ऐसे फतवों से मुस्लिम समाज का भला नहीं हो सकता (अंक 49)
Jul 16th, 2007 by admin
भारतीय मुस्लिम समाज और खासकर इसकी महिलाओं का सबसे बड़ा कोई दुश्मन है तो वह उलेमा ही हैं। यह उलेमा गाहे-बगाहे इस्लाम के नाम पर ऐसे फतवे जारी कर देते हैं, जिससे मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के लिए तरक्की के सारे रास्ते बंद हो जाएं। दरअसल सदियों से औरत को पैर की जूती समझने और उसका भोग्या की तरह इस्तेमाल करने वाले कठमुल्ले व उलेमा की नजरों में औरतों की तरक्की कांटे की तरह खटक रही है। वह चाहते हैं कि आज के आधुनिक युग में महिलाएं अशिक्षित व घर की चारदीवारी में कैद रहें।
दारूल उलूम की ओर से जारी किया हालिया फतवा भी इसी चेष्टा का एक हिस्सा लगता है। इस फतवे में सह-शिक्षा को गैर इस्लामी, गैर शरई और गैर कानूनी करार दिया गया है यह तो माना जा सकता है कि उलेमा किसी भी व्यवस्था को इस्लाम व शरीयत की कसौटी पर कसने के बाद उस बारे में अपनी राय देने के लिए स्वतंत्र हैं। मगर उन्हें किसी भी व्यवस्था को अपने नजरिए से गैर कानूनी बताने का कोई अधिकार नहीं है। यदि उलेमा ही कानून संबंधी फैसले लेने लगेंगे तो फिर अदालतों की जरूरत ही क्या रह जायेगी?
यह सही है कि उलेमाओं ने मुस्लिम समुदाय पर अपने मनमाने फैसले थोपने के प्रयासों पर कड़ी आपात्ति जताई है। बावजूद इसके उलेमा गाहे-बगाहे ऐसे फतवे जारी कर देते हैं जिसकी वजह से दुविधापूर्ण स्थिति पैदा हो जाती है। जिसे देखते हुए ऐसी व्यवस्था कायम करना बेहद जरूरी हो गया है, जिसके तहत कोई भी उलेमा बिना आवश्यकता के कोई भी फतवा जारी न करे। इसके लिए मुस्लिम समुदाय को भी गैर वाजिब व गैर जरूरी फतवों के विरोध में खुलकर सामने आना होगा।
दुखद बात तो यह है कि अभी तक तो अधिकांश मुस्लिम समाज उल-जलूल फतवों पर भी खामोशी अख्तियार किए रहता है। थोड़े से शिक्षित लोग कभी-कभी ऐसे फतवों के खिलाफ विरोध के स्वर उठाते नजर आते हैं, मगर ऐसे लोगों की संख्या कम होने के कारण उनकी आवाज नक्कारखाने की तूती बनकर रह जाती है। यही वजह है कि उलेमा जब चाहे तब फतवा जारी कर देते हैं। फतवा जारी करते समय वह सोचने की जहमत उठाना तक गवारा नहीं करते हैं कि इससे उनके अपने समाज का कितना बड़ा अहित होगा। उन्हें तो फतवा जारी कर अपना महत्व जतवाने से ही मतलब है।
यह सब जानते हैं कि मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा ही है। जिसे देखते हुए अब इस समुदाय के लोगों ने भी अपने अंधेर घरों को शिक्षा से रोशन करने का फैसला ले लिया है और वह लड़कों के समान लड़कियों को भी स्कूल भेजने लगे हैं। यह सब जानते हुए कि बेहतर शिक्षा व उज्ज्वल भविष्य के लिए पब्लिक स्कूल से बेहतर विकल्प दूसरा नहीं है और ऐसे स्कूलों में सह-शिक्षा की व्यवस्था है। पब्लिक स्कूल व राज्य सरकार के प्रतिभा विकास व माडल स्कूलों में भी सह-शिक्षा की व्यवस्था है।
जाहिर सी बात है कि अगर दारूल उलूम की ओर से जारी फतवे पर अमल किया जाए तो लड़कियों को ऐसे स्कूलों से निकालना होगा, क्योंकि स्कूल तो लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शिष्ट लगाने का प्रबंध करेंगे। हालांकि इस फतवे में उलेमा ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि सह-शिक्षा वाले स्कूलों में से लड़कों को निकालने के हिमायती हैं या लड़कियों के। वैसे अभी तक जारी होने वाले फतवे महिलाओं के ही विरोधी रहे हैं। इस नाते यह फतवा भी लड़कियों को ही सह-शिक्षा स्कूलों से बाहर निकालने के संबंध ही होगा। इस बारे में किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दारूल उलूम के इस फतवे को देवबंदी के अनेक उलेमा भी जायज मान रहे हैं।
अगर इस फतवे का व्यापक तौर पर सहमति दे दी गई तो इससे लड़कियों के बेहतर तालिम हासिल कर जीवन में कुछ बनने के तमाम रास्ते बंद हो सकते हैं। मुस्लिम समाज का नजरिया महिलाओं के प्रति आज भी नहीं बदला है। उन्हें महिलाओं का घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर किसी भी क्षेत्र में उंचाईयां छूना पसंद नहीं है। इससे उनके अहंम को चोट पहुंचती है और ऐसा होने पर वह तिलमिला उठते हैं। अपने समाज की महिलाओं की तरक्की और कामयाबी से प्रेरित होकर उनसे भी आगे निकलने की कोशिश करने की बजाय वह महिलाओं की राह मुश्किल करने में जुट जाते हैं। उलेमा व मौलानाओं के फतवे उनकी इसी मानसिकता को प्रकट करते हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि जब मुस्लिम समाज की महिला पुरुषों के अत्याचार व अन्याय के पति आवाज उठाती हैं या अपने हक की मांग कर रही हैं तब उलेमा और मौलाना उसका समर्थन करने की बजाय उसके खिलाफ ही फतवा जारी कर देते हैं। महिलाओं के अपने पति को तलाक देने की बात भी उन्हें शरीयत के खिलाफ लगती है।
उनकी नजर में तो अपनी बेटी को समान पुत्र वधु के साथ ससुर के बलात्कार करने जैसे मामलों में भी कुछ गलत नजर नहीं आता है। तब भी इस मामले को तूल देने के लिए पीडि़त महिला को ही दोषी ठहराते हुए उसके खिलाफ फतवा जारी कर देते हैं। ऐसा लगता है कि उलेमा और मौलानाओं को सारी फिक्र केवल पुरुषों के हकों को सुरक्षित रखने तक ही सीमित है।
विडम्बना तो यह है कि उलेमा और मौलानाओं द्वारा जारी किए गए ऊल जलूल किस्म के फतवों को मुस्लिम समाज का कोई न कोई वर्ग समर्थन दे देता है, जिसकी वजह से फतवा देने वालों का हौंसला बढ़ जाता है। अगर मुस्लिम समाज ऐसे फतवों की ओर ध्यान देने की बजाय उनका खुलकर विरोध करने लगेगा तो उलेमा भी ऐसे फतवे जारी करने से पहले कई बार सोचने लगेंगे।
फतवा जारी करने वाले उलेमा और मौलाना शरीयत की अपने ढंग से व्यख्या करते हैं, जिसकी वजह से अधिकांश लोग उनका विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। क्योंकि अगर उन्होंने ऐसा किया तो उन्हें धर्म विरोधी करार देने के साथ ही उनका सामाजिक बहिष्कार भी किया जा सकता है। जिसकी वजह से वह खामोश रह जाते हैं। उनकी इसी खामोशी का फायदा उलेमा और मौलाना उठा रहे हैं। ऐसा लगता है कि उलेमा और मौलानाओं के बेतुके फतवों के पीछे कहीं न कहीं मुस्लिम समाज के पुरूषों की सदियों पुरानी उस मानसिकता का भी हाथ है, जिसमें महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मान कर उनके साथ इसी प्रकार से व्यवहार करने पर जोर दिया जाता है। यही वजह है कि इन फतवों को उनकी मौन स्वीकृति मिल जाती है। जबकि होना तो यह चाहिए कि इस प्रकार के फतवों का पुरजोर विरोध करने के साथ ही इन्हें जारी करने वाले उलेमा और मौलानाओं का सामाजिक बहिष्कार किया जाए ताकि वह भविष्य में इस प्रकार के फतवे जारी करने से पहले कई बार सोंचें।