प्रधानमंत्री और कांग्रेस दोनों का ही रंग उतरने लगा है (अंक 42)
May 26th, 2007 by admin
विद्वान अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केन्द्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के तीन साल का कार्यकाल पूरा होते-होते प्रधानमंत्री और कांग्रेस दोनों का ही रंग उतरने लगा है। हाल ही में हुए राज्य विधानसभाओं के चुनाव और संप्रग सरकार की कार्यशैली व लोकप्रियता के बारे में आम जनता की राय जानने के लिए कराए गए सर्वेक्षण तक में यह बात साबित कर दी है। यह सही है कि आर्थिक विकास की दर में अपेक्षित बढ़ोतोरी हुई है। मगर इससे न तो बेतहाशा बढ़ती महंगाई पर अंकुश लग पाया और न ही आम आदमी तक इसका लाभ पहुंचा है। ऐसे में मनमोहन सिंह सरकार के खेल एवं पंचायतीराज मंत्री मणिशंकर अय्यर की यह चिंता अस्वाभाविक नहीं है कि अगर केन्द्र सरकार ने महंगाई पर काबू पाने के लिए अपनी आर्थिक नीतियों में परिवर्तन नहीं किया तो आदमी के मन में उनके प्रति आक्रोश बढ़ता ही जाएगा। जिसका खामियाजा कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान भुगतना पड़ सकता है। वैसे भी यदि हम केन्द्र सरकार के तीन साल के कार्यकाल पर नजर डालें तो उसके खाते में उपलब्धियों की तुलना में नाकामियां अधिक नजर आती हैं। सरकार अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार को अपनी महानतम उपलब्धि बता रही थी। मगर इस पर अभी संदेह के बादल बरकरार हैं। अमेरिका कभी भारत के ईरान के साथ संबंधों को लेकर इस करार की आड़ में उसकी संप्रभुता को चुनौती देता नजर आता है तो कभी वह भारत के शांतिपूर्ण परमाणु की राह में अड़ंगा डालने का प्रयास कर रहा है। जिसकी वजह से ऐसा लगता है कि अमेरिका के साथ करार कर भारत विचित्र सी स्थिति में फंस गया है। इस समझौते की वजह से प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को विपक्ष के साथ-साथ संप्रग में शामिल दलों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ रहा है। कुशल एवं योग्य अर्थशास्त्री के नेतृत्व वाली सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण महंगाई पूरी तरह से बेकाबू हो गई है। महंगाई के बोझ से कराह रही जनता अब अपनी नाराजगी चुनावों में सार्वजनिक तौर पर जाहिर करने लगी है।हैरानी की बात तो यह है कि काबिल अर्थशास्त्री होने और पी. चिदंबरम व मौंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे योग्य सिपहसालार होने के बावजूद प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह महंगाई को थामने में सक्षम नीतियां बनाने में असमर्थ साबित हुए हैं। इतना ही नहीं वह आर्थिक सुधारों को गति देने और उनका लाभ आम जनता तक पहुंचा पाने में भी विफल साबित हुए हैं। यह वास्तव में एक गंभीर चिंता का विषय लगता है।वैसे देखा जाए तो मणिशंकर अय्यर ने इन्हीं मुद्दों को लेकर अपनी सरकार को चेताया है। पर लगता है कि ऐसा करते समय वह इस कहावत को भूल गए कि शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारा करते। मणिशंकर अय्यर तो खुद ही शीशे के इस घर में रह रहे हैं, जिस पर पत्थर मारकर वह घर के मुखिया (प्रधानमंत्री) पर निशाना साध रहे हैं। वैसे भी केन्द्रीय मंत्री होने के नाते मणिशंकर अय्यर भी संप्रग सरकार की नाकामी का अपयश लेने और सामूहिक दायित्व की जवाबदेही से बच नहीं सकते। अगर वह मनमोहन सिंह सरकार से वास्तव में इस कदर खफा हैं कि उसकी सार्वजनिक तौर पर आलोचना करना उनकी मजबूरी बन गया है तो उन्हें नैतिकता केञ् तकाजे केञ् मद्देनजर पहले केन्द्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था और इसके बाद सरकार पर निशाना साधना चाहिए था।इससे ऐसा लगता है कि संप्रग सरकार और खास कर प्रधानमंत्री पर आक्रमण भले ही मणिशंकर अय्यर ने किया है। मगर उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करने वाला कोई और ही है। कांग्रेस के जानकारों पर भरोसा करें तो मणिशंकर अय्यर ने ऐसा पार्टी सुप्रीमों सोनिया गांधी के इशारे पर ही किया है। पार्टी सुप्रीमों के वरदहस्त के बिना मणिशंकर अय्यर सरीखा राजनीति का मंजा हुआ खिलाड़ी इस प्रकार का कदम उठाने की भूल नहीं कर सकता था। दरअसल सोनिया गांधी के ऐसा करवाने के पीछे भी दो वजह हैं एक तो वह पार्टीजनों को यह संदेश देना चाहती थी कि देश की जनता में कांग्रेस के प्रति नाराजगी पैदा हुई है उसका प्रमुख कारण संप्रग सरकार की गलत आर्थिक नीतियां हैं। इसका प्रमुख कारण है जनता को यह संदेश देना कि प्रधानमंत्री अक्षम साबित हुए हैं। इसलिए अब समय की मांग है कि नेहरु गांधी परिवार के हाथ में ही एक बार फिर से देश की बागडोर सौंप दी जाए। देखने वाले तो इसे उत्तर-प्रदेश चुनावों के दौरान कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी द्वारा दिए गए इस बयान से भी जोड़ रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं है। क्योंकि उस वタत इस तरह का बयान देने की कोई जरुरत नहीं थी। ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी केञ् प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की राह में आने वाली अड़चनों को दूर करने की नीयत से ही मणिशंकर अय्यर के जरिए संप्रग सरकार और इसके मुखिया डा. मनमोहन सिंह पर वाक्य बाण छुड़वाए हैं। अगर यह मान लिया जाए कि राहुल गांधी उम्र के लिहाज से अभी प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हैं तो भी सोनिया यह साबित करने में सफल तो रही ही है कि मनमोहन सिंह न केवल कमजोर प्रधानमंत्री है बल्कि पार्टी के साथ-साथ सरकार की बागडोर भी सोनिया जी के हाथ में है। इसका जीता जागता प्रमाण है मणिशंकर अय्यर का मंत्री पद पर बने रहना। डा. मनमोहन सिंह के स्थान पर अगर कोई दूसरा व्यक्ति इस पद पर होता तो सरकार के खिलाफ विपक्ष की भाषा बोलने वाले को कभी का मंत्रिपरिषद से बाहर का रास्ता दिखा देता। इससे न केवल डा. सिंह की कमजोर प्रधानमंत्री की छवि मजबूत हुई है बल्कि इस बात को भी बल मिलता है कि मणिशंकर अय्यर ने जो भी कहा है वह पार्टी सुप्रीमो के इशारे पर ही कहा है।वैसे भी कांग्रेस खास कर नेहरु गांधी परिवार की यह रणनीति रही है कि किसी भी कद्दावर नेता पर अपने खास सिपहसालार के जरिए हमला कराया जाए। अगर वह मामला तूल पकड़े तो सार्वजनिक तौर पर सिपहसालार से जवाब-तलब कर लिया जाए और अकेले में इसकी पीठ थपथपा कर हौंसला अफजाई कर दी जाए ताकि जरुरत पड़ने पर उसका दुबारा से इस्तेमाल किया जाए।यदि इन सब तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया जाए तो भी हकीकत तो यही है कि अगर सरकार ने वोट बैंक केञ् मद्देनजर दलित व मुस्लिम तुष्टीकरण पर सारा ध्यान केन्द्रित करने के बजाय महंगाई को रोकने के उपाय नहीं किए गए तो उसके लिए अगले दो साल का समय पूरा कर पाना मुश्किल हो जाएगा। सरकार की नीतियों से खफा होकर तेलंगाना राष्टीय अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एएमडीएमकेञ्) व समाजवादी पार्टी संप्रग का साथ छोड़ चुकी है। सरकार के प्रमुख सहयोगी वामदल खासकर भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता भी आए दिन समर्थन वापिस लेने पर विचार करने की धमकी देते रहते हैं। इतना ही नहीं संप्रग के सबसे बड़े हितैषी लालू प्रसाद यादव भी सरकार को बढ़ती महंगाई व मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के प्रति आगाह कर चुके हैं। अब देखना यह है कि खेल एवं पंचायतीराज मंत्री मणिशंकर अय्यर की चेतावनी को गंभीरता से लेते हुए केन्द्र सरकार महंगाई रोकने व आम आदमी को राहत पहुंचाने के लिए तुरंत ही प्रभावशाली कदम उठाती है या फिर अपने पुराने ढर्रे पर ही चलती रहेगी।