ताकि फिर कोई ऐसी हरकत करने की जुर्रत न कर पाए (अंक 41)
May 21st, 2007 by admin
देश की राजधानी दिल्ली महिलाओं के लिए पूरी तरह से असुरक्षित हैं क्योंकि यहां अकेली महिला या युवती का सड़क पर निकलना खतरे से खाली नहीं है। पता नहीं कार में सवार शोहदें कब अकेली महिला या युवती को जबरन खींच लें और कार में ही उसकी इज्जत को तार-तार कर दें। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में हर 24 घंटे के दौरान एक युवति यौन शोषण का शिकार होती है। मगर पिछले दिनों ऐसी लोहमहर्षक घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें यह साबित होता है कि मासूम बच्चियां अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि उन्हें उनके अपनों ने ही हवस का शिकार बनाया है। हैवानियत की हद को पार करते हुए रिश्तों को कलंकित करते हुए 60 वर्षीय एक दादा ने अपनी चार वर्षीय मासूम बच्ची के साथ ही बलात्कार कर डाला। इससे भी बढ़कर एक 28 वर्षीय व्यक्ति ने तो अपनी ढाई वर्षीय बच्ची को ही हवस का शिकार बना डाला। इन घटनाओं को बलात्कार की सामान्य घटनाओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि इनमें बलात्कारियों ने हमारे उस सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है जिसकी बुनियाद पर हमारी पारिवारिक संस्था टिकी हुई है। जिस दिन दादा और बाप के शैतान बन जाने की घटनाएं प्रकाश में आईं तभी सरकार के बालिका संरक्षक गृह में एक लड़की के साथ एक व्यक्ति द्वारा दो साल से और एक दबंग द्वारा एक 14 साल की बालिका से छह माह से लगातार बलात्कार करने के मामले भी प्रकाश में आए। दोनों ही मामलों में बलात्कारी लड़कियों को धमकी देकर उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाते आ रहे थे। किसी प्रकार मामले का खुलासा होने पर दोनों बलात्कारी अब जेल की सीखंचों के पीछे पहुंच गए हैं। जिस प्रकार से दिल्ली में महिला यौन उत्पीड़न व बलात्कार की घटनाएं बढ़ती जा रही है उससे तो ऐसा लगता है कि बलात्कारियों के मन में पुलिस का कोई खौफ रह ही नहीं गया है। पुलिस भी ऐसे मामलों में असंवदेनशील रवैया अपनाती है और थाने में शिकायत दर्ज करने पहुंची पीडि़तों के साथ इस प्रकार पूछताछ करती है मानों उसने थाने में आकर कोई बहुत बड़ा अपराध किया है। बलात्कार के मामलों में पुलिस सही दिशा में जांच भी नहीं करती है। मगर आरोपी प्रभावशाली या पैसे वाला हुआ तो उसके खिलाफ बलात्कार के आरोप के मामलों की जांच में इतने पेच छोड़ दिए जाते हैं कि वह उनके बल पर अदालत से आसानी से छूट जाता है। जिससे दूसरे लोगों में इस प्रकार के अपराध करने के प्रति किसी प्रकार का खौफ नहीं पैदा होता उल्टे उनके हौसले बुलंद हो जाते हैं। यही वजह है कि यौन उत्पीड़न अथवा बलात्कार की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचार खासकर यौन उत्पीड़न व बलात्कार जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी होने का कारण पूछने पर एक मनोवैज्ञानिक ने बताया कि हर क्षेत्र महिलाओं को तरक्की करते देखकर पुरूषों के अहं को गहरी ठेस पहुंची है। वह अपनी काबलियत और योग्यता के बल पर तो महिलाओं के साथ प्रतिस्पर्धा कर पाने में अपने को असमर्थ पा रहा है मगर अपने को महिलाओं से श्रेष्ठ दिखाने का मोह उससे नहीं छूट रहा है। यही वजह है कि वह मौका मिलते ही महिलाओं के साथ बलात्कार करने जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगता है क्योंकि बलात्कार की पीडि़त महिला को शारीरिक पीड़ा ही नहीं बल्कि मानसिक यंत्रणा के भी उस दौर से गुजरना पड़ता है, जिससे वह जिंदगी भर नहीं छूट पाती है। उसके मन में पुरूषों के प्रति हमेशा लिए खौफ पैदा हो जाता है। उनका यह भी मानना है कि सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो जाने, परिवार में टकराव टूट और नशे की लत के कारण ही लोग अपनी बच्चियों की इज्जात के साथ खिलवाड़ करने से भी नहीं हिचकिचाते हैं। उनका कहना है कि पहले लोग सामाजिक बंधन के डर की वजह से नैतिकता और मर्यादा की डोर बंधे होने के कारण ऐसा कोई भी काम करने से बचते थे। जिसकी वजह से उन्हें बदनामी झेलनी पड़ी। मगर अब सब कुछ बदल गया है बलात्कार करने वाले अपने कृत्य पर शार्मिंदा होने के बजाय अपनी मर्दानगी पर गर्व से सिर उठाए फिरते हैं। बलात्कार की घटनाओं का एक सबसे बड़ा कारण यह है कि अब लोग पुलिस से डरते नहीं बल्कि उसे धौंस दिखाते हैं। यह कहना है दिल्ली पुलिस के सहायक आयुक्त के.एस. भटनागर का। उनका कहना है कि गैर सरकारी संगठन, सामाजिक संगठन व मानवाधिकार आयोग और ऐसी ही अन्य संस्थाओं की ओर से पुलिस की कार्यप्रणाली व व्यवहार पर लगातार अंगुलियां उठाई जाती रही हैं। इतना ही नहीं पुलिस को अपना काम करने के बजाय दूसरे कामों पर लगाया जाता है। पुलिस को जनसंपर्क का दायरा बढ़ाने और इस संबंध में थाने में कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए जाते हैं। इन कार्यक्रम में भाग लेने आने वाले लोग वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में थाने में तैनात कर्मियों की शिकायते करने के साथ ही उन्हें खरी-खोटी सुनाते हैं। जिससे लोगों में पुलिस का डर खत्म होता जा रहा है तो दूसरी तरफ पुलिस का मनोबल गिर रहा है। यही वजह है कि लोग बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देने से भी नहीं हिचकिचा रहे हैं। पहले लोगों में पुलिस की खाकी वर्दी के प्रति खौफ की भावना रहती थी, जिसकी वजह से वह अपराध करने से बचते थे। वह अपने अनुभव याद करते हुए बताते हैं कि पहले देर रात तक सड़क पर मटरगश्ती कर रहे लोगों या वाहन में सवार संदिग्ध लोगों को रोक पुलिस उनसे सख्ती से पूछताछ करती थी। वह आपराधिक प्रवृति के लोग असमय घूमने से कतराते थे। आज के दौर में अगर पुलिस वाला किसी वाहन में सवार व्यक्ति से पूछताछ करता है तो वह फौरन अपने मोबाइल फोन पर राजनेता या वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से उस सिपाही की शिकायत कर देता है जिसकी वजह से सिपाही को ड्यूटी निभाने के एवज में बेइज्जती झेलनी पड़ती है। बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को रोकने के उपाय करने के बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु शिखर का कहना है कि बलात्कार संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रेक अदालतें गठित कर उनमें रोजाना सुनवाई होनी चाहिए। साथ ही बलात्कारी को ऐसी सजा दी जानी चाहिए जिससे सबक हासिल कर दूसरे लोग ऐसी हरकत करने का साहस ही न कर पाएं।