झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

भारतीय संस्कृति में जहां एक ओर देवताओं की आराधना की गई है वहीं देवियों की वन्दना भी। हमारे यहां ईश्वर धर्म की स्थापना और दुष्टों के विनाश के लिए मनुष्य रूप में अवतरित होता आया है, तो देवी परमेश्वरी ने भी नारी रूप धारण कर दुष्टों का विनाश किया है। भगवान शिव ने समाज में शान्ति और सुव्यवस्था कायम करने के लिए त्रिपुर राक्षस का विनाश किया तो दुर्गा ने घोर संग्राम में परम तेजस्वी शक्तिशाली महिषासुर का संहार कर देवताओं का कल्याण किया।
गौतम, कणाद, वशिष्ठ, वाल्मीकि, गर्ग, भृगु, भारद्वाज के नाम आदर के साथ लिए जाते हैं तो गार्गी, मैत्रेयी, सीता, सावित्री, अनसुइया, अरुन्धती, लोपामुद्रा के नाम भी सम्मान के साथ याद किए जाते हैं। जब तक आकाश में सूर्य और चन्द्रमा का उदय होता रहेगा, जब तक हिमालय स्थिर रहेगा और गंगा प्रवाहित होती रहेगी तब तक ये देवियाँ भी भारतीय जनमान से अलग से नहीं हो सकतीं।
हमारी देवियों ने केवल आध्यात्म दर्शन, समाज और साहित्य के क्षेत्र में ही उल्लेखनीय कार्य नहीं किया बल्कि युद्ध और वीरता के क्षेत्र में भी भारतीय ललनाओं का विश्व में कोई मुकाबला नहीं कर सकता। राजस्थान की हजारों देवियों ने अपनी जाति, धर्म और संस्कृति की प्रतिष्ठा के लिए जौहर व्रत का पालन करके इतिहास में अमर स्थान प्राप्त किया है। युद्ध में जिन अनेक देवियों ने शत्रुओं के दाँत खट्टे किये, उनमें झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई अग्रगण्य है। सर ह्यू रोज ने रानी की प्रंशसा में अपनी डायरी में लिखा है-‘महारानी का उच्चकुल, आश्रितों और सिपाहियों के प्रति उनकी असीम उदारता और कठिन समय में भी अडिग धीरज, उनके इन गुणों ने रानी को हमारा एक अज्ञेय प्रतिद्वन्द्वी बना दिया था। वह शत्रु दल की सबसे बहादुर और सर्वश्रेष्ठ सेना नेत्री थी।Ó
सन् 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सन् 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दियापर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।
ब्रिटिश राज ने बालक दामोदर के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। यद्यपि मुकदमे में बहुत बहस हुई परन्तु इसे खारिज कर दिया गया। ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का खजाना जब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज को रानी के सालाना खर्च में से काटने का फरमान जारी कर दिया। इसके परिणामस्वरूप रानी को झाँसी का किला छोड़ कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा। पर रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने हर हाल में झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय किया।
झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया। झलकारी बाई जो लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थी को उसने अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया।
1857 के सितम्बर तथा अक्टूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढऩा शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया। परन्तु रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिली।
तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति प्राप्त की। लड़ाई की रिपोर्ट में ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज ने टिप्पणी की कि रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुन्दरता, चालाकी और दृढ़ता के लिये उल्लेखनीय तो थी ही, विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक खतरनाक भी थी।
महारानी लक्ष्मीबाई का कुशल योद्धा और वीरांगना के अलावा एक योग्य प्रशासिका, पतिव्रता और ममतामयी जननी थी। जीवन-भर में वे अपने पति श्री गंगाराव के प्रति निष्ठावान रहीं। मरने पर उनकी परम्परा को कायम रखा और अपने दत्तक पुत्र दामोदरराव को सदा एक स्नेहमयी माँ के समान जहाँ गई पीठ पर बाँधें रहीं। 19 नवम्बर 1835 ईस्वी के दिन काशी में एक बालिका का जन्म हुआ। इस बालिका का नाम मणिकार्णिका था, जिसे प्यार से मनु कहते थे। इसके पिता का नाम मोरोपंत और माता का नाम भागीरथीबाई था। यही बालिका बाद में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई कहलाई, जिसने भारत को स्वतंत्र करवाने के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी थी।
झांसी राज्य की कुलदेवी महालक्ष्मी का झांसी में एक विशाल मन्दिर था। इस मन्दिर में पूजा-पाठ, कीर्तन, उत्सव आदि के लिए दो गांव रानी लक्ष्मीबाई के नाम थे जो अंग्रेजों ने ले लिये थे। झांसी के किले में अब अंग्रेजी फौज आ गई थी। रानी इस अपमान में बौखला गई। वह अंग्रेजों को सबक देना चाहती थीं। इन्हीं दिनों श्री तात्या टोपे रानी लक्ष्मीबाई से मिलने आए। उन्होंने रानी को अन्य राज्यों के समाचार सुनाए और बताया कि किस प्रकार भारत में अंदर-ही-अंदर अंग्रेजों के विरुद्ध आग भड़क रही है। अब रानी घुड़सवारी करने के लिए महलों से बाहर भी जाने लगीं। उनकी पोशाक मर्दाना होती थी। इन्हीं दिनों रानी की इच्छा अपनी जन्मभूमि काशी जाने की हुई, पर डिप्टी कमिश्नर ने इसकी आज्ञा नहीं दी। लोगों में इस बात को लेकर काफी क्रोध फैला। रानी की तैयारी चल रही थी। दूसरे, राज्यों के समाचार उन्हें बराबर मिलते रहते थे। शस्त्रों का भंडार इक_ा किया जा रहा था। जासूसी गतिविधियाँ बढ़ रही थीं। तात्या टोपे, नाना साहब तथा अंग्रेजों के विरोधी अन्य सामंत-सरदार अपने-अपने तरीकों से काम कर रहे थे।
18 जून 1858 को अंग्रेजी फौज रानी की बहादुरी को देखकर दंग थे। पर किसी भी तरह इस मौके को हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे। रानी अंग्रेजों के व्यूह को चीरती हुई साफ निकल गई। आगे नाला था। रानी का घोड़ा क्योंकि नया था, इसलिए वह अड़ गया। बहुत कोशिश करने पर भी वह आगे नहीं बढ़ा। इतने में पीछा करते कुछ अंग्रेज सिपाही रानी के पास आ पहुँचे। एक गोरे ने बंदूक से गोली दागी। गोली रानी को लगी। खून बहने लगा। पर रानी किसी भी तरह अंग्रेजों के हाथों में पडऩा नहीं चाहती थीं। उन्होंने तलवार से उस गोरे को मौत के घाट उतार दिया। उनकी इच्छा थी कि मरने पर उनके शरीर को कोई अंग्रेज छूने न पाएं। अत: सिपाही पास ही स्थित श्री गंगादास की कुटी में रानी को ले गए और भरी आँखों से उन्होंने रानी का अंतिम संस्कार कर दिया।
रानी लक्ष्मी बाई प्रथम स्वाधीनता संग्राम के क्रम में स्मरणीय रही है। अगर वे चाहतीं तो स्वयं और अपनी आने वाली पीढिय़ों को सुख-सागर उपलब्ध करवा सकती थीं, किंतु उन्हें गुलामी की शानो-शौकत की अपेक्षा स्वाधीनता के रक्षार्थ जूझना सुखप्रद लगा। अंग्रेज इतिहासकारों ने इस वीरांगना का चरित्र तक अपनी लेखनी से खराब करना चाहा। महज इसलिए कि उसने उनकी दासता स्वीकार नहीं की, उनके अखण्ड साम्राज्य को नहीं स्वीकारा, उन्हें चुनौती देने का साहस किया। जिसके लिये वे अमर हो गईं और आजादी के दीवानों की प्रेरणा स्रोत बन गईं।

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