गुजरात में इंसानियत फिर शर्मसार हुई (अंक - 39)
May 6th, 2007 by admin
अहिंसा के पुजारी एवं अन्याय के खिलाफ ताउम्र संघर्ष करने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्मस्थली गुजरात की भूमि पर सोहराबुद्दीन शेख को आतंकवादी बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के बाद पुलिस कर्मी द्वारा उसकी पत्नी कौसर बी केञ् साथ बलात्कार कर उसे भी मौत के घाट उतार देने की घटना से वहां इंसानियत एक बार फिर से शर्मसार होने पर मजबूर हुई है। पुलिस ने सोहराबुद्दीन शेख को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के बाद उसे आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोयबा का सदस्य करार दिया था। बाद में उसकी पत्नी कौसर बी की इज्जात लूटने के बाद उसे भी मार दिया गया क्योंकि उसने पुलिस को कायराना तरीके से अपने पति की हत्या करते हुए देख लिया था। पुलिस के इस दावे पर कुछ देर के लिए अगर यकीन कर भी भी लिया जाए कि सोहराबुद्दीन शेख आपराधिक गतिविधियों मे लिप्त था, फिर भी उसे फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के लिए पुलिस को माफ नहीं किया जा सकता। पुलिस लोगों के जान माल की रक्षा के लिए है। मगर जब वह खुद ही लोगों की जान लेने और अराजकता पैदा करने जैसे कामों को अंजाम देने में जुट जाएगी तो फिर भला आम आदमी अपने प्राणों की रक्षा कैसे कर पाएगा। यह एक विचारणीय प्रश्न है। अब धीरे-धीरे इस बात के पुख्ता सबूत मिलने लगे हैं कि आतंकवाद निरोधक दस्ते ने पहले सोहराबुद्दीन शेख को नवम्बर 2005 में बंधक बना लिया और बाद में उसे कट्टर आतंकवादी बताते हुए गोली से उड़ा दिया। हालांकि पुलिस ने दावा किया था कि सोहराबुद्दीन शेख की मौत पुलिस मुठभेड़ के दौरान गोली लगने से हुई है। इस के अगले दिन ही भारतीय जनता पार्टी के पार्षद सुरेन्द्र जीरावाला के बंगले पर तैनात पुलिस के सब इन्सपैक्टर ने सोहराबुद्दीन शेख की पत्नी कौसर बी के साथ बलात्कार कर उसे जहर देकर मार दिया और उसकी लाश को जला दिया। इस दोहरे हत्याकांड में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा राजनेताओं का भी हाथ होने की आशंका है। उम्मीद के अनुरूप ही इस घटना ने राजनीतिक रंग ले लिया है। मार्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी ने इस हत्याकांड के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए उन पर पुलिस का सांप्रदायीकरण करने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने आंकड़े देकर यह साबित करने का प्रयास किया है कि गुजरात की तुलना में दूसरे राज्यों में पुलिस की फर्जी मुठभेड़ में मरने वाले व्यक्तियों की संख्या काफी ज्यादा है। इसके लिए उन्होंने नंदीग्राम घटनाक्रम का हवाला देते हुए माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी को अपने गिरेंबा में झांकने की नसीहत दी है। उन्होंने इस हत्याकांड की सीबीआई से जांच कराने का पुरजोर विरोध किया है। जाहिर सी बात है कि इस हत्याकांड पर भी हमेशा की तरह राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेंकने में जुट गए हैं। यही वजह है कि किसी भी दल ने पुलिस के अपराधीकरण की गंभीर होती जा रही समस्या की ओर संकेत करने की जहमत तक गवारा नहीं की है। वैसे यह पहला अवसर नहीं है जब इनाम, तरक्की या वाहवाही बटोरने के उद्देश्य से पुलिस ने लोगों को खूंखार आतंकवादी या खतरनाक अपराधी बताते हुए उन्हें मौत के घाट उतारा है। सच यह भी है कि बाहुबली, प्रभावशाली व्यक्ति व ताकतवर असमाजिक तत्वों के सामने पूरी तरह से बेबस नजर आने वाली पुलिस आम नागरिकों को अपनी ताकत और खाकी वर्दी के खौफ का अहसास कराने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती है। यही वजह है कि ऐसा शायद ही कोई दिन बीतता होगा जब पुलिसिया जुल्म की दास्तान सुनाई न देती हो। सोहराबुद्दीन शेख की हत्या के मामले में पकड़े गए गुजरात व राजस्थान राज्य के भारतीय पुलिस सेवा के तीनो अधिकारियों को जिस प्रकार से महिमा मंडित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, उसके घातक परिणाम सामने आ सकते हैं। इससे अपराधिक गतिविधियों में लिप्त पुलिस अधिकारी अपने कृत्य पर शर्मिंदा होने के बजाय गर्व से सीना फुलाकर चलने लगेंगे। इस घटना से यह भी साबित हो गया है कि अपने राजनीतिक आकाओं को खुश रखने के लिए पुलिस अधिकारी किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसकी वजह यह है कि उनके तबादले की बागडोर राज्य सरकार के हाथ में रहती है। राजनेताओं के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। इसी स्थिति को देखते हुए ही सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार की प्रक्रिया लागू करने के तहत पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति व तरक्की के मामलों से राज्य सरकार को अलग रहने के निर्देश दिए थे। जिनका पालन करने में अधिकांश राज्यों ने कोई दिलचस्पी नही दिखाई है। दरअसल राजनेता पुलिस को अपनी मुट्ठी में रखना चाहते हैं ताकि अपने चहेतों को कानून की पहुंच से दूर रखने के साथ ही अपने विरोधियों का सफाया कराने के अपने मकसद में पूरी तरह से कामयाब हो सकें। समय आ गया है कि राज्य सरकारों के मनमाने तरीके से पुलिस अधिकारियों के तबादले करने की प्रक्रिया पर रोक लगवाने के साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि परिस्थिति विरोध के बिना किसी भी पुलिस अधिकारी को उसके कार्यकाल की निश्चित अवधि पूरा होने से पहले उसके पद से न हटाया जाए। इसके अलावा पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से मुफ़त रखने के लिए पुलिस से संबंधित शिकायतों की जांच करने के लिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र गठित करना भी इस दिशा में एक अच्छा कदम साबित हो सकता है। पुलिस सुधारों को लागू करने की दिशा में सुरक्षा आयोग गठित करना एक महवपूर्ण कड़ी है। अगर राज्य सरकार पुलिस अधिकारियों को गैर कानूनी कार्य करने के लिए बाध्य करती है तो वे अधिकारी इस आयोग का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इसका उद्देश्य पुलिस को राजनेता व कार्यपालिका दोनों के खौफ से मुक्ति दिलाना है। मगर गुजरात व राजस्थान ने इस दिशा में पहल करने से साफ इन्कार कर दिया है। जिससे स्पष्ट होता है कि यह सरकारें नकेल अपने हाथ में ही रखना चाहती हैं। हालांकि इस संदर्भ में उनके तथ्य गुजरात हत्याकांड की रोशनी में स्वतः ही बेमानी साबित हो जाते हैं। समय की मांग तो यही है कि पुलिस को राजनेताओं के हाथों की कठपुतली बनने से रोकने के लिए इस दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं। वरना वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं जब हम राजनीति का अपराधिकरण हो जाने की तरह पुलिस का भी अपराधिकरण होने का केवल रोना भर रोते रहेंगे।