ऐसे वकीलों के केस लड़ने पर भी प्रतिबंध लगाया जाए (अंक 44)
Jun 11th, 2007 by admin
अपने मुवकिल को बचाने के लिए वकील कानूनी दावपेच के अलावा तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वह जिरह के दौरान गवाह को झूठा साबित करने से लेकर उसके द्वारा दी गई जानकारी और तथ्यों को गलत साबित करने का भी प्रयास करते हैं। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। जिस प्रकार से डॉक्टर का कर्तव्य अपने मरीज के प्राणों की रक्षा करना है। ठीक उसी प्रकार वकील का कर्तव्य अपने मुवकिल को अभियोजन पक्ष की ओर से बनाए गए गलत मामले के कानूनी फंसे से निजात दिलाना है। मगर जब वकील अपने प्रभावशाली मुवकिल को बचाने के लिए कानून के साथ खिलवाड़ करने और उसकी मूल भावना को ही ठेस पहुंचाने लगे तो उनके इस कृत्य को पेशेगत कर्तव्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायिक तंत्र की मूल धारणा को चोट पहुंचाने और जनता का कानून के प्रति भरोसा तोड़ने का काम करने पर वकील भी आम आदमी जितने ही नहीं बल्कि इससे भी ज्यादा दोषी हैं क्योंकि वह कानून के जानकार होते हैं। इस नाते वह भलि भांति जानते हैं कि उनके गलत आचरण करने का किसी भी मुकदमे पर क्या असर पड़ सकता है। बहुचर्चित बी.एम. डब्ल्यू. हादसे के मामले, जिसमें छह निर्दोष व्यक्तियों की मौत हो गई थी और इतने ही घायल हो गए थे के मुख्य आरोपी संजीव नंदा को बचाने के लिए बचाव पक्ष के वकील आर.के. आनंद और अभियोजन पक्ष के वकील आई.यू. खान ने जिस तरह की जुगलबंदी दिखाई है उसने आम आदमी के विश्वास को पूरी तरह से हिला दिया है। संजीव नंदा को कानून के फंदे से बचाने के लिए अभियोजन पक्ष के वकील आई.यू. खान ने बचाव पक्ष के वकील आर.के.आनंद के साथ मिलकर इस मामले के एकमात्र चश्मदीद गवाह को खरीदने का प्रयास किया। ऐसा करते समय शायद आई यू.खान यह भूल गए कि अभियोजन पक्ष का वकील होने के नाते उनका कर्तव्य मामले के आरोपी के खिलाफ इस प्रकार के पुख्ता सबूत पैदा करना था, जिससे वह कानून के शिकंजे से बचने न पाए और पीडि़तों को पूरा इंसाफ मिले। मगर उन्होंने ऐसा करने के बजाय चश्मदीद गवाह को इस बात के लिए तैयार करने का प्रयास किया जिससे वह अदालत में गलत बयानी करे और मुख्य आरोपी साफ बच जाए। इस मामले का सनसनीखेज खुलासा खुद चश्मदीद गवाह ने एक स्टिंग ऑप्रेशन के दौरान किया है। हालांकि बार-बार बयान बदलने के कारण उसकी खुद की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में है। बावजूद इसके उसने खुफिया कैमरे के जरिए बचाव पक्ष व अभियोजन पक्ष की मिली-भगत का जिस तरह से पर्दाफाश किया है, उसके बारे में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं रह जाता है। यह मामला प्रकाश में आने के बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने आर.के. आनंद व आई.यू. खान को एसोसिएशन की सदस्यता से निलंबित कर दिया है। मगर उनके वकालत करने और केस लड़ने पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया है। हो सकता है कि एसोसिएशन को कानूनी रूप से ऐसा करने में अड़चन आ रही होगी। फिर भी वह इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश और रजिस्ट्रार को आर.के. आनंद और आई.यू. खान के वकील को खरीदने की कोशिश करने की जानकारी देने के साथ ही उनके मुकदमा लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की संस्तुति करनी चाहिए थी। ऐसा करने से एसोसिएशन की गरिमा और भी बढ़ जाती और लोग भी वकीलों को इज्जत की नजरों से देखते। एसोसिएशन ने अगर आर.के. आनंद और आई.यू. खान के रुतबे को देखते हुए ऐसा नहीं किया तो सर्वोच्च न्यायालय को इस मामले में स्व-विवेक के आधार पर संज्ञान लेते हुए इन दोनों वकीलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी। ताकि भविष्य में कोई दूसरा वकील पेशे को कलंकित करने जैसा कदम उठाने की हिम्मत न कर सके। वैसे भी कार्यपालिका व विधायिका के साथ ही आज न्यायपालिका पर भ्रष्टचार के आरोप लगते जा रहे हैं। इन अरोपों को प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े मामले में वकील से लेकर न्यायधीश की संदिग्ध भूमिका ने और भी पुख्ता किया है। इतना ही नहीं केन्द्रीय विधि मंत्री और भारत के मुख्य न्यायधीश ने भी यह स्वीकार किया है कि न्याय तंत्र में भ्रष्टाचार है। मगर विडंबना तो यह है कि इन दोनों ने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए स्वायतशासी तंत्र बनाने से इंकार किया है। पिछले कुछ अर्से के दौरान नागरिक सुविधा, कानून का पालन न होने, अवैध निर्माण, सार्वजनिक स्थल पर हुए अतिक्रमण व जन स्वरूप से जुड़े मामलों में संज्ञान लेकर जनता को राहत पहुंचाने वाले आदेश जारी किए हैं। जिससे कार्यपालिका व विधायिका के उपेक्षापूर्ण रवैये से निराश आम आदमी को यह आस बंधी थी कि न्यायपालिका तो उसके अधिकारों की रक्षा करने के लिए है। जागरूक और सक्रिय न्यायपालिका के हाथ में आम आदमी के हित व अधिकार सुरक्षित हैं। इससे आम आदमी के मन में न्याय के मंदिर रूपी अदालतों में विश्वास पुख्ता हुआ और पीडि़त लोग यह समझने लगे कि अदालत में तो उनके साथ अवश्य इंसाफ होगा। मगर आर.केञ्. आनंद व आई.यू. खान जैसे वकील की आपसी साठगांठ से अभियुक्त को बचाने के प्रयासों का खुलासा हो जाने के बाद आम आदमी के विश्वास को ठेस पहुंचती है और वह सोचने लगता है कि न्याय तंत्र भी कार्यपालिका व विधायिका के मार्ग का अनुसरण कर रहा है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि आम आदमी के विश्वास को बहाल करने और न्यायपालिका के प्रति उसकी आस्था की भावना को मजबूती प्रदान करने के लिए न्यायपालिका गलत हथकंडे अपनाने व अभियुक्त को सजा से बचाने का प्रयास करने वाले वकीलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे।