छुड़ाने में ही अपनी भलाई समझता तो भी यातायात पुलिसकर्मी का भला होता है। वैसे भी अदालत में यातायात नियमों का सख्ती से पालन कराने के निर्देश दिए हैं उसने वाहन चालकों में जागरुकता पैदा करने, उन्हें प्रशिक्षित करने, दिल्ली सरकार के परिवहन प्राधिकरण में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लगाने और सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का ढांचा मजबूत करने के निर्देश तो दिए नहीं है। इसलिए इन सब बातों पर सिर खपाने की क्या जरूरत है। यह बात दीगर है कि इन दीर्घकालीन तमाम उपायों के बिना फौरी तौर पर चलाए जाने वाले किसी भी अभियान का असर शुरु के दो-चार दिन तो दिखाई देता है। उसके बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। यदि अदालत वास्तव में दिल्ली के यातायात को अनुशासित करना चाहती है तो समस्या के मूल तक जाकर उसे समाप्त करने के उपाय ढूंढने होंगे। किसी भी तरह के सतही प्रयास का तो वही नतीजा होगा जो इस अभियान का निकलता आ रहा है। एक सवाल यह भी उठता है कि यातायात पुलिस ने अपने कर्तव्य का पालन करने और मौत को सड़क से दूर रखने के लिए अदालती आदेश की प्रतीक्षा क्यों की? उसने अपने स्तर पर इस तरह के अभियान चलाने की आवश्यकता क्यों महसूस नहीं की। यातायात व्यवस्था को केवल अभियान के सहारे नियंत्रित नहीं किया जा सकता। क्योंकि यह तो सतत जारी रहने वाली एक प्रक्रिया है।