कैदियों की मौत का असली जिम्मेदार कौन? (अंक 45)
Jun 18th, 2007 by admin
देश की सर्वाधिक सुरक्षित तिहाड़ जेल और चर्चाओं का चोली दामन जैसा संबंध है। कभी चार्ल्स शोभराज के अपने साथियों सहित अभेद समझी जाने वाली जेल में सेंध लगाकर फरार हो जाने की वजह से तिहाड़ की चर्चा होती है तो कभी इसकी महानिरीक्षक किरण बेदी द्वारा लागू किए गए सुधार कार्यक्रमों को अंतराष्ट्र्रीय स्तर पर मान्यता मिलने और उन्हें सミमान से नवाजे जाने के कारण तिहाड़ के नाम की गूंज सुनाई देती है।
किरण बेदी के तिहाड़ से जाने के बाद उनके द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रमों को वहां जारी रखा गया। समय-समय पर तिहाड़ में आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रम व समारोह में चर्चित हस्तियों को शिकरत करने की वजह से भी तिहाड़ जेल का नाम सुर्खियों में बना रहता है। इन दिनों भी तिहाड़ जेल का नाम मीडिया में जबदस्त तरीके से छाया हुआ है। यह बात दीगर है कि चर्चा का विषय इस इस बार वहां नए सुधार कार्यक्रम शुरू करना नहीं बल्कि वहां आए दिन कैदियों की हो रही मौते हैं।
इन मौतों के मामले को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्र्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम ने जेल का दौरा किया है और दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की है। यह समिति जेल के हालात का जायजा लेने के बाद अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। तिहाड़ जेल में एक के बाद कैदियों की मौत के बारे में जेल प्रशासन ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ने का प्रयास किया है कि कैदियों की मौत गर्मी व बीमारी के कारण हुई हैं जबकि वास्तविकता कुछ और ही कह रही है। सबसे बड़ा कारण तो इस जेल में क्षमता से ज्यादा संख्या में कैदियों का रखा जाना है। इस जेल की क्षमता 6200 कैदियों की है जबकि वहां 13725 कैदी रखे गए हैं। जिसका असर जेल में उपलホध सुविधाओं पर पड़ रहा है। चीफ मेट्रोपोलिटिन मैजिस्ट्रेट डॉ. कामिनी ला ने उच्च न्यायालय को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कहा है कि तिहाड़ जेल में कैदियों की मौतों का कारण वहां मौजूद अव्यवस्था और उनके साथ अमानवीय व्यवहार करना है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि तिहाड़ जेल में कैदियों के साथ मारपीट करना, कैदियों से अवैध वसूली और उन्हें प्रताडि़त करना आम बात है। जेल में पेयजल की स्थिति ठीक नहीं है। इतना ही नहीं जेल में जो जलापूर्ति की जा रही है वह भी स्वास्थ्य की दृष्टि से सही नहीं है। जेल में कैदियों को लू व भीषण गर्मी से बचाने के भी पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए हैं। जेल में मादक पदार्थों की आपूर्ति भी धड़ल्ले से हो रही है।
हालांकि हर बार की तरह जेल प्रशासन इन बातों को सिरे से नकार रहा है और कैदियों की मौत का कारण गर्मी व बीमारी को बता रहा है। मगर उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जेल में बंद कैदियों के शरीर पर चोटों के निशान कैसे मिले हैं और गंभीर रूप से बीमार कैदियों को समय रहते चिकित्सा सुविधाएं क्यों मुहैया नहीं कराई गई। इससे विडंबना ही कहेंगे कि साधारण कैदी तो सुविधाओं के अभाव में जेल में दम तोड़ रहे हैं जबकि प्रभावशाली कैदी तिहाड़ जेल में ही हर किस्म की सुविधाएं भोगते हुए सेटेलाइट फोन के जरिए जेल से ही अपना धंधा चला रहे हैं।
इतना ही नहीं इन लोगों केञ् लिए शराब से लेकर मुर्गे तक का जेल के भीतर ही आसानी से इंतजाम हो जाता है। हां इस काम के लिए पैसे अवश्य खर्च होते हैं और पैसे की ऐसे कैदियों के पास कोई कमी नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तिहाड़ के हालात का जायजा लेने के लिए जो उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की है उम्मीद की जानी चाहिए कि उसकी रिपोर्ट से तिहाड़ की सही तस्वीर उभर कर सामने आएगी और अदालत उसी के आधार पर दिल्ली सरकार व जेल प्रशासन को उचित व्यवस्था करने के निर्देश देगी।
साथ ही यह आशंका भी है कि इस समिति की रिपोर्ट का हश्र भी दूसरी समितियों की रिपोर्ट जैसा ही हो और तिहाड़ जेल में कैदियों की मौतों का सिलसिला ऐसे ही चलता रहे। हमारे यहां हर बड़े हादसे के बाद उसकी जांच के लिए समिति गठित कर दी जाती है और उसकी रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई हुई इसका किसी को भी पता नहीं चलता है। कहीं तिहाड़ के मामले में ऐसा ही न हो।
कैदियों को वैसे तो तिहाड़ जेल में सुविधाएं मुहैया कराने और उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की वकालत करने का पुराने कायदे कानून से बंधे लोग विरोध कर सकते हैं क्योंकि उनकी नजर में कानून तोड़ने के आरोप में सजा पाने वाले कैदियों को सजा के दौरान कष्टों का सामना करना ही चाहिए। ताकि जेल से बाहर निकलने पर ऐसे लोग दुबारा से अपराध की दुनियां में कदम रखने की हिम्मत न जुटा सकें। ऐसे लोगों की नजर में सजा पाने वाले अपराधी या विचाराधीन कैदियों के मन में जेल के प्रति ऐसा खौफ बिठा दिया जाए जिससे वह यहां आने के नाम से कांपने लगे।
कैदियों के साथ इस तरह का व्यवहार करने की सिफारिश करने वाले यह भूल जाते हैं कि इस व्यवस्था पर छोटे-मोटे अपराध की वजह से सजा भुगतने के लिए जेल आने वाला व्यक्ति वहां की हालात देखकर व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना से भर उठता है।
इतना ही नहीं वह जेल से बंद पड़े और खुंखार किस्म के अपराधियों के संपर्क में आकर वहां से अपराधों का पूरा प्रशिक्षिण लेकर लौटता है और बहार आते ही आदी मुजरिम की तरह काम करने लगता है।
इसे देखते हुए मनोचिकित्सकों ने कैदियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने और जेलों को सजाघर के बजाय सुधारगृह बनाने पर बल दिया था। जिस पर अमल करते हुए तिहाड़ में कैदियों को सुविधा मुहैया कराने और उनका ध्यान रचनात्मक कार्यो की ओर लगाने के लिए अनेक कदम उठाऐ थे। जिनके बेहतर परिणाम सामने आए थे। जेल प्रशासन और दिल्ली सरकार को चाहिए कि वह तिहाड़ जेल के कैदियों की मौतों के मामले को गंभीरता से लेते हुए बिना लीपापोती के वहां हालात सुधारने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए। कहीं ऐसा न हो कि उनके हाथ पर हाथ धर कर बैठने की वजह से और भी कैदी असमय काल कलपित हो जाएं।