ऐसी सरकार की जरूरत ही क्या है? (अंक - 40)
May 12th, 2007 by admin
दिल्ली सरकार आज कह रही है कि बिजली की सुविधा पाना नागरिकों का मौलिक अधिकार नहीं है। कल को वह कह सकती है कि स्वच्छ पेयजल, बेहतर सड़क, उच्चस्तरीय शिक्षा व साफ वातावरण को भी मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं किया गया है। लिहाजा न तो नागरिकों को इनकी मांग करने का अधिकार है और न ही इन्हें मुहैया कराना सरकार का कर्तव्य है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जो सरकार नागरिकों के बेहतर जीवन बिताने के लिए बुनियादी नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने में पूरी तरह से सक्षम नहीं है, ऐसी सरकार की जरूरत ही क्या है? सवाल तो यह भी उठता है कि बिजली जैसी सुविधा पर नागरिकों के अधिकार को पूरी तरह से खारिज कर देने वाली सरकार को जनता से विभिन्न कर वसूलने का कौन सा नैतिक अधिकार प्राप्त है।यहां पर नैतिक अधिकार का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि काफी अर्से पहले एक मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी व्यवस्था में कहा था कि कर और सेवा के बदले शुल्क लेने में अंतर है। कर को सेवा शुल्क नहीं माना जा सकता। इसी व्यवस्था की आड़ लेकर विभिन्न सरकारें और स्थानीय निकाय कर के रूप में जनता से भारी राशि वसूलने के बावजूद नागरिक सुविधाएं मुहैया करने के अपने कर्तव्य से बचने का बहाना तलाश लेती हैं। समय आ गया है कि सर्वोच्च न्यायालय अपनी इस व्यवस्था पर दुबारा से स्वविवेक के आधार पर पुनर्विचार करे और यह नई व्यवस्था दे कि जब तक सरकार या स्थानीय निकाय लोगों की जरूरत के मुताबिक नागरिक सुविधाओं की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं करते तब तक उन्हें कर वसूलने का भी अधिकार नहीं होगा।ऐसी व्यवस्था हो जाने के बाद फिर कोई सरकार यह कहने का साहस नहीं कर पाएगी कि बिजली जैसी सुविधा पाना नागरिकों का मौलिक अधिकार नहीं है। क्योंकि तब नागरिक भी उसके खजाने में कर जमा कराने से इंकार करने के साथ ही उसके अधिकारों को चुनौती देने के लिए उठ खड़े होंगे। हालांकि दिल्ली सरकार का यह कहना काफी हद तक सही है कि सर्वोच्च न्यायालय को सुपर योजना आयोग की तरह काम नहीं करना चाहिए और बिजली किल्लत जैसे मामलों की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि बिजली व नागरिक सुविधाएं मुहैया कराना सरकार व कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा भी नहीं है कि अदालत को इस संबंध में सरकार को दिशा निर्देश जारी करने पड़े। वैसे भी देखा यह गया है कि पिछले कुछ समय से अदालती सक्रियता काफी बढ़ गई है और अदालतें विधायिका व कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने के साथ ही उन्हें दिशा निर्देश जारी करने लगी हैं। जिसे देखते हुए राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी अदालतों को अति सक्रियता से बचने की नसीहत दे चुके हैं। फिर भी दिल्ली में व्याप्त बिजली संकट से ग्रस्त नागरिकों के आंसू पौंछने की अदालत की कोशिश को पूरी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता । क्योंकि दिल्ली सरकार सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में ईंधन के रूप में सीएनजी का उपयोग करने से वायु प्रदूषण कम होने व वातावरण में स्वच्छता आने और वर्षा जल संग्रहण की वजह से भूजल का स्तर बढ़ने की जिन-जिन उपलब्धियों पर अपनी पीठ खुद थपथपा रही है वह भी अदालती आदेश की बदौलत हासिल की गई हैं, फिर भला उसे बिजली की स्थिति सुधारने के लिए अदालती सुनवाई पर ऐतराज क्यों हो रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे आशंका सता रही है कि अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान बिजली सुधारों के दौरान निजीकरण व भविष्य की योजनाओं के संबंध में उसने जो सब्जबाग दिखाए थे उनकी पोल खुल सकती है। आमतौर पर यह माना जाता है जब कोई निर्वाचित सरकार का स्थानीय निकाय अपने कर्तव्य का पालन करने में विफल रहता है तब सर्वोच्च न्यायालय को नागरिकों को राहत मुहैया कराने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ता है। अगर सरकार अपना काम सही ढंग से करे तो अदालत को उसके मामलों में दखल देने की जरूरत ही नहीं रहेगी। मगर दिल्ली सरकार ने जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय को सुपर योजना आयोग की तरह काम न करने की सलाह दी है, वह उसके जनविरोधी रवैये का प्रतीक है। वह खुद तो परेशान हाल नागरिकों को कोई राहत मुहैया कराना ही नहीं चाहती है। उसे यह भी गवारा नहीं है कि कोई दूसरा नागरिकों के आंसू पोंछने का प्रयास करें। यही वजह है कि दिल्ली सरकार का जवाब सुनकर अदालत को भी सख्त लहजे में कहना पड़ा कि उसे अपना अधिकार क्षेत्र का पता है। मगर वह लोगों को आंसू बहाते नहीं देख सकती। उसका मकसद नागरिकों की मदद करना और उनकी जिन्दगी को आरामदेह बनाना है। अदालत जनता से यह नहीं कह सकती कि वह उनके लिए कुछ भी नहीं कर सकती। यदि अदालत भी व्यवस्था से परेशान लोगों को राहत पहुंचाने के लिए पहल करने से इंकार कर देगी तो जनता का विश्वास पूरी तरह से टूट जाएगा।अभी लोगों को यह भरोसा है कि अगर सरकार उन्हें सुविधाएं देने में आनाकानी या अपने कर्तव्य पालन में कोताही बरत रही हो तो वह न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। अदालत के डर से सरकार अपनी खामी व गलतियों को सुधार लेगी। मगर दिल्ली सरकार की नसीहत के अनुसार अदालत ने भी जनहित संबंधी मामलों की सुनवाई से इंकार कर दिया तो परेशान जनता कहां जाएगी। होना तो यह चाहिए था कि लोकतंत्र की आदर्श परंपरा का पालन करते हुए सरकार बिजली व अन्य बुनियादी सुविधाओं की ऐसी व्यवस्था करती जिससे किसी को अदालत का दरवाजा खटखटाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। सरकार को प्रयासों के बावजूद अगर बिजली की किल्लत बनी रहने की वजह से मामला अदालत में पहुंच गया तो उसे वहां इस स्थिति से सुधार के लिए किए जा रहे उपायों की जानकारी देकर जनता को आश्वस्त करना चाहिए था कि स्थिति में जल्द ही सुधार होगा। इससे नागरिकों की सरकार के प्रति आस्था बढ़ती और भविष्य केञ् बारे में चिंता कम होती। इसके विपरीत जिस प्रकार से सरकार ने दो टूक शब्दों में यह कह कर कि बिजली मांगना नागरिकों का मौलिक अधिकार नहीं है, उनके भरोसे को तोड़ दिया है। इतना ही नहीं सरकार के इस प्रकार के रवैये से लोगों के मन में यह सवाल भी उठने लगा है कि जो सरकार बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम है, उसकी भला जरूरत ही क्या है? सवाल तो यह भी उठता है कि जब वातावरण को स्वच्छ बनाने से लेकर मैली यमुना को निर्मल करने और लोगों को गंदगी से निजात दिलाने तक के लिए अदालतों को बारे-बार सरकार को फटकार लगानी पड़ती है, तब भी स्थिति में आंशिक रूप से ही सही सुधार होता तो नजर आता है। कहीं अदालतें भी दिल्ली सरकार की तरह ही हाथ पर हाथ धर कर बैठ गई तो फिर भला यहां के नागरिकों का क्या होगा?