भारत के महाभारत काल का ऐतिहासिक तीर्थस्थल हिन्दू आस्था का केंद्र: अवंतिका देवी मंदिर

धार्मिक जागृति के स्रोत देदीप्यमतान ‘अवंतिका देवीय (अम्बिका देवी) का मंदिर साधू-संतों तथा श्रद्धालु-भक्तजनों की श्रद्धा एवं आकर्षण का केन्द्र है। विशेषकर पश्चिमी उत्तर-प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा एवं राजस्थान आदि प्रदेशों से प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु, दर्शनार्थी यहां की यात्रा करते हैं।
अवंतिका देवी के परम पवित्र मंदिर का महल एवं प्रसिद्धि बहुत अधिक है। इस मंदिर के बराबर से पतित पावनी भागीरथी गंगाजी बह रही है। यह मंदिर बहुत ही रमणीक है। जितने भी पृथ्वी पर सिद्धपीठ हैं वह सब सतीजी के अंग हैं, लेकिन यह सिद्धपीठ सतीजी का अंग नहीं है। इस सिद्धपीठ पर जगत जननी करुणामयी माता भगवती अवंतिका देवी (अम्बिका देवी) स्वयं साक्षात प्रकट हुई थीं। मंदिर में दो संयुक्त मूर्तियां हैं, जिनमें बाईं तरफ मां भगवती जगदम्बा की है और दूसरी दायीं तरफ सतीजी की मूर्ति है। यह दोनों मूर्तियाँ ‘अवंतिका देवीय के नाम से प्रतिष्ठित हैं।
माँ भगवती अवंतिका देवी को पोशाक वस्त्रादि नहीं चढ़ाया जाता है, अपितु सिन्दूर व देशी घी का चोला (आभूषण) चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त माँ भगवती अवंतिका देवी पर सिन्दूर व देशी घी का चोला (आभूषण) चढ़ाता है, माता अवंतिका देवी उसकी समस्त मनोकामना पूर्ण करती हैं। माँ अवंतिका देवी अत्यंत ही दयालु हैं। मां भगवती अपने भक्त पर बहुत जल्दी कृपा करती हैं। कई भक्तनों द्वारा थोड़े ही समय में सेवा करके माता भगवती अवंतिका देवी के साक्षात दर्शन किये हैं। कुंआरी युवतियां अच्छे पति की कामना से माता अवंतिका देवी का पूजन करती हैं। रुक्मणि ने भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए इन्हीं अवंतिका देवी का पूजन किया था। भगवान श्री कृष्ण ने इसी मंदिर से उनकी इच्छा पर हरण किया था।
‘अवंतिका देवी्य का मंदिर बुलंदशहर जनपद की अनूपशहर तहसील के अंतर्गत जहाँगीराबाद से 15 किमी. दूर पतित पावनी गंगा नदी के तट पर निर्जन स्थान पर स्थित है। यहां न कोई ग्राम है, न कस्बा है। यहां पर मां अवंतिका देवी के श्रद्धालू भक्तजनों द्वारा यात्रियों के ठहरने हेतु बनवायी गयी धर्मशालाएं, साधू-संतों की कुटिया तथा आश्रम हैं। आधुनिक चकाचौंध से दूर, कोलाहल से रहित, प्रदूषण मुक्त प्रकृति का सुंदर, सुरभ्य वातावरण तथा पतित पावनी गंगा नदी का सान्निध्य होने के कारण यह स्थल साधू-संतों की साधना एवं तपोस्थली बनी हुई है।
यहां साधू-संत साधना तथा मां भगवती की आराधना करते हैं। इन्हीं साधु-संतों में संत शिरोमणि तपोनिष्ट संत महानन्द ब्रह्मड्ढचारी जी हैं। मां भगवती अवंतिका देवी मंदिर के अतिरिक्त यहां अन्य दर्शनीय स्थलों में रुक्मणि कुण्ड, महानन्द ब्रह्मड्ढचारी का विशाल रुक्मणि बल्लभ धाम आश्रम, यज्ञशाला तथा उनकी साधना स्थली है। इस अवंतिका देवी मंदिर तथा रुक्मणि कुण्ड से एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। यह कथा द्वापर युग की है तथा रुक्मणि-कृष्ण विवाह से संबंधित है। किवदंतियों के अनुसार बुलन्दशहर जनपद की तहसील अनूपशहर के अंतर्गत स्थित वर्तमान कस्बा अहार द्वापर युग में राजा भीष्मक की राजधानी कुण्डिनपुर नगर था। इस कुण्डिन पुर नगर के पूर्व में अवंतिका देवी का मंदिर, पश्चिम के दरवाजे पर शिवजी का मंदिर, उत्तर के दरवाजे पर पतित पावनी गंगाजी बह रही थीं तथा दक्षिण के दरवाजे पर एक बगीचा और हनुमान जी का मंदिर स्थित था। कुण्डिन नरेश महाराज भीष्मक के पांच पुत्र तथा एक सुंदर कन्या थी। सबसे बड़े पुत्र का नाम रुक्मी था और चार छोटे थे। जिनके नाम क्रमश: रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश और रुक्मपाली थे। इनकी बहिन थीं सती रुक्मिणी।
राजकुमारी रुक्मिणी बाल्यावस्था से अपनी सहेलियों के साथ कुण्ड (रुक्मिणी कुण्ड) में स्नान करके माता अवंतिका देवी के मंदिर में जाकर माता अवंतिका देवी (अंबिका देवी) का नाना प्रकार से पूजन करती थीं। पूजन करने के पश्चात प्रतिदिन माता भगवती अवंतिका देवी से प्रार्थना करती थीं, कि ‘हे जगतजननी! हे करुणामयी माँ भगवती!! मुझे श्रीकृष्ण ही वर के रूप में प्राप्त हों। राजकुमारी रुक्मिणी जब विवाह योग्य हुई तो उनके पिता राजा भीष्मक को उनके विवाह की चिंता हुई। राजा भीष्मक को जब यह मालूम हुआ कि रुक्मिणी श्रीकृष्ण को पति के रूप में चाहती है तो वह इस विवाह के लिए सहर्ष तैयार हो गये। जब इस विवाह के बारे में राजा भीष्मक के सबसे बड़े पुत्र रुक्मी को मालूम हुआ तो उसने श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का विरोध किया। राजकुमार रुक्मी ने सती रुक्मिणी का विवाह चेदि नरेश राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से उनके हाथ में मौहर बांधकर तय कर दिया। शिशुपाल ने अपनी सेना को विवाह से तीन दिन पहले ही कुण्डिनपुर के चारों ओर तैनात कर दिया और हुक्म दिया कि श्रीकृष्ण को देखते ही बंदी बना लिया जाए। राजकुमारी को जब यह मालूम हुआ कि उनका बड़ा भाई रुक्मी उनका विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहता है तो वह बहुत दु:खी हुई।
राजकुमारी रुक्मिणी ने एक ब्राह्मड्ढण के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के पास संदेश भेजा कि उसने मन ही मन श्रीकृष्ण को पति के रूप में वरण कर लिया है, परंतु उसका बड़ा भाई रुक्मी उसका विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध, जबरन चेदि के राजा के पुत्र शिशुपाल के साथ करना चाहता है। इसलिए वह वहाँ आकर उसकी रक्षा करे। रुक्मिणी की रक्षा की गुहार पर भगवान श्रीकृष्ण अहार पहुंचे तथा रुक्मिणी की इच्छानुसार इसी माता अवंतिका देवी मंदिर से रुक्मिणी का हरण उस समय किया जब वह मंदिर में माता भगवती अवंतिका देवी का पूजन करने गयी थी।
जब श्रीकृष्ण रुक्मिणी को रथ में बिठाकर द्वारिका के लिए चले तो उनको राजा शिशुपाल, जरासिन्धु तथा राजकुमार रुक्मी की सेनाएं ने चारों ओर से घेर लिया। उसी समय उनकी मदद के लिए उनके बड़े भाई बलराम भी अपनी सेना लेकर आ गये। घोर-युद्ध हुआ। युद्ध में राजा शिशुपाल आदि की सेनाएँ हार गयीं। उसी समय से कुण्डिपुर का नाम अहार पड़ गया।
अवंतिका देवी मंदिर के पीछे उ.प्र. सरकार के पर्यटन विभाग ने एक धर्मशाला का निर्माण कराया है तथा अनेक धार्मिक भक्तों ने यात्रियों के लिये स्थान बनाये हैं। आज से 11 वर्ष पूर्व गंगा में भयंकर बाढ़ आई मंदिर के चारों ओर पानी-पानी हो गया। उसी समय देवीभक्त केंद्रीय पर्यटन मंत्री जगमोन के प्रयास से लाखों रुपये के खर्चे से स्टोन पिचिंग और गोले बनवाये, ताकि पानी कटाव न करे। उसी समय सर्वेक्षण कराकर इस 8 किलोमीटर क्षेत्र को पर्यटन केंद्र बनाने का भी निर्णय लिया क्योंकि यहां पर मां अवन्तिका और साथ बाबा खडगसिंह का डेरा, शिवजी का अम्बकेश्वर मन्दिर, सिद्धबाबा का मंदिर, अली हुसैन का उर्स स्थल अहार आदि 5 तीर्थ स्थल हैं। पर सरकार बदल जाने से सब कुछ रुक गया। अब यहाँ पर स्वामी महानन्द जी ब्रह्मड्ढचारी जी कृपा से एक संस्कृत पाठशाला, मन्दिर और गऊशाला भी बनी है तथा रुक्मिणी बल्लभ धाम के समीप पश्चिम-दक्षिण दिशा में रुक्मिणी कुण्ड स्थित है। इस कुण्ड में रुक्मिणी स्नान करके अवंतिका देवी का पूजन करने जाती थीं। इसलिए इस कुण्ड का नाम रुक्मिणी कुण्ड पड़ा।

-महेश चन्द्र शर्मा (पूर्व महापौर)

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